national human rights commissions मानवाधिकार में चीन जैसा रोना!
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मानवाधिकार में चीन जैसा रोना!

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आमतौर पर सोशल मीडिया में किसी खास पार्टी के नेता या समर्थक अपने विरोधी को कठघरे में खड़ा करने के लिए इस तरह की बातें करते हैं कि अमुक घटना हुई तो आप कहां थे या अमुक घटना हुई तो उसमें आपको मानवाधिकार का हनन क्यों नहीं दिखा। लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने यहीं बात कही है तो इस किस्म के विमर्श की गंभीरता बढ़ गई है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि ‘हाल के वर्षों में मानवाधिकार की व्याख्या कुछ लोग अपने अपने तरीके से, अपने अपने हितों को देखकर करने लगे हैं। एक ही प्रकार की किसी घटना में कुछ लोगों को मानवाधिकार का हनन दिखता है और वैसी ही किसी दूसरी घटना में उन्हीं लोगों को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखता। इस प्रकार की मानसिकता भी मानवाधिकार को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाती है’। national human rights commissions

इसके दो दिन बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लखीमपुर खीरी में गाड़ी से कुचले गए किसानों के बारे में पूछे जाने पर अमेरिका में हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में एक संवाद के दौरान कहा कि ‘लखीमपुर की हिंसा में किसानों का मारा जाना बेशक निंदनीय है, लेकिन देश के दूसरे इलाकों में भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं। ऐसी हर घटना को बराबरी से उठाना चाहिए। सिर्फ इसलिए यह मुद्दा नहीं उठना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है’।

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इन दोनों बड़े नेताओं के बयानों से पहले भाजपा के कई नेताओं ने कहा था कि राहुल और प्रियंका लखीमपुर खीरी गए लेकिन वे राजस्थान नहीं गए, जहां एक दलित की हत्या हुई है। इस पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि ‘राहुल और प्रियंका क्यों राजस्थान आएंगे, यहां तो उनकी सरकार है। यहां प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, भाजपा अध्यक्ष आदि को आना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या हुआ और उसके बाद सरकार ने क्या किया’। यह एक राजनीतिक दृष्टिकोण है, जिसकी ओर प्रधानमंत्री ने भी इशारा किया है। इस लिहाज से प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और राजस्थान के मुख्यमंत्री तीनों अपनी अपनी जगह सही है।

यह विपक्षी पार्टियों का काम है कि वे राज्य में होने वाले हर अत्याचार का मुद्दा उठाएं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक विचारधारा से निरपेक्ष होकर हर जगह की घटना को एक समान तरीके से उठाएं। लेकिन अगर किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन ने एक घटना को ही मुद्दा बनाया है तो सिर्फ इसलिए उसकी प्रतिबद्धता पर संदेह नहीं किया जा सकता है कि उसने वैसी ही किसी दूसरी घटना को मुद्दा नहीं बनाया।

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बहरहाल, भारत में आमतौर पर ऐसा होता है कि अगर भाजपा शासित किसी राज्य में कोई घटना हुई है तो उसके विरोध में कांग्रेस या दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियों के नेता, कार्यकर्ता प्रदर्शन करेंगे और अगर कांग्रेस या किसी दूसरी गैर भाजपा शासित राज्य में कोई घटना हुई है तो उसका विरोध भाजपा के नेता करेंगे। यह एक स्वीकार्य राजनीतिक सिद्धांत है और इसमें कोई विरोधाभास भी नहीं है। लेकिन प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री ने सिर्फ इस तरफ इशारा नहीं किया। ये दो राजनीतिक दलों या दो अलग विचारधारा वाली पार्टियों के बीच का मुद्दा नहीं है। यह मानवाधिकार या किसानों के ऊपर अत्याचार के एक बड़े संदर्भ में कही गई बात है। इसलिए यह चिंता की बात है कि प्रधानमंत्री मानवाधिकार हनन के मामले को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखने की बजाय व्यक्तिपरक तरीके से देख रहे हैं। वे इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि कुछ लोगों को एक घटना में मानवाधिकार का उल्लंघन दिखता है और उसी प्रकार की दूसरी घटना में नहीं दिखाई देता है।

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मानवाधिकार को लेकर प्रधानमंत्री का इस तरह से शिकायत करना नई बात है और राजनीति के दायरे से बाहर की बात है। मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े लोग या संस्थाएं किसी पार्टी के कार्यकर्ता या किसी पार्टी के प्रति संबद्धता के आधार पर आंदोलन नहीं करते हैं। मानवाधिकार की रक्षा में खड़े होने का मतलब है कि राज्य कहीं भी शोषण का जरिया बनता है या राज्य की ताकत के जरिए, जहां भी लोगों के संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकार का या इंसान के रूप में हासिल नैसर्गिक अधिकार का हनन होता है, वहां विरोध में खड़े होना। मेरे अधिकार बनाम तुम्हारे अधिकार जैसी कोई चीज मानवाधिकार के मामले में नहीं होती है। कहीं भी अगर चुनिंदा तरीके से मानवाधिकार के मामले उठाए जाते हैं तो वह असल में राजनीति होती है, उसका मानवाधिकार से कोई लेना-देना नहीं होता है।

इसलिए प्रधानमंत्री का यह कहना सही है कि मानवाधिकारों की राजनीति होती है। लेकिन यह कहना चिंताजनक है कि चुनिंदा मुद्दे उठा कर उन पर आंदोलन करना मानवाधिकार का सबसे बड़ा उल्लंघन है और इससे देश की छवि खराब होती है। यह एक खतरनाक विमर्श को जन्म देने वाला है, जिसमें मानवाधिकार उल्लंघन के खिलाफ होने वाले हर आंदोलन को राजनीतिक नजरिए से देखा जाएगा और देश की छवि खराब होने के बहाने से उसे दबाने का भी प्रयास होगा।

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यह दुर्भाग्य है कि भारत में मानवाधिकार का पूरा मामला एक खास राजनीतिक अर्थ में रूढ़ हो गया। चूंकि देश के गरीब, पिछड़े, दलित, वंचित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाओं आदि के अधिकारों के बारे में बात करना एक खास राजनीतिक विचारधारा से जुड़ गया है। जैसे ही कोई इनके बारे में बात करता है उसको कम्युनिस्ट मान लिया जाता है। और भाजपा के आईटी सेल या सोशल मीडिया में प्रायोजित तरीके से चलने वाले प्रचार के मुताबिक कम्युनिस्ट होने का मतलब है नक्सलियों का समर्थक होना, टुकड़े टुकड़े गैंग से जुड़ा होना, कश्मीर के अलगाववादियों का मददगार होगा और इस तरह देश विरोधी होना। इस तरह एक ऐसा नैरेटिव बनवा दिया गया है, जिसके मुताबिक मानवाधिकार की बात करना देश विरोधी होना हो गया है। इस नैरेटिव के मजबूत होने का ही नतीजा है कि सरकार के समर्थक आंदोलनकारी किसानों को आतंकवादी बता रहे हैं और किसानों का समर्थन करने वाले देश विरोधी बताए जा रहे हैं! इसी का नतीजा है कि भाजपा नेता की गाड़ी से कुचले गए किसानों के बरक्स कुचलने वालों के मानवाधिकार की भी बातें हो रही हैं! संभवतः इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने कहा कि चुनिंदा मुद्दे उठा कर मानवाधिकार का हल्ला मचाने से देश की छवि खराब होती है। सो, सवाल है कि क्या देश की छवि खराब न हो इसके लिए मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे न उठाए जाएं? फिर भारत और चीन में या लोकतंत्र और तानाशाही में क्या फर्क रह जाएगा?

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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