National Eligibility Entrance Test नीट पर पुनर्विचार की जरूरत
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नीट पर पुनर्विचार की जरूरत

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नीट की व्यवस्था ने मेडिकल की पढ़ाई को एक अभिजात्य पाठ्यक्रम में बदल दिया है। जिसके पास पैसे हैं, जिसके पास कोचिंग करने की क्षमता है, जिसकी प्रारंभिक शिक्षा की माध्यम भाषा अंग्रेजी है और जो महानगरों या बड़े शहरों में रहता है, नीट की व्यवस्था उसके लिए वरदान बन गई। सरकार या अदालत किसी ने यह नहीं सोचा कि मेडिकल की पढ़ाई आईएएस की तरह कोई अखिल भारतीय सेवा नहीं है, जिसकी अखिल भारतीय स्तर पर एक परीक्षा कराई जाए। (National Eligibility Entrance Test)

तमिलनाडु की सरकार ने मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाली नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेस टेस्ट यानी नीट को खत्म करने का एक विधेयक विधानसभा में पास किया है। डीएमके सरकार से पहले अन्ना डीएमके सरकार ने भी इसी तरह का विधेयक पास किया था, लेकिन उसे राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी। इसलिए यह उम्मीद करना बेमानी है कि तमिलनाडु सरकार के विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलेगी। जब तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलती है तब तक इसका कोई मतलब नहीं होगा। इस लिहाज से कह सकते हैं कि तमिलनाडु सरकार ने नीट को खत्म करने और 12वीं की परीक्षा में मिलें अंकों के आधार पर मेडिकल में दाखिले का जो विधेयक पास किया है वह दिखावा या एक औपचारिकता भर है। हालांकि इसमें तमिलनाडु सरकार की मंशा पर कोई सवाल नहीं खड़ा होता है क्योंकि उसके सरोकार बिल्कुल सही हैं लेकिन उसे भी पता है कि उसके पास कराए विधेयक का कोई मतलब नहीं है। केंद्र सरकार के बनाए कानून राज्य नहीं बदल सकते हैं। यह वैसे ही है जैसे तमिलनाडु सहित कई राज्यों ने केंद्र सरकार के बनाए कृषि कानूनों को बदलने का विधेयक पास किया है, लेकिन सबको पता है कि कोई विधेयक कानून नहीं बनेगा।

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सो, तमिलनाडु सरकार के विधेयक पास करने के बावजूद नीट की मौजूदा व्यवस्था नहीं बदलने वाली है। फिर भी एमके स्टालिन की सरकार ने इस व्यवस्था पर पुनर्विचार का एक मौका मुहैया कराया है। याद करें, जब 2017 में इस व्यवस्था को लागू किया गया था तब इसका कैसा विरोध हुआ था। देश के कई गैर हिंदी भाषी राज्यों में बड़े आंदोलन हुए थे। दक्षिण भारत के सभी राज्यों सहित पूर्वोत्तर के राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम और ओड़िशा में बड़े प्रदर्शन हुए थे। पार्टियों के राजनीतिक विरोध के अलावा लोग सड़कों पर उतरे थे, ट्रेनें रोकी गई थीं और उग्र प्रदर्शन हुए थे। लेकिन जैसा कि इस सरकार का रिकार्ड रहा है कि वह प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देती है और किसी लोकतांत्रिक विरोध का उसके लिए कोई मतलब नहीं होता है, वैसे ही इस मामले में भी हुआ। तमाम विरोध के बावजूद यह व्यवस्था लागू कर दी गई और इसे सर्वोच्च अदालत की मंजूरी भी मिल गई।

पिछले चार साल में बाकी राज्यों ने तो इस व्यवस्था को जैसे तैसे स्वीकार कर लिया है पर तमिलनाडु में इसका विरोध जारी है। इसका कारण यह है कि तमिलनाडु में पिछली लगभग सभी सरकारों ने बहुत सुनियोजित तरीके से मेडिकल की पढ़ाई की ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसमें बिना किसी भेदभाव के गांव के और गरीब बच्चों को भी मेडिकल की शिक्षा हासिल करने का मौका मिलता है। राज्य में 25 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं और इसके अलावा आठ कॉलेज ऐसे हैं, जो आयुष के तहत आते हैं और वैकल्पिक चिकित्सा प्रणाली की शिक्षा देते हैं। वहां सीधे 12वीं के अंक के आधार पर मेडिकल व डेंटल कॉलेज में दाखिला मिलता रहा है। कई पीढ़ियों ने इसी तरह मेडिकल में दाखिला लिया और पढ़ाई पूरी करके दूरदराज के इलाकों में या अपने समुदाय के लोगों को बीच जाकर काम किया। तमिलनाडु में 12वीं पास करने वाले 43 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों के होते हैं, जो राज्य शिक्षा बोर्ड के सिलेबस से पढ़ाई करते हैं और 12वीं के अंक के आधार पर मेडिकल में दाखिला पाते रहे हैं। इसमें ज्यादातर बच्चे आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अत्यंत पिछड़े समुदायों या वर्गों से आते हैं। नीट की व्यवस्था उनके ऊपर वज्रपात है। कह सकते हैं कि अकेले तमिलनाडु में नहीं, बल्कि हर राज्य में नीट की व्यवस्था सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए वज्रपात की तरह है।

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नीट की व्यवस्था ने मेडिकल की पढ़ाई को एक अभिजात्य पाठ्यक्रम में बदल दिया है। जिसके पास पैसे हैं, जिसके पास कोचिंग करने की क्षमता है, जिसकी प्रारंभिक शिक्षा की माध्यम भाषा अंग्रेजी है और जो महानगरों या बड़े शहरों में रहता है, नीट की व्यवस्था उसके लिए वरदान बन गई। सरकार या अदालत किसी ने यह नहीं सोचा कि मेडिकल की पढ़ाई आईएएस की तरह कोई अखिल भारतीय सेवा नहीं है, जिसकी अखिल भारतीय स्तर पर एक परीक्षा कराई जाए और एक राज्य के छात्र का दाखिला किसी दूसरे राज्य में कराया जाए और उसे मजबूर किया जाए कि वह उस राज्य में मेडिकल प्रैक्टिस करे। अगर अपनी भाषा में पढ़ाई करने वाला तमिलनाडु या तेलंगाना का कोई छात्र किसी तरह से नीट पास करता है और उसका दाखिला उत्तर प्रदेश, बिहार या पश्चिम बंगाल के किसी मेडिकल कॉलेज में होता है तो उसे भाषा, संस्कृति और खान-पान के स्तर पर कितनी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है? पढ़ाई पूरी करने के बाद अगर उसे उसी राज्य में प्रैक्टिस करने की बाध्यता होती है तो भाषा कितनी बड़ी बाधा होगी, यह किसी ने नहीं सोचा! सोचें, तमिलनाडु का कोई तमिल भाषी छात्र ओड़िशा के किसी गांव में प्रैक्टिस करेगा तो स्थानीय लोग उसे कैसे अपनी बीमारी बताएंगे और वह क्या समझ कर इलाज करेगा! (National Eligibility Entrance Test)

नीट की व्यवस्था संघवाद के बुनियादी सिद्धांत के भी खिलाफ है। शिक्षा राज्य का विषय है, जिसे इमरजेंसी के समय इंदिरा गांधी ने समवर्ती सूची में डाल दिया था, जबकि स्वास्थ्य पूरी तरह से राज्यों का विषय है। हर राज्य का अपना शिक्षा बोर्ड है, जिसके पाठ्यक्रम से उसके स्कूलों में पढ़ाई होती है। लेकिन नीट की व्यवस्था के तहत मेडिकल में दाखिले के लिए सीबीएसई और एनसीईआरटी के सिलेबस पर आधारित परीक्षा होती है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका फायदा सीबीएसई बोर्ड से और एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ाई करने वाले छात्रों को होता है। ध्यान रहे राज्यों और सीबीएसई के सिलेबस में बहुत अंतर होता है। तमिलनाडु की बात करें तो वहां जीवविज्ञान का सिलेबस सीबीएसई से 70 फीसदी अलग है। इसका मतलब है कि वहां 12वीं तक की जीवविज्ञान की पढ़ाई करने वाले छात्र को भी नीट के लिए अलग से सीबीएसई के सिलेबस की पढ़ाई करनी होगी। इसके लिए उसे निश्चित रूप से कोचिंग की जरूरत होगी, जिसकी वजह से कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्र बिना मुकाबला किए ही इस प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाते हैं।

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अब रही बात मकसद की तो यह भी समझ में नहीं आने वाली बात है कि नीट से क्या मकसद पूरा होता है? जब सभी राज्य अपने यहां मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करते ही थे तो उसकी जगह एक केंद्रीय व्यवस्था की क्या जरूरत पड़ी? क्या इससे मेडिकल में दाखिले में होने वाला भ्रष्टाचार कम हो गया या दाखिले का खर्च कम हो गया या पढ़ाई की फीस कम हो गई? ध्यान रहे इस व्यवस्था में फीस को नियंत्रित नहीं किया गया है। इसलिए जो मकसद बता कर दाखिले की यह व्यवस्था बनी उसे यह पूरा नहीं करती है। उलटे इसने मेडिकल की पढ़ाई में ऐसा विभाजन पैदा कर दिया है, जिसे भरने के लिए इस व्यवस्था को खत्म करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। National Eligibility Entrance Test

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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