nayaindia विषमता पर प्रतिबंध क्यों नहीं ? - Naya India
kishori-yojna
बेबाक विचार | डा .वैदिक कॉलम| नया इंडिया|

विषमता पर प्रतिबंध क्यों नहीं ?

आज आई आक्सफोम की एक रपट ने मुझे चौंका दिया। उसके मुताबिक भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश के 70 प्रतिशत लोगों से ज्यादा पैसा है। ज्यादा याने क्या ? इन एक प्रतिशत लोगों के पास 70 प्रतिशत लोगों के पास जितना पैसा है, उससे चार गुना ज्यादा है। सारी दुनिया के हिसाब से देखें तो हाल और भी बुरा है। दुनिया के 92 प्रतिशत की संपत्ति से दुगुना पैसा दुनिया के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है।

दूसरे शब्दों में दुनिया में जितनी अमीरी बढ़ रही है, उसके कई गुने अनुपात में गरीबी बढ़ रही है। भारत में हमारी सरकारें कमाल के आंकड़े उछालती रहती हैं। वे अपनी पीठ खुद ही ठोकती रहती हैं। वे दावे करती हैं कि इस साल में उन्होंने इतने करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर उठा दिया है। इतने करोड़ लोगों में साक्षरता फैला दी है लेकिन दावों की असलियत तब उजागर होती है, जब आप शहरों की गंदी बस्तियां और गांवों में जाकर आम आदमियों की परेशानियों से दो-चार होते हैं।

आप पाते हैं कि भारत के शहरी, शिक्षित और ऊंची जातियों के 20-25 करोड़ों लोगों को आप छोड़ दें तो 100 करोड़ से भी ज्यादा लोगों के पास रोटी, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और शिक्षा की न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं है। सच्चाई तो यह है कि इन्हीं वंचित लोगों के खून-पसीने की कमाई से देश में बड़ी पूंजी पैदा होती है और उस पर मुट्ठीभर लोग कब्जा कर लेते हैं। समाजवाद इसी बीमारी का इलाज था लेकिन वह भी प्रवाह पतित हो गया। अब समाजवाद के पुरोधा देश भी पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के चेले बन गए हैं। इस समय देश को आर्थिक प्रगति की जितनी जरुरत है, उससे ज्यादा जरुरत आर्थिक समानता की है।

यदि संपन्नता बंटेगी तो लोग ज्यादा खुश रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे। वे ज्यादा उत्पादन करेंगे। उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। सरकार चाहे तो पूरे देश में नागरिकों की आमदनी में, वेतन में, खर्च में एक और दस का अनुपात बांध दे। फिर देखें कि अगले 5-10 साल में ही चमत्कार होता है या नहीं ?

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

twelve − eleven =

kishori-yojna
kishori-yojna
ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
राहुल गांधी की शक्ल से काफी मिलते जुलते दिखते हैं मोहम्‍मद फैसल चौधरी
राहुल गांधी की शक्ल से काफी मिलते जुलते दिखते हैं मोहम्‍मद फैसल चौधरी