नेपालः भारत की बेबसी

नेपाल भारत का परम पड़ौसी है। वहां जबर्दस्त उठा-पटक चल रही है। प्रतिनिधि सभा (लोकसभा) भंग कर दी गई है। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचंड-खेमे और ओली खेमे में सत्ता की होड़ लगी हुई है लेकिन भारत ने चुप की दहाड़ लगा रखी है और चीन अपनी बीन बजाए चला जा रहा है। ऐसा नहीं है कि भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। उसके सेनापति और विदेश सचिव अभी कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री के.पी. ओली से मिल आए थे। काठमांडो में उनका स्वागत गर्मजोशी से हुआ था और ओली के भारत-विरोधी रुख में कुछ नरमी भी दिखाई पड़ी थी। हमारे राजदूत ने भी ओली से भेंट के बाद भारत आकर सरकार को सारी स्थिति से अवगत कराया था लेकिन हम ज़रा देखें कि चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी काठमांडो में कितनी अधिक सक्रिय हैं। वे प्रचंड और ओली से दर्जनों बार मिल चुकी हैं। दोनों पार्टियों के छोटे-मोटे नेता तो यांकी से मिलने के लिए चीनी दूतावास में लाइन लगाए रखते हैं।

यांकी की हजारों कोशिशों के बावजूद अब जबकि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में दरार पड़ गई है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उप-मंत्री गुओ येचाऊ अब चार दिन के लिए काठमांडो पहुंच गए हैं। उनकी कोशिश होगी कि वे दोनों खेमों में सुलह करवा दें लेकिन भंग हुई संसद को अब वे कैसे लौटा पाएंगे ? क्या नेपाल का सर्वोच्च न्यायालय उसे पुनर्जीवित कर सकेगा ? यदि संसद फिर से जीवित हो गई, तब भी दोनों खेमों के बीच झगड़ा कैसे खत्म होगा ? जो भी हो, हमारी चिंता का विषय यह है कि इस मामले में भारत की भूमिका नगण्य क्यों हो गई है ? यह ठीक है कि चीन नेपाल को तिब्बत से जोड़ने के लिए रेल लाइन बिछा रहा है। रेशम महापथ के लिए वह 2.5 बिलियन डालर भी दे रहा है और आठ करोड़ डालर की फौजी सहायता भी नेपाल को दी जाएगी। चीनी और नेपाली सेनाएँ पिछले दो-तीन साल से संयुक्त सैन्य-अभ्यास भी कर रही हैं।

चीन नेपाल को अपने तीन बंदरगाहों के इस्तेमाल की सुविधा भी दे रहा है ताकि भारत पर उसकी निर्भरता कम हो जाए। भारत की भाजपा सरकार बेबस मालूम पड़ रही है। उसके पास ऐसे अनुभवी लोग नहीं है, जो बिना प्रचार के नेपाली कम्युनिस्ट नेताओं से मिल सकें और भारत की भूमिका को मजबूत कर सकें। हमारी भाजपा सरकार अपने नौकरशाहों पर निर्भर है। नौकरशाहों और राजनयिकों की अपनी सीमाएँ हैं। वे ज्यादा सक्रिय दिखेंगे तो उसे आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप माना जाएगा।

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