आरक्षण पर उठा नया विवाद

आरक्षण के सवाल पर एक नया सियासी विवाद खड़ा होता दिखता है। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल इसको लेकर पहले ही सरकार पर निशाना साध चुके हैं। तेजस्वी यादव इस मुद्दे पर सड़क पर उतरने का एलान कर चुके हैं। कहा जा सकता है कि अब जबकि बिहार विधान सभा के चुनाव की बिसात बिछने वाली है, उन्हें इससे बेहतर मुद्दा नहीं मिल सकता था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि सरकारी पदों पर पदोन्नति में आरक्षण को एक मौलिक अधिकार के रूप नहीं मांगा सकता। जस्टिस एल. नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने पिछले हफ्ते कहा कि राज्य सरकारें प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। यहां तक कि अदालतें ऐसे मामलो में आरक्षण प्रदान करने के लिए राज्यों को निर्देश जारी नहीं कर सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। पदोन्नति में आरक्षण का दावा करने के लिए किसी व्यक्ति के पास कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत द्वारा राज्य सरकार को आरक्षण प्रदान करने का निर्देश देने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता है।’ यह निर्णय उत्तराखंड के लोक निर्माण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पदों पर पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण के संबंध में दायर कई अपीलों पर आधारित है। उत्तराखंड सरकार ने वहां आरक्षण ना देने का फैसला किया था। उसे उत्तराखंड हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार की जीत हुई। जाहिर है, इस पृष्ठभूमि के कारण इस निर्णय की पूरी जिम्मेदारी न्यायपालिका पर डाल कर भाजपा मुक्त नहीं हो सकती। बल्कि उसे ये सफाई देनी होगी कि उसकी एक राज्य सरकार ने आरक्षण देने से किनारा क्यों किया? बहरहाल, दो जजों की बेंच ने संविधान पीठ की उन मिसालों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) व्यक्ति को पदोन्नति में आरक्षण का दावा करने का मौलिक अधिकार नहीं देता है। ये अनुच्छेद राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए नियुक्ति और पदोन्नति के मामलों में आरक्षण देने का अधिकार देते हैं। लेकिन कोर्ट के मुताबिक ये अनुच्छेद तभी लागू होंगे जब राज्य यानी सरकार को लग रहा हो कि वे राज्य की सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

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