नए दशक की चुनौतियां

नए साल के साथ-साथ आज एक नए दशक की शुरुआत हो रही है। पिछली कई सदियों में शायद ही कोई दशक होगा, जिसकी शुरुआत इतनी गहरी निराशा, इतने गहरे अवसाद और इतने व्यापक सामूहिक दुख के साथ हुई होगी। कह सकते हैं कि तमाम निराशा, अवसाद और दुखों को छोड़ कर दुनिया नए साल में जा रही है और इसलिए इसे उम्मीदों का साल कहना चाहिए। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। दुनिया 2020 की तमाम मुश्किलों को साथ लेकर ही 2021 में जा रही है। अगर 2020 की शुरुआत कोविड-19 से हुई थी तो 2021 की शुरुआत उसके ही एक स्वरूप, एक नए स्ट्रेन के साथ हो रही है, जो उससे ज्यादा संक्रामक है और जिसकी वजह से पूरी दुनिया भयातुर है। यूरोप, अमेरिका में तमाम किस्म के प्रतिबंधों के बीच क्रिसमस मनाया गया और सारी दुनिया में लॉकडाउन, पाबंदियों और नाइट कर्फ्यू के बीच नए साल का स्वागत किया जा रहा है।

इतनी तरह की मुश्किलों और आशंकाओं के बीच जो साल शुरू हो रहा है और उसके साथ जो सदी शुरू हो रही है उसकी चुनौतियों को लेकर चिंता स्वाभाविक है। 21वीं सदी के तीसरे दशक की चुनौतियों को समझने के लिए पिछले दो दशकों में जो हुआ है उसे देखना-समझना जरूरी है। सदी के पहले दशक की शुरुआत एक बड़ी तकनीकी चुनौती, जिसे ‘वाई2के’ कहा गया था उससे हुई थी। पूरी दुनिया में यह अफवाह फैली या फैलाई गई कि 31 दिसंबर 1999 को दुनिया के सारे कंप्यूटर बंद हो जाएंगे, उनका सारा डाटा उड़ जाएगा और सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा। इस संकट से निपटने के लिए दुनिया के तमाम देशों में हजारों, लाखों करोड़ रुपए खर्च हुए और अंत में कुछ नहीं हुआ। कोई कंप्यूटर बंद नहीं हुआ। लेकिन यह संभावित खतरा 1999 में पूरे वर्ष दुनिया की चिंता का सबब बना रहा।

इसके दो साल बाद यानी 2001 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड टावर पर आतंकवादी हमला हुआ। वह घटना हमेशा के लिए पूरी दुनिया को बदल देने वाली घटना साबित हुई। इसके बाद अमेरिका की मुख्यभूमि से दूर जो युद्ध शुरू हुआ वह अब तक चल रहा है। उस सदी का समापन बड़ी आर्थिक मंदी के साथ हुई, जिसकी चपेट में दुनिया के लगभग सारे देश आए थे। यानी पहले दशक से तकनीकी चुनौती, सुरक्षा की चुनौती और आर्थिक चुनौती पूरी मानवता को इस सदी की विरासत के तौर पर मिली। नई सहस्त्राब्दी की शुरुआत के साथ ही मानवता को जो एक नई चुनौती मिली वह पर्यावरण को बचाने की थी। जलवायु परिवर्तन ने पूरी मानवता के सामने जीवन के साथ साथ रोजी-रोटी और रिहाइश का संकट खड़ा किया है।

अगला दशक भी इससे अलग नहीं रहा। पूरी दुनिया विज्ञान की तरक्की और समृद्धि हासिल करने के साथ साथ उन तमाम चुनौतियों से जूझती रही, जो पहले दशक में सामने आई थीं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती बनी रही क्योंकि इसका स्वरूप लगातार बदलता गया और यह अमेरिका के बाद अनेक यूरोपीय देशों से लेकर ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तक पहुंच गया। जिस तेजी से तकनीक का विकास हुआ उसी तेजी से उसका दुरुपयोग भी बढ़ता गया और आज दुनिया के तमाम गैजेट्स हर समय खतरे में हैं। कोई किसी भी नेटवर्क को हैक कर सकता है, कहीं से गोपनीय और संवेदनशील सूचना चुरा सकता है, कहीं भी चुनावों को प्रभावित कर सकता है (अमेरिका में भी), किसी के खाते से पैसे निकाल सकता है, दवा या वैक्सीन का फॉर्मूला चोरी कर सकता है, किसी के बेडरूम में ताक-झांक कर सकता है!

