पाकिस्तान के कहने पर ओआईसी बैठक - Naya India
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पाकिस्तान के कहने पर ओआईसी बैठक

हाल में मलेशिया में आयोजित इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी द्वारा आयोजित सम्मेलन के बाद पाकिस्तान में सऊदी अरब की मदद से कश्मीर के हालात पर ऐसा ही सम्मेलन आयोजित किए जाने के ऐलान के बाद भारत इस्लामी संसार में अलग-थलग पड़ता दिखाई दे रहा है। हालांकि यह सब दुनिया के इस्लामी संसार पर अपना दबदबा जमाए रखने के लिए किया जा रहा है मगर इस काम में पाकिस्तान की सऊदी अरब द्वारा मदद करना बहुत अहमितयत रखता है।

सऊउी अरब अभी तक खुद को इस्लामी जगत का नेता मानता आया है मगर जब मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद द्वारा ईरान के सहयोग से वहां ओआईसी की बैठक बुलाई गई तो सऊदी अरब बौखला उठा। बताते हैं कि मलेशिया के इस सम्मेलन को पाकिस्तान ने भी शुरू में अपना पूरा सहयोग दिया। मगर जब सऊदी अरब ने दबाव डाला तो इमरान खान ने खुद को इस बैठक से अलग कर लिया था। कुआलालंलपुर की में होने वाली बैठक में हिस्सा लेने वाले ईरान को भी सऊदी अरब पसंद नहीं करता। मालूम हो कि तुर्की की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी हिस्सा लिया था। यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि भारत के लिए सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात की बहुत अहमियत है और वह अपनी विदेश नीति तैयार करते समय उनका पूरा ध्यान रखता है।

पाकिस्तान को काफी उम्मीद थी इस्लामी बिरादरी से।पर भारत ने 5 अगस्त को कश्मीर में अनुच्छेद 370 समाप्त करने का फैसला लिया तो उसके विराध में उसे ओआईसी में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। इसलिए वह बौखलाया हुआ है। पाकिस्तान ने बहुत बड़ी मात्रा में सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात से कर्ज लिया हुआ है ताकि वह अपनी तेजी से डूब रही अर्थव्यवस्था को किसी तरह से संभाल कर रख सके।

टर्की के मुताबिक सऊदी अरब ने तो पाकिस्तान को धमकी दी कि अगर उसने यह बैठक नहीं बुलाई तो वह पाकिस्तान स्टेट बैंक में जमा अपने पैसे को निकाल लेगा। इससे बहुत बड़ी आर्थिक समस्या पैदा हो जाएगी। ओआईसी का गठन 1969 में एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में किया गया था। उसके इस्लामी देशों की संख्या 57 है जिनकी जनसंख्या 118 करोड़ है व इनमें से 53 देश मुस्लिम बाहुल्य देश है।

संगठन का दावा है कि वह मुस्लिम समाज के हितो की रक्षा करने व उनकी आवाज को एकजुट होकर उठाने के लिए बनाया गया है। उसकी अधिकारिक भाषाएं अरबी, अंग्रेजी व फ्रेंच है व उसके संयुक्त राष्ट्र व यूरोपियन यूनियन में स्थाई प्रतिनिधि मंडल है। इसके गठन की वजह 1969 की घटना है। बताते है कि जब येरूसलेम  की अल अक्सा मस्जिद में आग लगी तो वहां के मुफ्ती ने इसे यहूदियो की साजिश बताया व इससे निपटने के लिए मुस्लिम देशों के प्रमुखों की एक बैठक बुलवाई।

इसके बाद 15 सितंबर 1969 को ओआईसी की पहली इस्लामिक कांफ्रेंस हुई जिसमें 24 मुस्लिम बाहुल्य देशों ने हिस्सा लिया। वहां प्रस्ताव पारित करके कहा गया कि मुस्लिम सरकारें आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक व इस्लाम की शिक्षाओं से प्रभावित क्षेत्रों को मिल-जुलकर विकास करने के लिए सहयोग करेगी। भारत काफी अरसे से इस संगठन का सदस्य बनने की कोशिश करता है क्योंकि देश की 15 फीसदी या 20 करोड़ जनसंख्या मुसलमान है।

मुस्लिम बाहुल्य देशों में जितनी जनसंख्या रहती है व उसकी तुलना में भारत के किसी भी एक देश में ज्यादा मुसलमान रहते हैं। भारत की सदस्यता बनने का सबसे ज्यादा विरोध पाकिस्तान करता रहा है क्योंकि वह जम्मू कश्मीर में हो रही मानवाधिकारों के दमन को बयान करता है तो कभी कश्मीर के मुद्दे पर मुस्लिम समाज को भारत के खिलाफ एकजुट बनाता है। जब इसका पहला सम्मेलन हुआ था तब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रमुख जनरल याहया खान काफी सक्रिय थे। तब दिवंगत राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली खान भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नेतृत्व कर रहे थे। याहया खान ने भारत के शामिल होने पर सम्मेलन का बायकॉट करने की धमकी दे दी और इस विवाद के चलते भारत उसमें हिस्सा नहीं ले पाया।

एक और ओआईसी दुनियाभर में मुस्लिम भाईचारे, उनके हितो की रक्षा करने व प्रगति की बात करता है दूसरी और आईएसआईएस मुसलमानों पर अत्याचार करता है तो वह चुप्पी साध लेता है व उनसे ऐसा न करने के लिए कोई अपील तक जारी नहीं करता है। आईएसआईएस ने सरेआम मुसलमानों के सिर काटने के चित्र जारी किए थे जिनमें उसके दुश्मन, नागरिक व सैनिक दोनों ही शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने उसकी कड़ी निदिा की। मगर ओआईसी ने चुप्पी साधे रखी।

उसने कभी भी पाकिस्तान में भारत के खिलाफ पनप रहे आतंकवाद की आलोचना नहीं की। वह तो अलकायदा व बिन लादेन सरीखे लोगों पर चुप्पी साध गया था और एक हमारा देश है जोकि बार-बार दुत्कारे जाने के बावजूद इस संगठन की सदस्यता लेने के लिए बेताब है ताकि अपने देश में एक वर्ग को  खुश कर सके। मैं मुसलमानों या नरेंद्र मोदी का विरोधी नहीं हूं पर मुझे लगता है कि हमें हर गलत चीज का विरोध करना चाहिए। खासतौर पर तब जबकि हम बंधुत्व व किसी के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव न करने की बात करते आए हो।

भारत के लिए खासतौर पर पाकिस्तान द्वारा यह बैठक बुलाए जाना बहुत बड़ी घटना है क्योंकि वह सऊदी अरब के इशारे पर उसकी दुकान चमकाने के लिए कश्मीर के मुद्दे पर इसे बुला रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले वर्ष ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की सबसे बड़ी मस्जिद के कर्ता-धर्ता द्वारा खुद को सम्मानित किए जाने से काफी खुश हुए थे और अब कश्मीर में उनकी सरकार द्वारा की गई कार्रवाई ही उनके लिए सिरदर्द बन रही है जिसे सऊदी अरब का बहुत बड़ा हाथ साबित होने जा रहा है। कहां गई उनकी अंतरराष्ट्रीय डिप्लोमेसी।

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