अर्थशास्त्र में नोबेल और आर्थिक दशा

भारत में जन्मे अभिजीत बनर्जी व उनकी फ्रांसीसी पत्नी एस्थर डुफ्लो व माइकल क्रेमर को 2019 का नोबल पुरस्कार दिए जाने से हम लोग बहुत खुश है। मजेदार बात तो यह है कि हम लोगों की आर्थिक दशा को ले कर खुद अभिजीत बनर्जी का मानना है कि इस देश की अर्थव्यवस्था की ऐसी-तैसी हो चुकी है। वह बहुत बुरी स्थिति में है लेकिन भारत का सौभाग्य जो उन्हें अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ही नोबल पुरस्कार दिया गया है। उनका मानना है कि भारत में लोग अभावग्रस्तता के कारण उपभोग में कटौती कर रहे हैं और जिस तरह से गिरावट जारी है उसे देखकर लगता है कि उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।

अभिजीत बनर्जी व उनकी पत्नी एमआईटी (मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) में प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत खराब है। एनएसएस के आंकड़े देखे तो पता चलता है कि 2014-15 से 2017-18 के बीच शहरी और ग्रामीण भारत के लोगों ने अपने उपभोग में भारी कटौती की है। सालों बाद पहली बार ऐसा हुआ है और यह तो अभी संकट की शुरुआत है।
वे अपनी अगली पुस्तक के साथ भारत आ रहे हैं।पुस्तक का विमोचन करने के लिए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत करोड़ो भारतीय इस दंपत्ति के सम्मान में पलक पांवड़े बिछाए बैठे हैं। ध्यान रहे उनके माता-पिता भारत में ही रहते हैं। क्या संयोग है कि खुद को वामपंथी मानने वाले इस विद्वान ने अपने नाम के साथ विनायक शब्द महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर के विनायक को ध्यान में रखते हुए ही रखा था। इसे संयोग ही कहे या कुछ और कि एक भारतीय मूल के अर्थशास्त्री को इतना बड़ा पुरुस्कार मिलने के बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा ने प्रतिक्रिया में कोताही बरती।

हमारी याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है और हम पिछली बातें बहुत जल्दी भूल जाते हैं। वैसे पत्नी के साथ अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार पाने वाले अभिजीत बनर्जी का अतीत विवादास्पद भी रहा है। उन्हे अर्थशास्त्र के क्षेत्र में जिस तरह का दृष्टिकोण रखने के लिए पुरस्कार मिला है उनकी कभी इस तरह की व्यवहारिक आर्थिक सोच नहीं रही। मई 1983 में अभिजीत विनायक बनर्जी को 360 अन्य जेएनयू के छात्रों के साथ तत्कालीन उपकुलपति की हत्या करने के प्रयास में 12 दिन के लिए जेल भेजा गया था। इन 360 छात्रों में 59 महिलाएं भी थी। उन लोगों ने अपनी मांगों को लेकर उपकुलपति का घेराव किया था व उन्हें बचाने के लिए आई पुलिस के साथ हाथा-पाई की गई थी। अगर तत्कालीन सरकार ने उस पर लगे गंभीर आरोपों को हटाया नहीं होता तो वह कभी भी पीएचडी करने के लिए हॉवर्ड नहीं जा पाते।

उसने न केवल उपकुलपति का घेराव किया था बल्कि उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रविरोधी नारे भी लगाएं थे। इतना ही नहीं वे अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में विवादास्पद विवादों पर लिखते रहे हैं। उन्होंने लिखा कि एक तरफ हम भारत के रूप में फिलिस्तीन लोगों के आत्म निर्णय की मांग का समर्थन करते हैं किंतु कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय की मांग का समर्थन नहीं करते क्योंकि हमें सुरक्षित सीमाएं चाहिए या फिर हम सीमा पार मौजूद बहुत बड़ी बुराईयों से उन्हें बचाना चाहते हैं। या फिर हम लोग कश्मीरियों के भारत में विलय को न्यायोचित ठहराना चाहते हैं। इसकी चाहे कोई भी वजह क्यों न हो। जब हम इस तरह की विवादास्पद बाते करते हैं तब हम लोग अपने घोषित सिद्धांतो से दूर चले जाते हैं।

यही वजह है कि विश्वविद्यालय, सिविल सोसायटी हमारी तरह के लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जोकि सभी तरह की विचारधाराओंके खुलेपनपर स्थासपित की गई थी। हमने उन्हें बहुत मुश्किल से बचा कर रखा हुआ है। छात्र कहते हैं कि ये चीजें एक दिन हमारे दिमागों को बदल देंगी। जब हम उनके बारे में सोचते हैं तो हमारा दिमाग बदलने लगता है।

बनर्जी ने 1981 से 83 के बीच अर्थशास्त्र में एमए किया। वे जानकी नायर सरीखे अर्थशास्त्रियो के समकालीन थे जो इतिहास में एमए कर रहे थे व जेएनयू में पढ़ाते थे। उनके मुताबिक बनर्जी अमेरिका नहीं जाना चाहते थे। उनकी पहली पसंद ब्रिटेन था उन्होंने इनटेक छात्रावृत्ति के लिए इम्तहान दिया और उसमें सफल न होने के कारण काफी निराश हो गए। उनके मुताबिक बनर्जी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। वह तो वामपंथियों के भी वामपंथी थे।

वे अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा के पहले जेल भेजे गए थे। उस धरने में हम लोग भी बैठे। व उनकी गिरप‌तारी के बाद कलकतता से उनसे मिलने आए थे। वे अर्थशास्त्र के अलावा अंग्रेजी, बंगला साहित्य व भाषा को भी काफी महत्व देते थे। मजेदार बात है कि वे स्टूडेंट फैडरेशन ऑफ इंडिया को वोट देते थे पर मुख्यधारा के वामपंथी दलो की आलोचना करते थे। कहा जाता है कि वे स्टूडेंट फॉर सोशशिलस्म एंड फ्री थिंकर के धरने पर भी बैठे थे। मौजूदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी हिस्सा लिया था।

उन दिनों जब छात्र किसी अहम पुस्तक की चर्चा कर रहे होते तो अभिजीत बनर्जी बताते कि वे तो उसे पहले ही पढ़ चुके हैं। वे बहुत बढि़या खाना बनाते थे व भारतीय शास्त्रीय संगीत के शौकीन हैं उन्हें नए से नए पकवान बनाने, खाने का शौक है। जब वे दिल्ली आए तो यहां इटालियन व दक्षिण भारतीय खाना खाने पर जोर देने लगे। उनके समकालीन बताते हैं कि उनको कभी भी प्रयोगिक दृष्टिकोण में रूचि नहीं थी। वे काफी मेधावी थे व उन्होंने जाने-माने अर्थशास्त्री एटिक मैस्किन की देखरेख में प्रोयोगिक अनुसंधान पर पीएचडी की थी। जोकि गरीबी उन्मूलन के लिए अर्थशास्त्र के मेन में किया जाने वाला एक अनूठा प्रयोग था। जहां बड़े सवालों के जवाब मुश्किल से मिलते हैं वहीं उनके इस काम से छोटे सवालों के आसान उत्तर मिल जाते हैं। जिनकी मांग कहीं ज्यादा है।
जब वे दिल्ली आते तो उन्हें लेक्चर देने के लिए जेएनयू में आमंत्रित नहीं किया जाता। वे वहां लोकप्रिय नहीं थे। उनका अनुसंधान ज्यादा राजस्व की शिक्षा से संबंधित था। उन्होंने जेएनयू की स्थापना की 40वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित की गई पुस्तिका में लिखा था कि उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स की जगह जेएनयू में पढ़ना क्यों पसंद किया। जहां अर्थशास्त्र पर खुलकर चर्चा होती थी वहां पत्थर की चट्टानो पर चूडीदार पायजामा व खादी के कुरते पहनकर बैठे विधार्थी मुझे बहुत अच्छे लगते थे। सबसे अहम बात यह है कि वे खुद सरकारी पैसे से चलने वाले संस्थानों में पढ़े थे। यह बात अलग है कि दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उन्हें दाखिला नहीं मिल पाया था।

जिस देश ने अमर्त्य सेन व अभिजीत सरीखे नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री दिए हो उस देश की अर्थव्यवस्था की हालात इतनी बुरी हो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है। अपनी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक के अर्थशास्त्री पति प्रभाकर ने हाल ही में कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था बेहद खराब है पर सरकार इसे नकार रही है। उसे तो मनमोहन सिंह से इस बारे में सलाह लेनी चाहिए। पर जब मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री रविशंकर प्रसाद तक फिल्मों से होने वाली आय को प्रगति का सूचक माने तो यही कहना पड़ेगा कि उन्हें सुनकर रोम को जलता हुआ देखने वाले नीरो की याद हो जाती है। जोकि भूखे लोगों के विद्रोह के वक्त बांसुरी बजा रहा था और कह रहा था कि अगर रोटी महंगी है तो लोग केक क्यों नहीं खाते!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares