विपक्ष रोए, राजनीति करे!

राहुल गांधी, अखिलेश, मायावती, तेजस्वी, शरद पवार, कुमारस्वामी, स्टालिन आदि पापी बनेंगे यदि इन्होंने देश की मौजूदा स्थिति में राजनीति नहीं की। ये भारत राष्ट्र-राज्य के साथ गद्दारी करेंगे यदि ये राजनीति करते हुए सरकार की कमियों को बता कर अपनी बात नहीं कहते हैं। इन्हें देश के मान-सम्मान के साथचीन के सीमा पर प्रतिदिन के चीरहरण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।  सरकार से जवाब तलब करना चाहिए। इन्हें आर्थिकी की मौत और महामारी के कुएं में मर रही जनता के लिए रोना चाहिए। काले कपड़े पहन कर सड़क पर बैठना चाहिए। प्रदर्शन न करें, जेल न भरें लेकिन काले कपड़े पहन कर विपक्ष सड़क पर बैठ कर स्यापा तो कर ही सकता है। बेमौत मौतों पर मोमबत्ती तो जला सकता है। उन सरकारी सिविल अस्पतालों, श्मशान के आगे तो बैठ सकता है, जहां सरकार-प्रशासन की लापरवाही से लाशें निकल रही हैं। ऐसे वक्त में भी विपक्ष क्यों घर बैठा रहे? आजाद भारत के इतिहास में कब पहले बेमौत 15 हजार लोग मरे हैं? कब भारत में लाखों-करोड़ों परिवार बीमारी, भूख-तकलीफ में वैसे रहे हैं, जैसे आज है या आने वाले महीनों में रहेंगे? तभी विपक्ष का आज धर्म है कि वह मौत पर, लोगों की तकलीफ में कंधा देने के लिए, रोने के लिए, उठावने के लिए सड़क पर काले कपड़े पहन कर बैठने जैसी राजनीति करें।

हां, दुश्मन के हाथों देश का सीमा पर चीरहरण जब है, सरकार के निकम्मेपन, उसकी मूर्खता में देश की आर्थिकी और जनता को जब मौत के कुएं में सांस लेनी पड़ रही हो तो विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सत्य बोलने का साहस करे। इस बात की फिक्र नहीं करनी चाहिए कि मीडिया उनका कहा नहीं बताएगा। वह उलटे गालियां देगा। इससे क्या फर्क पडता है? राहुल गांधी, सोनिया गांधी, अखिलेश, मायावती आदि सभी को ध्यान रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने 19 महीने पूरे मीडिया को सरकारी भोंपू बना कर रखा था। देश को विपक्ष की खबर नहीं लगती थी बावजूद इसके विपक्ष लोगों की संवेदनाओं के साथ गुपचुप ऐसे जुड़ा कि वक्त आया तो लोगों ने एक झटके में इंदिरा गांधी को उखाड़ फेंका।

आज इमरजेंसी से असंख्य गुना भयावह दशा है। चीन ने दुनिया के आगे भारत राष्ट्र-राज्य की प्रतिष्ठा का बाजा बजवा दिया है। आर्थिकी रसातल में है। भारत वापिस कृषि आधारित इकोनॉमी में लौटता हुआ है। बीस-तीस करोड़ लोग वापिस गरीबी रेखा से नीचे लौटे सकते हैं तो अमेरिका,यूरोप के जरिए आईटी जैसे प्रोफेशन व खाड़ी जैसे देशों में नौजवानों के रोजगार की तमाम संभावनाएं खत्म प्रायः हैं।लोकतंत्र और संस्थाओं का भगवान मालिक है। एक व्यक्ति की उंगली पर टिका पूरा देश भरभरा कर गिर पड़ने के कगार पर है। प्रधानमंत्री मोदी ने इतना भी दम नहीं दिखाया कि अपने कथित दोस्त ट्रंप को एचबी-1 वीजा खत्म करने से रोकें। इसका मतलब है कि पढ़े-लिखे उच्च-मध्य वर्ग के विदेश जा कर रोजगार की संभावना पर ताला लगा है तो दिहाड़ी मजदूर के परिवार में भी रोजी रोटी का लाले पड़ने हैं।

