सीटें बढ़ीं तो बिगड़ेगा संतुलन!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 दिसंबर को संसद भवन की नई इमारत का भूमिपूजन किया तो इसे लेकर खूब चर्चा हुई। दिक्कत यह है कि सारी चर्चा सिर्फ एक पहलू पर केंद्रित रही। सबने इस पर विचार किया कि इसकी जरूरत है या नहीं है। विरोध करने वालों को लगता है कि अभी नए संसद भवन की जरूरत नहीं है। इसके पक्ष में अनेक तर्क हैं। कोरोना वायरस की महामारी के कारण पैदा हुई आर्थिक मुश्किलों का तर्क है तो पुरानी संसद की ऐतिहासिकता और उसकी विरासत का तर्क भी है। यह भी तर्क है कि ब्रिटेन सहित दुनिया के अनेक देशों में इससे भी पुराने संसद भवन है और वहां उसी को बचा कर रखा जाता है। दूसरी ओर इसका समर्थन करने वालों का तर्क है कि नया संसद भवन आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक होगा या जैसा कि देश के शहरी विकास सचिव ने लेख लिख कर बताया कि यह ‘पीपुल्स पार्लियामेंट’ होगी।

इस बात पर कम चर्चा हुई या पासिंग रेफरेंस के तौर पर हुई कि नए भवन में सीटों की संख्या ज्यादा होगी। लोकसभा में 880 सीटों की व्यवस्था की गई है, जिसे बढ़ा कर 1,224 किया जा सकता है और राज्यसभा में 332 सीटों की व्यवस्था की गई है। मौजूदा संसद भवन में लोकसभा में साढ़े पांच सौ और राज्यसभा में ढाई सौ सांसदों के बैठने की व्यवस्था है। इससे ज्यादा लोग अगर सदन में बैठेंगे तो धक्कामुक्की वाली स्थिति हो जाएगी, जैसी कि अक्सर ब्रिटेन की संसद वेस्टमिनिस्टर में दिखाई देती है। हालांकि इस धक्कामुक्की वाली स्थिति के बावजूद वहां नए संसद भवन की बजाय 1870 में बनी पुरानी इमारत का ही संरक्षण किया जाता है।

बहरहाल, 2022 के अक्टूबर तक जो नया संसद भवन बन कर तैयार होगा उसमें लोकसभा के 880 सदस्यों की बैठने की व्यवस्था होगी। इसका मतलब है कि सरकार चाहे तो तत्काल लोकसभा की 330 सीटें बढ़ा सकती है। हालांकि सीटों की संख्या बढ़ाने पर 2026 तक रोक लगी हुई है। 1976 में हुए संविधान संशोधन के जरिए यह रोक 2001 तक लगाई गई थी। 2002 में तब की केंद्र सरकार ने परिसीमन कानून बनाया, जिसके तहत एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग का गठन किया गया और उसने संसदीय सीटों और उसके तहत आने वाली विधानसभा सीटों में कुछ बदलाव किए। कई सीटों का स्वरूप बदला, नाम बदला, नए इलाके शामिल हुए और सुरक्षित सीटों में भी बदलाव हुआ। हालांकि इस संशोधन कानून में भी इस प्रावधान को बनाए रखा गया कि 2026 तक लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी और उसके बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इसका मतलब है कि प्रभावी तरीके से 2031 की जनगणना तक सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक है।

परंतु बहुमत की सरकार जब चाहे तब इसे बदल सकती है। सरकार चाहे तो बढ़ती आबादी और लोकसभा सीटों की संख्या के बीच असंतुलन को आधार बना कर नया परिसीमन कानून बना सकती है, जिसमें 2021 की जनगणना के आधार पर ही सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान किया जा सकता है। हालांकि अभी तक सरकार ने या किसी पार्टी ने ऐसी मंशा जाहिर नहीं की है, पर नया संसद भवन बनाने की हड़बड़ी और उसमें सीटों की संख्या बढ़ाए जाने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। वैसे भी अगले दस साल खाली रखने के लिए तो इतनी सीटें बढ़ाई नहीं जा रही हैं!

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़नी चाहिए। क्योंकि अभी लोकसभा की सीटों का कोई पैमाना नहीं है। अभी मतदाताओं की संख्या के लिहाज से आंध्र प्रदेश की मलकाजगिरी सीट सबसे बड़ी है, जहां करीब 32 लाख मतदाता हैं। सबसे छोटी सीट लक्षद्वीप की है, जहां सिर्फ 50 हजार मतदाता हैं। औसतन 15 से 20 लाख मतदाता हर क्षेत्र में हैं। वैसे छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आबादी का पैमाना नहीं तय किया जा सकता है। तभी इनके लिए लोकसभा की कम से कम एक सीट की अनिवार्यता लागू की गई है। बहरहाल, ऐसा लग रहा है कि आखिरी बार सातवें दशक में जब सीटों की संख्या तय की गई तो सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देने के सिद्धांत के तहत सीटों का आवंटन हुआ। परंतु उसके बाद बढ़ती हुई आबादी की वजह से संतुलन बिगड़ गया। जैसे उत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी और विकास रूका रहा, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों में विकास दर बढ़ी तो आबादी बढ़ने की दर स्थिर हो गई।

यहीं कारण है कि तमिलनाडु में सात करोड़ से कम की आबादी है और सांसद 39 हैं, जबकि मध्य प्रदेश की आबादी साढ़े साढ़े सात करोड़ है और लोकसभा की सीटें सिर्फ 29 हैं। देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 80 सांसद हैं। इसका मतलब है कि लगभग 30 लाख की आबादी पर एक सांसद है। जबकि तमिलनाडु में 16-17 लाख की आबादी पर एक लोकसभा सीट है। अगर 16-17 लाख की आबादी पर लोकसभा की एक सीट का पैमाना मानें तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा की डेढ़ सौ सीट बनानी होगी। बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़ कर 70 हो जाएंगी। मध्य प्रदेश में 29 की बजाय 50 सीट बनानी होगी। राजस्थान की आठ करोड़ की आबादी के हिसाब से वहां भी 50 के करीब सीटें बनेंगी। लेकिन इसके उलट दक्षिण भारत के राज्यों में सीटें कम हो जाएंगी। इस तरह से एक अलग किस्म का असंतुलन पैदा होगा, जिससे उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के राज्यों की राजनीतिक शक्ति असाधारण रूप से बढ़ जाएगी और दक्षिण भारत के राज्य कमजोर हो जाएंगे।

अब भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ताकत असाधारण रूप से ज्यादा है और यहीं कारण है कि ज्यादातर प्रधानमंत्री इसी राज्य से हुए। नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने तो चुनाव लड़ने के लिए गुजरात से उत्तर प्रदेश गए। यह भारतीय राजनीति की जानी हुई हकीकत है कि तमाम प्रयास के बावजूद भाजपा दक्षिण भारत के राज्यों में पैर नहीं जमा पा रही है, जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत में वह इतनी मजबूत पार्टी हो गई है कि उसके लिए कोई पार्टी चुनौती नहीं है। ऐसे में अगर सरकार आबादी का पैमाना बना कर सीटों की संख्या नए सिरे से तय करे या सीटें बढ़ाने का फैसला करे तो क्षेत्रीय असंतुलन बहुत बढ़ जाएगा। ध्यान रहे 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों को लेकर भी दक्षिण भारत के राज्यों ने नाराजगी जाहिर की थी और उन्होंने कहा था कि उन्हें विकास दर बढ़ाने और जनसंख्या नियंत्रित रखने की सजा नहीं दी जानी चाहिए। इसका कारण यह था कि वित्त आयोग की सिफारिशों में ज्यादा आबादी वाले और गरीब राज्यों के लिए ज्यादा फंड का प्रावधान किया गया था। वित्त आयोग की सिफारिशों के विरोध में दक्षिण भारत के राज्यों के वित्त मंत्रियों ने अलग समूह बना कर बैठकें की थीं।

तभी इस बात का अंदेशा हमेशा बना रहेगा कि अगर परिसीमन का इस्तेमाल राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए होता है तो दक्षिण भारत के राज्यों में नाराजगी और अलगाव दोनों बढ़ेगा।  हालांकि परिसीमन की कोई मंशा अभी सरकार ने या सत्तारूढ़ पार्टी ने नहीं दिखाई है। पर तमाम विरोध के बावजूद नए संसद भवन का निर्माण और ज्यादा सदस्यों की बैठने की व्यवस्था इस ओर इशारा है कि जल्दी ही इसकी पहल हो सकती है। अगर सरकार ऐसी कोई पहल करती है तो उसे इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि आबादी नियंत्रण में रखने वाले राज्यों को इसकी सजा न मिले। इसका एक तरीका तो यह हो सकता है कि ज्यादा आबादी वाले राज्यों का विभाजन हो ताकि राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण एक-दो राज्यों में या किसी क्षेत्र विशेष में न हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares