गरीबी और जेल का ये रिश्ता

ये बात नई नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट से फिर सामने आई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम, आदिवासी और दलित वर्ग के लोग बंद रखे गए हैं। 2019 के आंकड़ों के मुताबिक विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या मुस्लिमों की है। देश भर की जेलों में दोषी करार दिए गए कैदियों में सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है। जनजातियों (आदिवासियों) में भी यही स्थिति हैं। इन सबकी जेल में मौजूदगी उनकी आबादी के अनुपात की तुलना में बहुत ज्यादा है। मसलन, मुसलमानों की संख्या देश की आबादी में 14.2 प्रतिशत है, लेकिन जेल के भीतर दोषसिद्ध कैदियों में साढ़े 16 प्रतिशत से कुछ अधिक उनकी संख्या है। विचाराधीन कैदियों में उनकी संख्या 18.7 प्रतिशत है। न्याय प्रणाली के विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे भारत की आपराधिक न्याय पद्धति की बहुत सी कमजोरियों का पता चलता है। ये भी पता चलता है कि गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई कितनी कठिन है। जिन लोगों को अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं, उनकी जमानत आसानी से हो जाती है। जबकि बहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग जेल में सड़ने को विवश होते हैं। वैसे 2015 के मुकाबले विचाराधीन कैदियों वाली श्रेणी में मुस्लिम अनुपात 2019 में गिरा है लेकिन सजायाफ्ता कैदियों के मामले में यह बढ़ा है। एससी-एसटी कैदियों की संख्या या अनुपात में भी बड़ी गिरावट नहीं आई है। सबसे ज्यादा दलित विचाराधीन कैदी उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद है- करीब 18 हजार। इसके बाद बिहार और पंजाब का नंबर आता है।

जनजातीय और आदिवासी समुदाय के सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी मध्य प्रदेश में हैं- करीब छह हजार। इसके बाद यूपी और छत्तीसगढ़ की जेलें आती हैं। यूपी की जेलों में ही सबसे ज्यादा मुस्लिम विचाराधीन कैदी पाए गए और उसके बाद बिहार और मध्य प्रदेश का नंबर है। एक बड़ी समस्या जेलों की बदहाली भी है। वहां स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण आदि की स्थिति बुरी है। कोरोना काल में कई राज्यों की जेलें भी महामारी के हॉटस्पॉट बन गई हैं। जेलों में भ्रष्टाचार, गैरकानूनी गतिविधियां, कमजोर और गरीब कैदियों का शोषण, भेदभाव और उनसे सांठगांठ और दबंग अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं। जाहिर है, इन सबसे में सुधार की जरूरत है। मगर यह आज कहीं चर्चा के एजेंडे पर है, ऐसा नहीं लगता।

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