महिलाओं इतनी असुरक्षित क्यों?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक भारत में 2018 में औसतन हर रोज में 91 महिलाओं ने बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई। 2012 में ‘निर्भया’ कांड के बाद देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर कानून सख्त किए गए थे। लेकिन ताजा आंकड़ों से यही निष्कर्ष निकलता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा- खासकर यौन हिंसा अब भी बेरोक जारी है। एनसीआरबी के आंकड़े हाल ही में जारी किए गए। उसके मुताबिक 2018 महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की। एक साल पहले 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में यह संख्या 38,947 थी। दूसरी ओर देश में बलात्कार के दोषियों को सजा देने की दर सिर्फ 27.2 प्रतिशत है। 2017 में  दोषियों को सजा देने की दर 32.2 फीसदी थी। यानी यह साफ है कि हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी हुई है। महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कई बार कम गंभीरता से लिया जाता है। पुलिस मामलों की जांच में पूरी संवेदनशीलता नहीं दिखाती। साथ ही देश में बहुत कम फॉरेंसिक लैब हैं। फास्ट ट्रैक कोर्ट में जजों की संख्या कम हैं। फिर बहुत से ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें आरोपियों के पीछे सत्ताधारी खड़े नजर आते हैं। इसकी एक मिसाल उत्तर प्रदेश का उन्नाव कांड है। वहां विधायक कुलदीप सिंह पर 17 वर्षीय किशोरी से बलात्कार का इल्जाम लगा। पीड़ित किशोरी ने पुलिस पर कार्रवाई ना करने का आरोप लगाया था। विवाद बढ़ने के बाद केस को दिल्ली ट्रांसफर किया गया और कुलदीप सिंह सेंगर को उम्र कैद की सजा हुई। 2015 में बैंगलुरु स्थित सेंटर फॉर लॉ एंड पॉलिसी रिसर्च ने अपने अध्ययन पाया था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट वास्तव में तेज हैं, लेकिन बहुत ज्यादा मामले नहीं संभाल पाते। वहीं दिल्ली स्थित पार्टनर्स फॉर लॉ इन डेवलपमेंट के 2016 में एक अध्ययन में पाया गया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट अभी भी औसतन 8.5 महीने केस निपटाने में लेते हैं, जो अपेक्षित अवधि से चार गुना से अधिक है। ये भी गौरतलब है कि 2018 में देश में हर दिन औसतन करीब 80 लोगों की हत्या कर दी गई। साथ ही 289 अपहरण के मामले सामने आए। कुल मिलाकर देश में अपराध बदस्तूर जारी हैं। महिलाएं इसकी खास शिकार बनी हुई हैं।

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