दूसरा दशक कोरोना वायरस का खतरा दुनिया के सामने प्रस्तुत कर विदा हुआ है पर ऐसा नहीं है कि वह पहला खतरा था। पूरे दशक इबोला से लेकर सार्स, मार्स जैसे अनेक वायरस दुनिया भर में फैले। अब ऐसा लग रहा जैसे उन सारे वायरसों का फैलना कोरोना वायरस के आने का पूर्वाभास या रिहर्सल था। और अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि यह आखिरी महामारी नहीं है। सोचें, अभी यह महामारी खत्म भी नहीं हुई और डब्लुएचओ ने आगाह कर दिया कि यह आखिरी नहीं है। इस महामारी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को वह झटका दिया है, जो पहले दशक की आर्थिक मंदी भी नहीं दो पाई थी। दुनिया को इस झटके से उबरने में पता नहीं कितना समय लगेगा।

सो, नया साल और नया दशक आतंकवाद व सुरक्षा की चुनौतियां लिए हुए है तो तकनीक के विकास के साथ-साथ उसकी वजह से पैदा हो रही चुनौतियों के सामने भी खड़ा है। वायरस और नई बीमारियों से दुनिया की करीब आठ सौ आबादी को बचाए रखना एक चुनौती है तो जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी जस की तस है। उससे भी गंभीर आर्थिक चुनौतियां हैं, जिसे कोरोना ने दुनिया के लगभग हर व्यक्ति के लिए पेश किया है। इस बहस में जाने की जरूरत नहीं है कि वर्ष 2020 को ईश्वर ने सारी दुनिया को सामूहिक रूप से सजा देने के लिए चुना या यह मानवीय आपदा थी, पर यह हकीकत है कि आधुनिक समय में इंसान किसी भी कालखंड में इतना असहाय, लाचार, निरूपाय और अरक्षित नहीं रहा, जितना इस समय है। यह कैसी विडंबना है कि जिस समय में इंसान अपने को हर चीज का नियंता समझने लगा था उसी समय उसके सामने यह चुनौती प्रस्तुत हुई!

अगले पूरे दशक में दुनिया की आठ सौ करोड़ आबादी को इन सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उनका जीवन पूरी तरह से अरक्षित और किसी अन्य के नियंत्रण में होगा और यह भी संभव है कि उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं रह जाए। देश और समाजों में जैसा विभाजन हो रहा है वह इस बात का संकेत है कि आतंकवाद और सामाजिक टकराव नए रूप लेकर सामने आएगा। तकनीक व्यक्ति के जीवन का केंद्र होगा तो उसकी संकटों का भी केंद्र वहीं होगा। पिछली सदी में परमाणु विस्फोट तकनीक का एक दुरुपयोग था तो आने वाले वर्षों में मानवता के संहार वाले जैविक युद्ध उससे भी बड़ा विध्वंस कर सकते हैं। दुनिया में आर्थिक असमानता किसी भी कालखंड के मुकाबले ज्यादा होगी।

समकालीन दुनिया के सबसे प्रबुद्ध विचारकों में से एक युआल नोवा हरारी ने दावा किया था कि पिछली सदी के जो तीन सबसे बड़े खतरे थे- युद्ध, महामारी और भुखमरी अब खत्म हो गए हैं। लेकिन नई सदी का तीसरा दशक आते-आते तीनों खतरे सामने दिख रहे हैं। कोरोना वायरस की महामारी ने दुनिया के आठ करोड़ से ज्यादा लोगों को संक्रमित कर दिया और आठ सौ करोड़ लोगों को डर-डर कर जीने के लिए मजबूर कर दिया। इस महामारी ने दुनिया की बड़ी आबादी को भुखमरी की कगार पर ला दिया है। और युद्ध, वह सीरिया से लेकर लेबनान, ईरान, इराक तक में छिड़ा हुई है, भारत के साथ लगती चीन और पाकिस्तान की सीमा पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, हाल ही में आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच युद्ध होकर खत्म हुआ है, कुछ समय पहले ही रूस ने युद्ध के जरिए यूक्रेन के एक बड़े हिस्से क्रीमिया में अपने देश में मिला लिया। असल में यह भी पिछली दो सदियों की परिघटना है कि दुनिया में ‘माचो मैन’ की छवि वाले उग्र राष्ट्रवादी विचार के नेताओं का उदय हुआ है, जिन्होंने अपने देश को फिर से महान बनाने या विश्व गुरू बनाने का भ्रम फैलाया है। तमाम युद्ध या संभावित युद्ध ऐसे ही नेताओं की देन हैं।

आने वाले समय को अंधकार और आशंकाओं वाला बताने का मकसद डराना नहीं, बल्कि आगाह  करना है कि दुनिया जिस रास्ते पर चल रही है अगर वह रास्ता बदला नहीं जाता है तो वह मानवता को कहां पहुंचाने वाला है। सो, दुनिया को अपना रास्ता बदलना होगा, जीवन शैली बदलनी होगी, नेतृत्व बदलना होगा, पर्यावरण बचाना होगा, मानवीय मूल्यों की स्थापना के प्रयास करने होंगे और प्राकृतिक व्यवस्था के साथ जीने की आदत डालनी होगी। हालांकि इतना भी पर्याप्त नहीं है पर इतना न्यूनतम तो करना ही होगा।

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