जाहिर है गांव-कस्बों-शहर-महानगर सर्वत्र घर-घर में चिंता, परेशानी, बीमारी, मौत, भूख, बेरोजगारी, बरबादी का वह ख्याल पसरेगा, वह भाव बनेगा, जिसमें वह विपक्ष को सुनना चाहेगा। मीडिया भले न बताए, जनता विपक्ष को जान लेगी। उसे बुरा लग रहा है कि हर दिन मौतें हो रही हैं, हर दिन आर्थिकी रसातल में जा रही है, हर दिन चीन आंखें दिखा रहा है, हर दिन संक्रमण पसर रहा है लेकिन राहुल गांधी या अखिलेश या विरोधी पार्टियां बिना प्रतिदिन की ब्रीफ्रिंग के हैं। वे बिना राजनीति के हैं।

भला क्यों? क्या इस चिंता में कि भोंपू मीडिया उनकी बात नहीं बताएगा और उलटे मोदी सरकार ऐसी हेडलाइन बनवा देगी, जिसमें उलटे कुप्रचार होगा कि कांग्रेस तो चीन की दल्ला पार्टी है! कांग्रेस मौत की सौदागर है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से देश की आर्थिकी रसातल में गई है या डॉ. मनमोहनसिंह ने देश को बेच खाया! अखिलेश-तेजस्वी तो बच्चा पार्टी है या शरद पवार, चिदबंरम, दिग्विजयसिंह, एके एंटनी जब सत्ता में थे तब इन्होंने क्या किया था?

इस तरह के हल्ले की विपक्ष को अब चिंता नहीं करनी चाहिए। न भोंपू मीडिया की चिंता करनी चाहिए और न सत्ता के अहंकारी हमलों की। इसलिए की पहली बात साल बाद, दो साल, पांच साल, दस साल बाद सत्य अनिवार्यतः जन-जन के बीच मौजूद होगा। दूसरी बातजनता आज चौबीस घंटे चिंता में है। नरेंद्र मोदी का जादू भले चाहे जो हो, वे महामारी-बीमारी और मौत को रोकने में फेल हैं। बीमारी-भूख-कंगाली का वह दौर शुरू हो गया है जो 2024 तक भारत को न जाने कितनी तरह से लीलेगा। अभी जो बामन-बनिए-भक्त लंगूर उनकी तुताड़ी लिए हुए हैं वे भी तीन साल बाद बिलबिलाते मिलेंगे। नरेंद्र मोदी-अमित शाह, भाजपा, संघ के बस में अब घटनाएं नहीं हैं। हेडलाइन से घटनाओं को बस में लेने की आखिर एक सीमा होती है। फिर महामारी को जब ट्रंप और पुतिन कंट्रोल नहीं कर पाए तो नरेंद्र मोदी तो पहले दिन से ही ताली-थाली और दीये के भरोसे हैं। भारत आगे महामारी का नंबर एक घर बनेगा और करोड़ों लोग संक्रमित होंगे।

तभी एक तर्क है और मैं भी एक हद तक मानता हूं कि विपक्ष को कुछ करने की जरूरत नहीं है। वह घर बैठा रहे। प्रधानमंत्री मोदी अपने अहंकार, अपनी सर्वज्ञता में वह सब कर देंगे, जिससे भारत इतना बीमार, लुटा-पिटा होगा कि दुनिया भर में हिंदू राजनीति कलंकित होगी।

पर इस सोच में फिर विपक्ष का धर्म क्या हुआ? क्या यह राष्ट्र-राज्य, लोकतंत्र को कमजोर बनाते हुए जनता के साथ धोखा नहीं होगा? मोदी सरकार ने जिस मुकाम पर देश को पहुंचाया है उसमें 138 करोड़ लोगों की गरिमा, इज्जत, बीमारी, मौत में सहारा देने के लिए, संवेदना के लिए विपक्ष को बोलना ही होगा। विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं ने यदि पिछले छह साल वाला ढर्रा अपनाए रखा तो न केवल देश और जर्जर बनेगा, बल्कि संकट से लड़ने की देश में न ताकत बचेगी, न विचार बचेगा और न विकल्प। इसलिए अपनी ईश्वर से प्रार्थना है कि विपक्ष भले दीया ले कर सड़क पर बैठे मगर बैठे, वह अंधकार युग न आने दे।

2 thoughts on “विपक्ष रोए, राजनीति करे!

  1. वैसे आपको एक बात बता दूं अगर बिहार में तेजस्वी राघोपुर से लड़े तो परिणाम अमेठी के जैसे होंगे बेहतर है कि वो अपना वायनाड ढूंढ लें या फिर अपनी माता या चाचा नीतीश या चाचा सुशील के जैसे परिषद से राजनीति करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares