पुराना वक्त, पुराने ख्याल

जब दो साल पहले नए फ्लैट में आया था तब उसे नई तरह से सुसज्जित करवाते हुए उसके तीनो बाथरूम में नए एग्जास्ट फैन लगवाए थे। मेरे लिए घर कैसा भी हो उसके बाथरूम खासतौर पर साफ-सुथरे होने चाहिए। इसलिए उसके तीनो बाथरूम में एग्जास्ट फैन लगवाए ताकि गर्मियों में नहाने के बाद गंदी गरम हवा का सामना न करना पड़े और तरोताजी हवा में नहाया जा सके।

कुछ दिन पहले एक-एक करके तीनो ही पंखे चलने बंद हो गए। जब उनका गारंटी कार्ड लेकर विक्रेता के पास पहुंचा तो उसने उन पर नजर डालकर कहा कि आप को पंखा लगवाए दो साल से ज्यादा समय हो गया है व इसकी गारंटी महज तीन साल. तक ही थी। मैंने उससे कहा कि मैंने तो इतनी अच्छी कंपनी के महंगे पंखे आपके कहने पर खरीदे थे। मगर यह तो गारंटी पीरियड समाप्त होते ही खराब हो गए।

वहं हंसते हुए कहने लगा कि सर अब जमाना बदल गया है। उन्हें फेंककर नए खरीद लीजिए क्योंकि उन्हें ठीक करवाने से कोई फायदा नहीं होगा। ऐसा तब भी हुआ था जब कि नया 65 इंच का टीवी खराब हो गया था। उस पर तस्वीर के बीच करीब डेढ़ इंच की एक सफेद लाइन आगे लगी थी जब मैंने कंपनी से शिकायत की तो उसके प्रतिनिधि ने आकर पूछा कि इसे लिए हुए कितना समय हो गया है?

तो मैंने बताया कि करीब 5 साल हो गए होंगे वह कहने लगा कि साहब बहुत चल गया। और इससे ज्यादा क्या चले। धीरे-धीरे करके इसकी सफेद लाइन बढ़ जाएगी व एक दिन यह हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। आपको एक सलाह कि इसे भूलकर भी मत ठीक करवाइएगा। ध्यान रखिएगा कि अब पुराना समय नहीं रहा। अब और बड़ी इलेक्ट्रॉनिक सामान की कोई गारंटी नहीं होती। यह तो कमोबेश चीनी सामान जैसे होंगे जिनके बारे में कहा जाता है कि चल गया तो चांद तक नहीं तो शाम तक। वह कब तक चलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं होती है।

तब याद आया कि जब कानपुर में व फिर दिल्ली में ही दशको सरकारी मकानों में रहता था मैंने तब वहां कभी पंखो को खराब होते नहीं देखा था। हर महीने गर्मियो के पहले पंखों में ग्रीस आदि डाल दी जाती थी। इसके तांबे के तारो की वाइंडिंग वाले ये पंखे दशको तक बिना किसे दिक्कत के चलते रहते थे। इससे पहले मैंने कानपुर में भी किसी पंखे को खराब होते नहीं देखा था। वे लगातार दशको के चलते रहते थे व काफी भारी होते थे।

याद आया कि समय कितना बदल गया है। हमारे समय में तो बिजली के पुराने तार तक बिक जाते थे व उन्हें जलाकर उनका तांबा निकाल कर कबाड़ी के दामों पर उसे बेचते थे। मैंने वह समय देखा हैं जब हम तो हर चीज का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर उसकी अधिकतम कीमत वसूलने की कोशिश करते थे। हमारे समय में जूता फट जाने पर, चप्पल की बट्टी टूट जाने पर उसे मोची से सिलवा कर पुन पहन लिया करते थे। जूते चपलो में चमड़े पर रबड की तल्ली लगवाए जाते थे ताकि वे काफी समय तक चल सके।

अगर कोई कपड़ा फट जाता था तो उसे रफू करवा लिया जाता था। हम किसी भी इस्तेमाल की चीज को आसानी से नहीं छोड़ते थे। खाना पकाने के बर्तनो में कलाई करायी जाती थी व रविवार को छुट्टी वाले दिन पीतल के बर्तनो पर कलई चढ़ाने वाला व्यक्ति आता था ताकि उन बर्तनो की जिदंगी बढ़ाई जा सके। फिर धीरे-धीरे तांबे व पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल ही बंद हो गया।

एक बार मेरा भतीजा कानपुर आने के बाद जब अपनी नानी के घर दिल्ली गया तो वह उनसे कहने लगा कि हमारे बाबा के घर में तो सोने के बर्तन हैं। वह हमारे घर में पीतल के बर्तनों को सोने के बर्तन समझा करता था। फिर एल्यूमिनियम व उसके बाद स्टील के बर्तनो के इस्तेमाल ने जोर पकड़ा। यह वह समय था जबकि दर्जी बड़े लोगों के पुराने कपड़े काटझांट कर उन्हें घर के छोटे सदस्यो के लिए बना देता था। वह किस सीमा तक फिट होते थे इनके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा होगा।

यहां तक कि लोहे की बाल्टी में छेद होने पर उसमें भी पैबंदलगा दिए जाते थे। अब कपड़े फटने की नौबत ही नहीं आती है। लौहे की बाल्टियो का स्थान प्लास्टिक व स्टील की बाल्टियो ने ले लिया हैजो कि आमतौर पर खराब नहीं होती अथवा एक बार टूट जाने पर हमेशा के लिए बेकार हो जाती है। पिछले कुछ दशको में तो तकनीक में आई क्रांति के कारण बहुत बदलाव आए हैं। आजकल कोई भी पुराना सामान बेच पाना बहुत मुश्किल है। अगर आप उससे छुटकारा पाना चाहते तो उसे किसी व्यक्ति को मुफ्त में देना पड़ता है। विदेशी की तरह कोई उसे लेने के लिए तैयार नहीं है तो पुराने टीवी से लेकर फ्रिज बेचना या किसी को दे पाना बहुत बड़ी समस्या है।

मेरा मानना है कि तकनीकी विकास का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि बड़ी संख्या में लोगों के हाथों में आधुनिकतम उपकरण आ गए हैं। इसमें सेलफोन से लेकर कंप्यूटर तक शामिल है। आज रिक्शेवाला भी सेलफोन लेकर घूम रहा है। वहीं पुरानी चीजो के मरम्मत या इस्तेमाल जरूरी रखने की परंपरा समाप्त होती जा रही हैं। मुझे नही पता कि यह एक अच्छा संकेत है या बुरा। जब मैं इसे बुरा संकेत मानता हूं तो मुझे लगता है कि मैं अपने पुराने ख्यालों के कारण ही ऐसा सोच रहा हूं।

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