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कश्मीर का ‘नया’ होना क्या?

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kashmir after article 370 remove : कश्मीर को ‘नया कश्मीर’ क्यों कहा जा रहा है जब भावना, उसका होने का एक हिन्दू का अहसास अब भी ‘दूसरों’ का ही है। अनुच्छेद 370 खत्म करने से आत्मविश्वास या शांति की कौन सी भावना जगी है जिसका प्रचार देश के बाकी हिस्से और दुनिया भर में ‘नया कश्मीर’ के रूप में किया जा सकता है?… गुजरे इन तीन वर्षों के बाद भी कश्मीर को जैसा मैं जानती थी, कश्मीर वैसा ही है।  अलग-थलग कड़वाहट के साथ। पहले के मुकाबले ज्यादा।

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kashmir after article 370 remove : कश्मीर में होना हमेशा एक अनुभव होता है। जबरदस्त सौंदर्य में भरे क्षेत्र में घर पर होना, वहां का होना अलग अहसास कराता है। घर के सुरक्षित परिवेश से बाहर कदम रखना और कॉलोनी के बड़े काले गेट की सीमा बोध कराती है कि आप यहां के होकर भी यहां के नहीं हैं! यह अहसास यहां के होने पर हावी होता है, ज्यादा बोझ लिए हुए। शरीर में अजीब सी सनसनी महसूस होती है। हड्डियों तक को महसूस होता है कि लोग आपको संदिग्ध नजरिए से देख रहे हैं, आपसे नाराज हैं; तब भी जब वे नाराज नहीं होते हैं। पर मूड ऐसा ही है या नहीं, यह अहसास कपड़ों से, भाषा से या अभिवादन से नहीं होता है बल्कि मूल से होता है। आस-पास ज्यादातर मुसलमानों के बीच एक हिन्दू। और जैसा कि मैंने कहा, मुमकिन है, वे आपको देख नहीं रहे हों, घूर नहीं भी रहे हों फिर भी अहसास तो होता है। अलग-अलगाव का अहसास, निश्चित रूप से।

मैं घाटी में पिछली बार 2018 में आई थी। एक ऐसे समय में जब दो पूरी तरह भिन्न आदर्शों के बीच एक नाटकीय राजनीतिक प्रयोग था। एक ऐसे समय में जब शांति डराती थी और मूड ऐसा था कि कश्मीर बदलाव के लिए तैयार नहीं है, आर्थिक या सामाजिक तौर पर। तबसे, राजनीतिक अनुभव खाली व नाकाम रहा है। तीन राज्यपाल आए और गए तथा कश्मीर (और देश के बाकी हिस्सों) की किस्मत का सबसे बड़ा व निर्भीक निर्णय भी हुआ कि अनुच्छेद 370 खत्म!

बावजूद इसके गुजरे तीन वर्षों में कश्मीर वैसा ही है, जैसा मैं जानती थी। अलग-थलग।

अचंभित होकर आप पूछ सकते हैं, क्यों?

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घर जिस सड़क पर है वह लाल चौक पर है, श्रीनगर में आर्थिक, राजनीतिक और आंदोलन का केंद्र। एक संकरी सड़क पर 2.25 एकड़ में फैला यह वह मोहल्ला है जहां हिन्दू परिवार रहते, जीते और वर्षों से बहुत कुछ बर्दाश्त करते आए हैं। झेलम नदी के पास स्थित इस संकरी सड़क के एक छोर पर मंदिर है। भव्य और नदी के सभी किनारों से दिखने वाला। यह मंदिर यहां रहने वालों को न सिर्फ आतंकवाद, आंदोलन, बाढ़, मतभेद – जैसी हर तरह की मुश्किलों से बचाता रहा बल्कि पहचान का प्रतीक भी बन गया। पंद्रह हिन्दू परिवारों की मंदिर लेन। मंदिर वाली यह सड़क दीवारों से घिरी हुई है और एक किनारे काला बड़ा गेट है जो एक समय ‘लाल दरवाजा’ के नाम से जाना जाता था। वही मंदिर लेन भी है जो पुराने मुश्किल समय में काफी करीब आ गई और एक दूसरे में परिवार देखने लगा। मिलकर उग्रवादियों का मुकाबला किया, इस्लामिक उग्रवाद से जूझकर बचा रहा, मौत और विद्रोह के साथ जीवन की अनिश्चितता का डर झेला। इस तरह गली परिवार बड़ा हुआ और एकजुटता तथा एकता की यादें बुनता रहा। मंदिर लेन का हर निवासी यह मौन गर्व लिए हुए है कि हम एक बड़ा साझा परिवार हैं।

ये ही लोग जब उस समय को याद करते हैं तो उनकी यादें दर्द और तकलीफ से भर जाती हैं। लेकिन इसमें गर्व भी है कि उस असामान्य समय में भी इन लोगों ने मिलकर रहना तय किया और अनिश्चितता में सामान्य की तरह रहने के लिए शांति स्थापित की।

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आज जब ‘नया कश्मीर’ बन रहा है तो मंदिर लेन का जोश और उत्साह लगभग खत्म है। परिवार इधर-उधर हो गए हैं। बच्चे घर छोड़कर घर बनाने निकल गए हैं ऐसी जगह जहां सामान्य ‘नार्मल’ अहसास हो और सांसें भी सहज हों। बुजुर्गों ने बच्चों का अनुसरण किया है, अपने जिस कारोबार से वे अनिश्चित समय में यहां जी पाए उसे समेट लिया है और बाकी जीवन जीने तथा डिक्सनरी में पारिभाषित ‘सामान्य’ को महसूस करने के लिए निकल पड़े हैं। एक समय इस स्थान को जीवंत बनाए रखने वाले 15 परिवारों में से ज्यादातर निकल गए हैं सिर्फ तीन परिवार कोई 12 वर्षों से रह रहे हैं। लिहाजा, नए समय में यह सड़क अब उपेक्षित हो गई है। मंदिर में नया पर रक्षात्मक आलसी पुजारी है। पुराना गौरव खत्म हो चुका है क्योंकि 2014 की बाढ़ में टूटी मंदिर की दीवारें अब भी पहले जैसी नहीं बनी हैं। हर जगह घरों के आसपास ऊंची, व्यावसायिक इमारतें खड़ी हो गई हैं जो बहुसंख्यक आबादी वाले मुसलमानों की हैं। घर की शांति और एकरूपता में बहुस्तरीय पार्किंग लॉट के निर्माण का शोर है। गली की रक्षा करने वाली दीवार अब हर जगह टूटी हुई, क्षतिग्रस्त है। यहां तक आने वाली सड़क वीरान, टूटी और क्षतिग्रस्त है। रात में यहा प्रकाश नहीं होता और आंदोलन या विरोध प्रदर्शन जैसे मुश्किल समय में कोई सुरक्षा भी नहीं। जिस दिन हम यहां पहुंचे थे, दो मुस्लिम लड़के रात में एक बंद घर में घुसने की कोशिश करते पाए गए थे। ताला तोड़कर घुस जाना, सामान उठा लेना बहुत आम है खासकर ऐसी हिन्दु गलियों में जहां घरों में वर्षों से ताले लगे हैं (और घर में गए साल लूटपाट भी हुई थी)।

पड़ोसी के यहां से आवाज आई, “आज डर ज्यादा महत्वपूर्ण है।” यह नए कश्मीर की स्थिति है। पड़ोसी का घर विशालकाय है। इसमें 12 कमरे हैं, फलता-फूलता सफल कारोबार है जो उग्रवाद के मुश्किल समय को झेल चुका है पर अब इस घर का उपयोग गर्मियों में छुट्टी मनाने के लिए होता है।

इसमें कोई शक नहीं है कि मंदिर लेन में रहने वाले मुट्ठी भर इन हिन्दुओं के मन मस्तिष्क में एक नए किस्म का डर है। अनुच्छेद 370 को खत्म करने से उनके मन में उम्मीद की एक किरण जगी थी जो अब कम हो गई है। इन लोगों ने अपने ऊपर आई नई किस्मत को स्वीकार लिया है। जीवन सामान्य बना रहेगा और यह वैसे ही होगा जैसे 1990 के दशक में था। लिहाजा घरों को समय की दया पर छोड़ दिया गया है। जहां तक मंदिर लेन के घरों की बाहरी टूटी दीवारों का मामला है वे देखने में शानदार हैं। महल जैसे इन घरों में हर साल गर्मी में पेंट की नई परत चढ़ती है। मरम्मत के बाद चमकती छत, शानदार लॉन में ट्रिम की हुई घास, खिले हुए गुलाब, कुमुद और सूर्यमुखी के फूल इन घरों की अलग कहानी कहते हैं। नए समय का मुकाबला करने के लिए इन्हें हर साल दुरुस्त किया जाता है। हालांकि, मंदिर लेन के घरों को अब नए समय के लिए खराब होने दिया जा रहा है। पेंट की परत उतरती जा रही है, बगीचे छोटे-मोटे जंगल जैसे हो गए हैं क्योंकि इन घरों और गली को सुंदर बनाए रखने का उत्साह या कहिए कि उनसे लगाव खत्म हो गया है।

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खराब होते समय के लिए अपने घर की मरम्मत करा रहे एक पड़ोसी ने सवाल किया, “अपने घर के दरवाजों, खिड़कियों, बाथरूम में मैं पैसे क्यों लगाऊं जबकि मैं जानता हूं कि अगली बार जब मैं यहां आउंगा तब तक ये चोरी जा चुके होंगे।”

मैं देख सकती हूं कि सुबह की सैर करने वाले लोग अपने बगीचे में गोल-गोल चक्कर लगा रहे हैं या संकरी गली में बाएं से दाएं टहल रहे हैं। मैं उनकी कोई सहायता नहीं कर सकती पर यही सोच रही हूं कि चीजें कितनी बदल गई हैं।

कश्मीर को ‘नया कश्मीर’ क्यों कहा जा रहा है जब भावना, उसका होने का एक हिन्दू का अहसास अब भी ‘दूसरों’ का ही है। अनुच्छेद 370 खत्म करने से आत्मविश्वास या शांति की कौन सी भावना जगी है जिसका प्रचार देश के बाकी हिस्से और दुनिया भर में ‘नया कश्मीर’ के रूप में किया जा सकता है? जबकि नाराजगी (मुसलमानों में) और अलग-थलग होने का भाव (हिन्दुओं में) पहले जैसा ही है। केंद्र सरकार किस ‘नया कश्मीर’ पर गर्व कर रही है जबकि अल्पसंख्यकों को अब भी अपना ख्याल खुद रखना पड़ता है और वे डर व अनिश्चय के माहौल में जी रहे हैं जबकि बहुसंख्यकों की मनमानी वैसे ही चल रही है। जो उनके लिए कसमें खाने वालों पर ‘विचार’ किया जाता है (जैसे हाल में गुपकर टीम के साथ हुई)।

ऐसी हालत में मंदिर लेन के मुट्ठी भर हिन्दू जो उग्रवाद झेल चुके हैं, नया कश्मीर का भाग होना नहीं चाहते हैं क्योंकि जीना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गया है। इसीलिए कश्मीर छोड़ चुके पंडित वापस आने के इच्छुक नहीं हैं। संपत्ति में निवेश करने के लिए तैयार बाहरी व्यक्ति को यहां वैसी शांति नहीं मिलेगी जितनी सुंदर यह जगह है। वैसे भी, स्थानीय लोगों की यह प्रतिज्ञा है कि वे ‘अपनी भूमि’ किसी और को लेने और उसपर कब्जा करने नहीं देंगे। इस तरह, अनिश्चितता बनी हुई है और कुछ खास हुआ हो तो वह अभी भी नजर नहीं आ रहा है।

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एक स्थानीय पत्रकार ने मुझे समझाया, “वे गुस्से से भरे हुए हैं”।  अनुच्छेद 370 को खत्म करने से उनमें नए किस्म का गुस्सा पैदा हुआ है (ऐसा जिससे उग्रवाद फिर जिन्दा हो सकता है)। उसने कहा, मामला यह नहीं है कि, “ऐसा किया गया बल्कि कैसे किया गया” का है।

गुजरे इन तीन वर्षों के बाद भी कश्मीर को जैसा मैं जानती थी, कश्मीर वैसा ही है।  अलग-थलग कड़वाहट के साथ। पहले के मुकाबले ज्यादा।

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