अगला जश्न ऑक्सीजन का होगा - Naya India
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अगला जश्न ऑक्सीजन का होगा

कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर का कोर तत्व यह है कि पूरे देश में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा हुआ है। कुछ तो बहुत भयावह और कुछ बेहद हास्यास्पद तस्वीरें इस दौर की देखने को मिली हैं। लोग ऑक्सीजन की सिलिंडर लूटते दिख रहे हैं, ऑक्सीजन के टैंकर रोके जा रहे हैं, अस्पतालों मे ऑक्सीजन की कमी से लोग तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं, टैंकर से ऑक्सीजन की लीकेज हो जा रही है और दो दर्जन लोग एक अस्पताल में मर जा रहे हैं। ऑक्सीजन की भयावह कमी की एक तस्वीर यह है तो दूसरी तस्वीर यह है कि भाजपा के कुछ नेता ऑक्सीजन टैंकर के चारों तरफ गुब्बारे बांध कर, नारियल तोड़ कर उसकी पूजा कर रहे हैं। अब एक तीसरी तस्वीर देखने को मिल रही है- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की।

अब प्रधानमंत्री ने ऑक्सीजन की कमी दूर करने का बीड़ा उठाया है। सोचें, भारत जैसे देश के लिए यह कितनी शर्मनाक बात है कि मेडिकल ऑक्सीजन की कमी हो गई है और उसे दूर करने के लिए प्रधानमंत्री खुद लगातार मीटिंग्स कर रहे हैं। दुनिया के किसी और देश में ऐसा देखने को नहीं मिला कि मेडिकल ऑक्सीजन की कमी हो गई और उसकी वजह से हाहाकार मचा हो। कम से कम किसी सभ्य, लोकतांत्रिक और विकसित देश में ऐसा देखने को नहीं मिला। उनके यहां भी स्वास्थ्य सुविधाओं पर बोझ बढ़ा, बेड्स और आईसीयू आदि की कमी हुई पर स्वास्थ्य सेवा में सबसे बुनियादी चीज माने जाने वाले ऑक्सीजन की कमी देखने को नहीं मिली। लेकिन भारत में आज नंबर एक संकट ऑक्सीजन का है। तभी प्रधानमंत्री अपनी चुनावी रैलियां रद्द करके अधिकारियों और ऑक्सीजन बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों से मिले। ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश दिए। ऑक्सीजन टैंकर की आवाजाही के उपाय किए गए, जिसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए। रेलवे मंत्रालय ने ऑक्सीजन एक्सप्रेस ट्रेनें चलाने का ऐलान किया।

सवाल है कि देश में ऐसी स्थिति क्यों बनने दी गई, जो ऑक्सीजन का इतना बड़ा संकट खड़ा हुआ? महामारी के 13-14 महीने में एक बार भी क्यों सरकार की ओर से इस बारे में विचार नहीं किया गया? क्या सरकार का कोई व्यक्ति एक भी मिसाल दे सकता है, जब शीर्ष स्तर से या किसी भी स्तर से ऑक्सीजन बनाने वालों से बात हुई हो और उन्हें ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाने को कहा गया हो? क्या कभी अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाने के बारे में कोई निर्देश जारी किया गया? प्रधानमंत्री पूरे एक साल कहते रहे और दूसरे सरकारी नेता उसे दोहराते भी रहे कि देश में पीपीई किट्स नहीं बनती थी, लेकिन अब लाखों की संख्या में बनने लगी है। देश में मास्क नहीं बनते थे, अब हम दुनिया को मास्क भेज रहे हैं। क्या उस समय कहीं यह सुनने को मिला कि ऑक्सीजन के नए प्लांट्स लग रहे हैं और मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है? ऐसा कहीं इसलिए नहीं हुआ क्योंकि सरकार में बैठे लोगों के पास ऐसी दूरदृष्टि नहीं है, जो यह देख पाए कि भविष्य में किस चीज की जरूरत ज्यादा हो सकती है। यह सरकार की विफलता है कि आज ऑक्सीजन का संकट हुआ है।

पिछले साल अप्रैल में कार्यक्रम क्रियान्वयन और योजना मंत्रालय के एक अधिकार प्राप्त समूह ने कहा था कि आगे आने वाले दिनों में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। भारत में पहला लॉकडाउन लगाए जाने के 10 दिन के अंदर ही इस समूह ने इस बात पर जोर दिया था कि ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाया जाना चाहिए। इस अधिकार प्राप्त समूह में 11 सदस्य थे और उन्होंने सुझाव दिया था कि उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई को गैस इंडस्ट्री से बात करनी चाहिए औऱ उत्पादन बढ़ाने के उपाय करने चाहिए। इसके बाद सरकार की ओर से किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उसके बाद नवंबर में संसद की एक समिति ने ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने और कीमत निर्धारित करने के लिए कहा था। लेकिन तब भी किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि तब केसेज कम होने लगे थे। अगर उस समय इस पर ध्यान दिया गया होता तो लाखों लोगों का जीवन इस तरह खतरे में नहीं होता।

बहरहाल, अब समूचा फोकस इस बात पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमान संभाल ली है। थोड़े दिन में ऑक्सीजन की आपूर्ति सुधार जाएगी और तब कहा जाएगा कि प्रधानमंत्री ने कमाल कर दिया। उन्होंने देश और करोड़ों लोगों को बचा लिया। हालांकि हकीकत यह है कि महामारी शुरू होने के बाद जो घबराहट हुई उसमें कई राज्यों ने अपने यहां ऑक्सीजन का भंडारण शुरू कर दिया और इसकी वजह से आपूर्ति प्रभावित हुई। इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन की अच्छी व्यवस्था नहीं होने, राज्यों के बीच तालमेल नहीं होने और राज्यों व कंपनियों के बीच भी तालमेल की कमी से ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हुई। अगर दूरदर्शी नेतृत्व होता तो पहले ही इनका ख्याल रखा जाता और आज जैसा हाहाकार नहीं मचता। भारत में ऑक्सीजन उत्पाद और खपत में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं है। भारत में सात हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन होता है और इससे थोड़े ज्यादा ऑक्सीजन की ही जरूरत है। थोड़ा सा उत्पादन बढ़ाना और उसकी आपूर्ति को तर्कसंगत बनाना है और फिर परिवहन की व्यवस्था ठीक करनी है, जो किसी मंत्रालय का संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी भी अगर प्रतिबद्धता के साथ काम करे तो कर सकता है। यहीं काम अब प्रधानमंत्री खुद कर रहे हैं क्योंकि इसमें सफलता निश्चित है। फिर उनकी जय-जयकार होने लगेगी। इस बीच राज्यों में लगाए लॉकडाउन से केसेज भी कम होने लगेंगे तो उसका भी श्रेय उनको मिल जाएगा।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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