हिंदुवादी नहीं जातिवादी कैबिनेट! - Naya India Narendra Modi Cabinet
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हिंदुवादी नहीं जातिवादी कैबिनेट!

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Narendra Modi Cabinet 2021 : भारत के प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट का क्या मतलब है? एक ही लाइन का जवाब है कि गांव लेवल का जातिवाद अब केंद्रीय कैबिनेट की बुनावट है। आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी ऐसे नहीं हुआ जो सात जुलाई को हिंदुवादी प्रधानमंत्री ने किया। कैबिनेट को जातियों में बांटा। जातियों के हिसाब से मंत्री पद बांट कर दुनिया को बताया कि हिंदू धर्म वह नारंगी है जो जातीय फांकों में बंटा हुआ है। कैबिनेट के केंद्रीय मंत्री जात से भारत को चलाते हैं। मुझे ध्यान नहीं पड़ रहा है कि केंद्रीय कैबिनेट की फेरबदल से पहले नगाड़ों का ऐसा कभी शोर हुआ हो कि इतने मंत्री ओबीसी-दलित के होंगे। टीवी चैनलों और मीडिया में कैबिनेट से पहले और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हेडलाइन मैनेजरों का हल्ला अकल्पनीय था कि 53 मंत्री ओबीसी-दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक हैं। वाह! मोदीजी की क्रांति, 77 में से 53 पिछड़े-दलित मंत्री। जैसे जनगणना में जातिगत आंकड़ों का बंटवारा है वैसे ही पिछड़ों, अति पिछड़ों, अनुसूचित जाति और जनजाति की संख्या के अनुसार नरेंद्र मोदी द्वारा मंत्री बनाना और देश व दुनिया में चर्चा करवाना कि मोदीजी ने फलां-फलां जातियों के फलां-फलां लोगों को मंत्री बनाया!

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तब राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का हिंदू राष्ट्र या जाति राष्ट्र? योग्यता-काबिलियत वाला कैबिनेट या जाति विशेष के होने के नाते लालू छाप कैबिनेट? जैसे लालू भूमिहार-ब्राह्मणों याकि अगड़ों को औकात बतलाते थे वैसे ही अब हुआ और साथ में मैसेज ब्राह्मण-बनिये-अगड़े मोदी के पुजारी और आरती उतारने वाले, जबकि प्रसाद पिछड़े खाएंगे क्योंकि अनुयायी संख्या, उनके वोट अधिक हैं। जाहिर है भारत का केंद्रीय मंत्रिमंडल वह जातिवादी प्रकृति पा चुका है, जिसमें योग्यता, काबिलियत, देश के भविष्य का अर्थ, महत्व नहीं रहा। कभी लालू प्रसाद यादव ने बिहार में जैसी कैबिनेट बनाई थी वैसी जातिवादी सरकार अब केंद्र के लेवल पर स्थापित है। पहली बार भारत के प्रधानमंत्री ने जातियों का हिसाब लगा कर कथित सामाजिक न्याय की वह पिछड़ा-दलित सरकार बनाई है, जिससे आगे वैसे ही वोट पकेंगे, जैसे लालू यादव के पकते थे।

उस नाते माना जा सकता है कि लालू प्रसाद यादव का प्रधानमंत्री बनने और सामाजिक न्याय वाली, मंडलवादी केंद्रीय सरकार का सपना भले उनसे पूरा नहीं हुआ लेकिन वह नरेंद्र मोदी के ओबीसी प्रधानमंत्री और पिछड़ा बहुल कैबिनेट से अब साकार है। मोदी की बड़ी क्रांति है जो गांव, ब्लॉक लेवल पर जातिवादी बस्तियों से शुरू हुई राजनीति पहले जिला स्तर पर, फिर प्रदेश स्तर पर फैली और अब आजादी की 75वीं सालगिरह से पूर्व केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल स्तर तक जा पहुंची है।

सो, हिंदूवादी राजनीतिक दर्शन का अंततः घूम फिर कर जातीय राजनीति को अपना लेना!

जाहिर है नरेंद्र मोदी और अमित शाह को लग रहा है कि हिंदू राष्ट्र याकि हिंदू बनाम मुस्लिम की पानीपत लड़ाई वायरस के रहते फिलहाल सुलगेगी नहीं। इसलिए उत्तर प्रदेश और बिहार की कोर रणभूमि में जातियों के अखाड़े बना कर आगे चुनाव लड़ने होंगे। तभी संयोग मामूली नहीं कि योगी के अगड़े ठाकुरवाद से मोदी-योगी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खतरा बूझा। ओबीसी के प्रतिनिधि चेहरे केशव प्रसाद मौर्य के घर योगी को बुलवा कर उन्हें महत्व दिलवाया। फिर संघ प्रमुख मोहन भागवत के मुंह से हिंदू और मुसलमान के डीएनए एक होने का मंत्र सुना गया। निःसंदेह यूपी में योगी राज से ओबीसी, ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चा बेबुनियाद नहीं है। मोदी-शाह की सर्वे टीम ने फीडबैक दे रखी होगी। इसलिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में यूपी से जो सात नए मंत्री बने हैं उनमें एक ब्राह्मण को छोड़ छह ओबीसी-एससी की जातीय गणित से हैं तो इनमें कई पत्र और राजनीति के जरिए योगी के विरोध के चेहरे हैं। इससे भी केंद्र ने मैसेज बनवाया कि मोदीजी हैं तो पिछड़े भाईयों-बहनों योगी की चिंता न करें।

हां, कैबिनेट को ओबीसी और जातिवादी बनाने के पीछे उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों की चिंता सर्वोपरि है। मोदी-शाह ने परवाह नहीं की कि इससे अगड़े और भाजपा की बनिये-ब्राह्मण वोटों की नींव हिलेगी। ऐसा इनका इस सोच से है कि ब्राह्मण-बनिये अखिलेश को जा नहीं सकते। वे मंदिर और हिंदू राजनीति के झांसे में बंधे रहेंगे जबकि ओबीसी अपने ओबीसी प्रधानमंत्री के प्रचार में अखिलेश या मायावती का विकल्प सोचना बंद करेंगे और वह ज्यादा जरूरी है।

वोट क्योंकि सब कुछ है इसलिए जैसे लालू प्रसाद यादव या नीतीश कुमार बिहार में कैबिनेट बनाते थे वैसे मोदी को केंद्रीय कैबिनेट बनाने में हिचक नहीं हुई। कह सकते हैं महामारी काल ने हिंदुवादी राजनीति से मोहभंग बना दिया है। यों अपना अभी भी मानना है कि यूपी में विधानसभा चुनाव में ऐन वक्त श्मशान बनाम कब्रिस्तान की पिछले चुनाव जैसी बहस बनाई जाएगी। जातिवादी मैसेजिंग अपनी जगह लेकिन। ग्राउंड में मुसलमानों से ब्राह्मण-बनियों को चमकाए रखना जस का तस।

जो हो, मोदी सरकार के हिंदुवादी संतरे का सड़ कर जातियों की फांकों में बदलना भारत राष्ट्र-राज्य का नया मोड़ है! हिंदू सत्ता के लिए किस सीमा तक जाते हैं और समाज को कैसे खंड-खंड बनाते हैं यह आरएसएस-भाजपा की मौजूदा राजनीति से वैसे ही साफ है, जैसे हिंदू इतिहास में होता रहा है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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