गरीबों के लिए

इस बार अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार गरीबी और गरीबों को समर्पित है, यह बड़ी बात है। भारतीय मूल के एक अमेरिकी अर्थशास्त्री सहित जिन तीन अर्थशास्त्रियों को यह सम्मान मिला है, उनका काम दुनिया से गरीबी हटाने पर केंद्रित है। पिछले कुछ सालों में अर्थशास्त्र का नोबेल बाजार की जटिलताओं को समझने, बाजार की व्याख्या, उपभोक्ताओं की प्रवृत्ति जैसे अर्थशास्त्र की गूढ़ अवधारणाओं और सिद्धांतों और मंदी जैसे विषयों पर काम के लिए दिए जाता रहा है। लेकिन दुनिया की गरीबी चिंता इसमें एक तरह से गायब थी। इसलिए इस बार अर्थशास्त्र का नोबल इस मायने में ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि इसके मूल में दुनिया के गरीबों की चिंता है। भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी, उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो और अमेरिका के अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से यह सम्मान दिया गया है। भारत के लिए गौरव और सम्मान की बात इसलिए है कि अभिजित बनर्जी भारतीय मूल के दूसरे अर्थशास्त्री हैं जिन्हें यह सम्मान मला है। उनका जन्म और शिक्षा-दीक्षा तक भारत में हुई है और उनका परिवार कोलकाता में ही है। इससे पहले 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबल मिला था और उनका भी नियमित रूप से भारत से जुड़ाव बना हुआ है।

धरती का सबसे बड़ा श्राप गरीबी ही है। अगर दुनिया से गरीबी हट जाए और असमानता खत्म हो जाए, तो मानव जाति को युद्ध और भुखमरी जैसी मानवजनित त्रासदियों से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो कैसे, यह बड़ा सवाल है। आज दुनिया की कुल आबादी का आधे से भी बड़ा हिस्सा गरीबी में जा रहा है। एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका के कई देश भयंकर गरीबी और भुखमरी जैसे हालात झेल रहे हैं। उन्हें मानवीयता के नाम पर मदद देने को अमीर देश आगे तो आते हैं, पर गरीबी कोई नहीं मिटाना चाहता। अमीरों के लिए तो गरीबी भी एक उद्यम ही है जिस पर वैश्विक राजनीति चलती है। इसीलिए इन अर्थशास्त्रियों ने गरीबी से लड़ने के तरीकों पर विस्तार से काम करते हुए बड़े सवाल उठाए हैं। गरीब मुल्कों में बच्चों को कैसे कुपोषण से बचाया जा सकता है, उनकी शिक्षा पर काम किया जा सकता है, लोगों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है, इन अर्थशास्त्रियों के काम में ये बड़े सवाल सामने आए हैं। भारत में इस साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने गरीबों के लिए जो न्याय योजना पेश की थी, उसे तैयार करने में अभिजित बनर्जी का योगदान रहा है। बनर्जी मोदी सरकार की नीतियों के कटु आलोचक हैं। नोटबंदी जैसे फैसले को उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे ज्यादा घातक बताया था। इसका दुष्परिणाम आज देश भुगत भी रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि भारतीय मूल के इस अर्थशास्त्री के बनाए मॉडल पर दिल्ली सरकार ने अपने सरकारी स्कूलों में ‘चुनौती-2018’ नाम से जो परियोजना शुरू की थी, उसमें उसे कामयाबी हासिल हुई।

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