जाने जरा शांति नोबेल प्राप्त अबी अहमद को!

क्या‍ अबी अहमद और इथियोपिया को आपने जाना? ये दो नाम इस वर्ष शांति के नोबेल सम्मान के कारण फोकस में हैं। बावजूद इसके कि लोगों के दिमाग में अफ्रीका और उसके देशों के बारे में जब सुनते हैं तो जो तस्वीर बनती है वह गरीबी, भुखमरी से जूझते देश, बिलखते बच्चे, कच्चे घरों वाले कस्बे, शहर, कुपोषण की मार से जूझती महिलाएं, और जगह-जगह हिंसा और युद्ध वाले मुल्कों की उभरती है। लगता है अफ्रीका में गरीबी, भुखमरी और हिंसा के अलावा कुछ नहीं है।

ऐसे ही अफ्रीका में शांति की बात तो जेहन में सिर्फ नेल्सन मंडेला का नाम। याददास्त पर इथोपिया के नाम पर जोर डालेंगे तो इस साल के शुरू में इथोपियाई एअरलाइंस के विमान का हादसा याद हो आएगा। इथियोपिया और उसके प्रधानमंत्री अबी अहमद कही चर्चा में नहीं थे।शांति के नोबेल सम्मान की संभावनाओं में दूर-दूर तक अबी चर्चा में नहीं थे। ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ आवाज उठाने वाली चौदह साल की ग्रेटा थुनबर्ग जरूर सोशल मीडिया में छाई हुई थी।

पर स्वीडन की नोबेल सम्मान कमेटी ने अफ्रीका में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को शांति सम्मान के लिए चुना। और इस घोषण पर सब हैरान। सचमुच शांति के लिए नोबल पुरस्कार की घोषणा होने से पहले तक बहुत ही कम लोगों ने अबी अहमद का नाम सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे 2014 के नोबल शांति विजेता कैलाश सत्यार्थी के बारे में कम लोगों को पता था। लेकिन कैलाश सत्यार्थी के मुकाबले अबी अहमद को गूगल पर तलाशने वाले लोग भी कम क्यों होंगे, इसके अलग कारण हैं।

अबी अहमद दुनिया के नेताओं, प्रधानमंत्रियों के लिए मिसाल है। यदि समझ और जज्बा हो तो दशकों पुराने झगड़ों को खत्म कराने के लिए नेता की निजी पहल, कोशिश क्या कर सकती है इसका उदाहरणअबी अहमदहै। इसे समझ कर स्वीडन की नोबेल कमेटी का दुनिया के सर्वोत्तम सम्मान से अबी अहमद को नवाजना अपने आपमें काबिले तारीफ बात है।

अबी अहमद सिर्फ डेढ़ साल पहले इथियोपिया के प्रधानमंत्री बने। पंद्रहवें प्रधानमंत्री। उन्हें विरासत में एक तहस-नहस अधियानकवादी शासन मिला था।युद्ध से तबाह देश और सिर्फ दमनकारी नीतियों पर टिका देश। उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। सत्ता संभालना मतलबतुरंत पड़ोसी देश इरीट्रिया के साथ बीस साल से चली आ रही लड़ाई से जुझना। दोनों देशों के बीच चले युद्ध में लाखों लोग मारे गए, लाखों परिवार तबाह हुए और क्षेत्र व अफ्रीका के सींग के रूप में जाने वाले इलाके की भू-राजनीति पेचीदा औप बुरी फंसी। इलाके के देशों ने कितना और क्या खोया, इसकी कल्पना कर पाना भी कठिन।

उस स्थिति को डेढ़ साल में अबी अहमद ने सामान्य बनवाया। तभी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अबी अहमद के नाम की घोषणा करते हुए नोबल समिति ने कहा- “शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने के लिए, और खासतौर से अपने पड़ोसी देश इरीट्रिया के साथ सीमा विवाद हल करने को अपनी निर्णायक पहल शुरू करने के लिए अबी अहमद को यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया है।”

एक वक्त में इरीट्रिया और इथोपिया एक ही देश था। लेकिन तीन दशक के लंबे युद्ध के बाद इरीट्रिया अलग देश बना और 1991 में उसने आजादी हासिल की। लेकिन सीमाई शहर बादमे पर कब्जे को लेकर दोनों ही देशों में नाक का सवाल बना हुआ था। हालांकि इस सीमाई इलाके में न तो तेल है न ही हीरे। बावजूद इसके छह मई 1998 से दोनों देशों के बीच जो लड़ाई छिड़ी तो वह पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के लिए सबसे खतरनाक युद्ध में तब्दील हुई। इरीट्रिया के राष्ट्रपति आइसायस अफवेर्की ने इस लड़ाई का इस्तेमाल इरीट्रिया के संविधान को खत्म करने और देश में इमरजंसी लगाने के फैसले को जायज ठहराने के लिए किया और सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत बनाई। इरीट्रिया में सैन्य शासन स्थापित हुआ। जबकि इथोपिया में साठ साल लगातार राजा के रूप में रहे हेले सेलासी और उसके बाद मार्क्सवादी तानाशाह राष्ट्रपति मेंजिस्तु हेले मरियम के लाल आतंक से लेकर मेलेस जेनावी के भ्रष्ट शासन के लंबे वक्त नेइथियोपियों के लोगों को बुरी तरह से तंग-घायल किया हुआ था। देश एक बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा हुआ। एक तरह से इथोपिया खत्म-सा हो चुका था।

अबी अहमद का सत्ता में आना मानों हवा का ताजा झोंका। शपथ लेते, सत्ता में आते ही अबी अहमद इरीट्रिया की राजधानी अस्मारा पहुंचे। वे ऐसी पहल करने वाले पहले इथोपियाई नेता थे। अबी अहमद के इस दौरे में इरीट्रिया के राष्ट्रपति आइसायस अफवेर्की ने उनके साथ सीमा विवाद हल करने और युद्ध खत्म करने की सहमति दी और समझौते पर हस्ताक्षर कर दोनों देशों ने शांति और दोस्ती के नए युग की शुरुआत का एलान किया। एक नेता की इच्छा शक्ति से चुटकियों में झगड़ा खत्म! दोनों नेता सहमत हुए कि अब मिल कर सहयोग करेंगे और आगे बढ़ेंगे।

आज दोनों देशों के बीच बेरोकटोक आवाजाही है, बिछड़े परिवार एक-दूसरे से मिल रहे हैं, दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते बेहतर हैं और इसी से व्यापारिक और आर्थिक सहयोग की वार्ताएं शुरू हुई हैं। इथोपिया की इरीट्रिया के बंदरगाह तक पहुंच बनी है। सिर्फ दक्षिण सूडान को छोड़ कर इथोपिया के अब सभी पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षित और बेहतर संबंध हैं।

यह सब अबी अहमद के आने के बाद हुआ।
इरीट्रिया से बीस साल पुराने युद्ध के खात्मे और पड़ोसी देशों के साथ राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाने के अलावा अबी अहमद ने देश के पुराने ढांचे के कायाकल्प का बीड़ा उठाया। उन्होंने दशकों पुराने राजनीतिक प्रतिष्ठान की सफाई शुरू की जो दमनकारी नीतियों के लिए जिम्मेदार था। इन अठारह महीनों में उन्होंने विपक्षी दलों पर से प्रतिबंध हटाए, हजारों राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और भ्रष्टाचार तथा मानवाधिकारों के हनन के जिम्मेदार आला अधिकारियों को जेल में डाला। अबी अहमद की सरकार के कुल मंत्रियों में आधी तो महिला मंत्री हैं।

एक अफ्रीकी देश में यह सब होना! और फुर्ती से होना!
अबी अहमद ने इथोपिया के इतिहास और विरासत को बचाने के लिए संजीदगी दिखाई तो कड़ी मेहनत भी कर रहे हैं। इसीलिए इथियोपिया पर्यटन का आकर्षक केंद्र बनता जा रहा है। अबी अहमद लोगों के दिल-दिमाग में बस गए हैं।

और अबी अहमद की उम्र कितनी है? सिर्फ तियालीस साल।
इसका अर्थ यह नहीं कि उनके तेज और क्रांतिकारी सुधारों को लेकर आलोचना नहीं है। देश में जातीय हिंसा फिर से सिर उठाने लगी है, सामान्य रूप से लोगों में असुरक्षा की भावना फिर से बढ़ती देखी जा रही है। इरीट्रिया के साथ संबंधों की स्थापना में मजबूती तो दिखाई देती है, लेकिन उसमें आशंकाएं भी छिपी हैं क्योंकि अगले साल देश में आमचुनाव हैं और अबी अहमद ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का भरोसा दिया है, लेकिन देश में जिस तरह का राजनीति माहौल रहा है वह चिंता पैदा करता है। इथोपियाई लोगों में उम्मीदों के साथ इस बात को लेकर खौफ भी है कि आने वाला कल कैसी शक्ल लेगा। इथोपियाई बुद्धिजीवियों ने तो यहां तक कहा है कि इथियोपिया में उम्मीदों का बसंत है तो निराशा की ठंडक भी साथ है।

सवाल है क्या अबी अहमद को मिला नोबल शांति पुरस्कार इथोपिया की उम्मीदों में कुछ नया जोड़ पाएगा? कई आलोचकों, टीकाकारों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मानना है कि अहमद को यह सम्मान वक्त से काफी पहले मिला है। इस क्षेत्र में अभी दोनों देशों के नेताओं को काफी कुछ काम करने की जरूरत है। क्षेत्रीय और घरेलू स्तर पर शांति बनाए रखना जरूरी है, इसके लिए सक्षम संस्थानों का अस्तित्व भी होना जरूरी है, जो अभी अपने शुरुआती काल में ही हैं।

बावजूद इस सबके एक नेता के ऐसे नेतृत्व और साहसी कोशिशों के लिए अफ्रीकी देश और इसके नेता को सम्मान से नवाजा जाना महत्त्वपूर्ण है। इससे दुनिया में यह संदेश जाएगा कि गंभीर और जटिल समस्याओं के हल निकालने के लिए इस तरह की कोशिशों को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिलेगी। आज भी हम अफ्रीका को संघर्षरत देशों के समूह में देखते हैं जहां गरीबी और युद्ध के अलावा कुछ नहीं है, उस सूरत में अबी अहमद को नोबल सम्मान का मिलना देशों को संकटों से निकालने के जोखिम भरे अभियान और पहल को बढ़ावा देता है। आज जब ‘उम्मीद’ शब्द सभी देशों के लिए मामूली-सा शब्द बन कर रह गया है तो क्यों अफ्रीका के इस युद्धरत क्षेत्र को उम्मीदें छोड़नी चाहिए? अबी अहमद को नोबल पुरस्कार मिलना सिर्फ इथियोपिया के लिए उम्मीदों के सार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह पूरे क्षेत्र, पूरे महाद्वीप के लिए उम्मीदें लिए हुए है।

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