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Monday, April 19, 2021
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मायूसी अमेरिका को क्यों?

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ईरान के परमाणु डील संबंधी यूरोपियन यूनियन की तरफ से आयोजित वार्ता में भाग लेने से इनकार करने पर अमेरिका ने निराशा जताई है। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि वह निराश क्यों है। इसलिए इस मामले में जो बाइडेन प्रशासन के रुख से दुनिया भर में लोगों को निराशा हुई है। ताजा खबर यह है कि ईरान ने 2015 के परमाणु समझौते में शामिल अमेरिका और अन्य देशों के साथ अनौपचारिक वार्ता करने से इनकार कर दिया है। उसका कहना है कि वह ईरान परमाणु समझौते पर चर्चा के लिए बैठक में शामिल नहीं होगा, जब तक कि उस पर से प्रतिबंध हटा नहीं दिया जाता। ये बात अपनी जगह ठीक है। अमेरिका ने उस पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। सऊदी अरब के प्रति बाइडेन प्रशासन के नरम रवैया भी मायूस करने वाला है। बाइडेन प्रशासन ने उस अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट को जारी कर दिया, जिसमें पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के लिए सऊदी युवराज सलमान को जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन अमेरिका ने युवराज सलमान के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है।

इसके पीछे प्रमुख वजह यही है कि ईरान को नियंत्रित करने की अमेरिकी नीति में सऊदी अरब की प्रमुख भूमिका है। इसलिए अमेरिका सऊदी अरब को नाराज नहीं करना चाहता। लेकिन इसका असर ईरान के रुख पर होना लाजिमी ही है। वैसे ईरान समझौते के मामले में भी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने दो टूक कहा था कि जब तक ईरान 2015 में हुए समझौते का फिर से पालन शुरू नहीं करता, उस पर लगे प्रतिबंधों को नहीं हटाया जाएगा। जबकि ईरान का कहना है कि पहले प्रतिबंध लगाए गए थे। उसके बाद उसने समझौते की शर्तों को तोड़ा। इसलिए पहले अमेरिका को प्रतिबंध हटाने चाहिए।

इसी टकराव के बीच ईयू समझौते को दोबारा लागू करवाने के लिए 2015 के करार में शामिल सभी पक्षों की बैठक आयोजित करने का एलान किया था। तब बाइडेन प्रशासन ने कहा था कि वह इसमें शामिल होने के तैयार है, लेकिन वह पहले ये जानना चाहता है कि समझौते पर अमल के लिए ईरान क्या कदम उठाएगा। यानी बाइडेन प्रशासन ईरान पर सारी शर्तें थोपना चाहता है। तो इस पर ईरान की प्रतिक्रिया कैसे अनुचित मानी जाएगी। बाइडेन प्रशासन अगर ट्रंप के दौर के तनावों को घटना चाहता है, तो उसे भी सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

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