मुख्य अतिथि का ना होना

कोरोना काल में बहुत सी सामान्य चीजें टली हैं। इसलिए अगर इस बार गणतंत्र दिवस में कोई मुख्य अतिथि नहीं आ रहा है, तो इसे इस काल के तकाजे के रूप में लिया जा सकता था। लेकिन ऐसा तब होता, जब ये फैसला भारत सरकार की तरफ से किया गया होता। हकीकत यह है कि भारत सरकार ने हाई प्रोफाइल गेस्ट बुलाने की पुरजोर कोशिश की। आरंभिक घोषणा के मुताबिक उसे सफलता भी मिली। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन गणतंत्र दिवस समारोह में आएंगे, इसकी बाकायदा घोषणा हुई। लेकिन जॉनसन ने कोरोना महामारी की बात कहकर अपनी यात्रा रद्द कर दी। अब ये कयास का विषय है कि सचमुच उन्होंने कोरोना के कारण आना टाला, या इसके पीछे दूसरी वजहें भी हैं। गौरतलब है कि ब्रिटेन में भारत के किसान आंदोलन को लेकर वहां के सांसदों और सिविल सोसायटी कार्यकर्ताओं ने मजबूत अभियान चलाया है। ब्रिटिश संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई।

प्रधानमंत्री जॉनसन से यह मांग की गई कि वे किसानों का मुद्दा भारत सरकार के सामने उठाएं। यह मांग भी की गई कि अगर किसान आंदोलन जारी रहता है, तो वे अपनी भारत यात्रा रद्द कर दें। फिर इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि बीते हफ्ते ब्रिटिश संसद में कश्मीर मसले और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के कथित हनन के मुद्दे पर चर्चा हुई। मान लिया जाए कि इन सबका जॉनसन की यात्रा रद्द होने से कोई संबंध नहीं है, तब भी ये मुद्दा अहम है कि भारत की वैश्विक छवि इस समय क्या है। कुछ रोज पहले पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में दुख जताया कि आज वैश्विक मामलों में भारत की कोई आवाज नहीं रह गई है। भारत उन मसलों पर क्या सोचता है, इसकी परवाह कोई नहीं करता। आखिर ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इस प्रश्न पर देश में गंभीर और विस्तृत चर्चा की जरूरत है। ये दीगर बात है कि जब मेनस्ट्रीम मीडिया किसी और एजेंडे से चल रहा हो, ऐसी बातें आम तौर पर दब कर रह जाती हैं। फिर लोगों को वही मालूम होता है, जो सरकार बताना चाहती है। तो लोगों को यही मालूम होगा कि इस बार कोई अतिथि नहीं आएगा। पिछले पांच दशकों में यह पहला मौका होगा, जब ऐसा होगा। ऐसा इसके पहले आखिरी बार ऐसा 1966 में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के कारण भारत ने किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को आमंत्रण नहीं भेजा था।

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