पाकिस्तान में फजलुर रहमान का बवाल

कुछ वर्ष पहले प्रेस क्लब में मौलाना फजलुर रहमान से मेरी मुलाकात वहां के एक आला पदाधिकारी ने कराई थी। वे पाकिस्तान से आने वाले एक नेताओं के जत्थे में शामिल थे या उसकी अगुवाई कर रहे थे। यह पदाधिकारी अपने पाकिस्तानी प्रेम के कारण बहुत चर्चित रहते थे। उनका दावा था कि वे एक पाकिस्तानी टीवी चैनल का यहां प्रतिनिधित्व करते हैं।

उन्होंने प्रेस क्लब के अनेक हिस्सो को गहरे हरे रंग से रंगवा दिया था व यहां आए दिन पाकिस्तान व अफगानिस्तान में पहनी जाने वाली पगडि़यो को प्रदर्शनी आयोजित की जाने लगी थी। मुलाकात के दौरान मौलाना फजलुर रहमान काफी मिलनसार दिखे। वे बड़ी गर्मजोशी से मिले। उस दौरान वे पाकिस्तानी संसद नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता थे।

इस समय वे इस्लामी विद्वानो मौलवियों की संस्थान जमायत उलेमाए इस्माल के अध्यक्ष है। वे एक कट्टरपंथी नेता माने जाते हैं। वे काफी सक्रिय रहते आए हैं। पिछले कुछ दिनों से उन्होंने पाकिस्तान की राजनधानी में प्रधानमंत्री इमरान खान के इस्तीफे की मांग को लेकर धरना दिया हुआ है व उनकी नाक में दम कर रखा है। समय का फेर देखिए कि कभी नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने की मांग को लेकर इमरान खान भी यहीं हथकंडे अपनाते आए हैं। वे कट्टर तालिबान समर्थक माने जाते हैं व अफगानिस्तान की इस्लामी अमीरत के काफी निकट हैं। उन्होंने कभी अपनी कट्टरता दिखाते हुए पाकिस्तान में शरीया कानून लागू किए जाने की मांग की तो कभी अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद वहां की सरकार को जमकर कोसा। तत्कालीन परवेज मुशर्रफ सरकार को अमेरिका का साथ देने के कारण उसका तख्ता पलट देने की धमकी दी। उन्हें सरकार के तख्ता पलटने के आरोप में जेल में डाल दिया। हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।

विपक्ष का नेता रहते हुए 2007 में उन्होंने पाकिस्तान स्थित अमेरिकी राजदूत एन्नी पैटरसन को खाने पर आमंत्रित कर उनसे उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए मदद मांगी। वहीं कभी जब देश की उदारवादी पार्टियों के साथ मिल-जुलकर काम करने का मौका आया तो अपने को तथाकथित धर्मनिपेक्ष बनाया।

पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान में 10 जून 1953 को जन्मे इस 66 वर्षीय मौलना ने इस्लामियत की शिक्षा ग्रहण करते हुए उसकी डिग्री हासिल की। उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद भी इस्लाम के ज्ञाता नेता थे व वे खैबर पख्तूनख्वा में 1972 से 73 तक मुख्यमंत्री रहे। अपने पिता के न रहने के बाद वे पाकिस्तान की जमायते उलेमा-ए इस्लाम नमें 1980 तक रहे व पिता के निधन के बाद उसके अध्यक्ष बन गए। वे पहली बार 1988 में डेरा इस्माइल खान से सांसद नेशनल असेंबली के अध्यक्ष रहे।

इस दौरान वे तालिबान के काफी निकट आ गए। जब वे नेशनल असेंबली पहुंचे तो परवेज मुशर्रफ ने उनके मुंह में हड्डी. डालने के लिए उन्हें संसद की कश्मीर कमेटी का अध्यक्ष बना दिया व उन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा दे दिया। उन्होंने मार्च 2018 में मुत्तहिदा मज्लिस-ए-अमल पार्टी बनाई। उनका कट्टरपंथी प्रभाव इतना बढ़ता गया कि अनेक विपक्षी दलों ने 27 अगस्त 2018 को उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। वे वोटों के हिसाब से तीसरे नंबर पर आए।

फिलहाल वे इमरान खान पर अमेरिका, यूरोप व यहूदियो का एजेंट होने का आरोप लगाते हुए उनका तख्ता पलटने की मांग कर रहे हैं। अब उन्होंने उनके खिलाफ अपनी पार्टी जमयत उलेमाए इस्लाम (फजल) के नेतृत्व में विपक्षी दलों को लेकर आजादी मार्च शुरू किया है। विदेशी नीति पर असफल रहे इमरान खान पाकिस्तान में आसमान छू रही महंगाई को रोक पाने में असमर्थ है। इसलिए उनसे नाराज आम जनता भी उनके विरोधियों का जमकर समर्थन कर रही है। उन्हें सभी विपक्षी दलों का समर्थन भी मिल रहा है।

वे 2018 में भी चुनाव के बाद इमरान खान को सत्ता में रोकने के लिए विपक्षी नेताओं की पहल के कारण सुर्खियों में आए थे। पाकिस्तान के दो प्रमुख दल नवाज शरीफ की पीएमएलएन व बिलावल भुट्टो की पीपीपी भी उनका खुलकर समर्थन कर रही है।

एक पुरानी कहावत है कि पाकिस्तान को अ-आ (अल्लाह, आर्मी (सेना)) व अमेरिका चलाते हैं। पहले ही पाकिस्तानी विपक्ष इस आशय के आरोप लगाने लगा था कि पाकिस्तानी सेना ने उन्हें नया प्रधानमंत्री बनाने का फैसला कर लिए है। मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर सेना द्वारा गड़बड़ी करने के आरोप भी लगे। अंततः इमरान खान प्रधानमंत्री बन गए। मगर हर मोर्चे पर उनकी असफलता को देखते हुए अब सेना भी उनसे दूरी बनाने लगी है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बुरी हालात है। सबसे अहम संकेत तो तब मिला जबकि 2 अक्टूबर को वहां की आर्थिक स्थिति से परेशान देश के जाने-माने उद्योगपतियों के एक गुट ने सेना प्रमुख कमर वहींद बाजवा से मुलाकात की।

इस मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री इमरान खान अनुपस्थित रहे। इससे यह संदेश गया कि सेना प्रधानमंत्री को नापसंद करने लगी है। इसके साथ ही सेना कि सबसे बदनाम 111 ब्रिगेड के अफसरो की छुट्टियां रद्द किए जाने की खबरें आने लगी है। मालूम हो कि यह बिग्रेड हुक्मरानो का तख्ता पलटने के कारण बदनाम रही हैं। उसने इसकंदर मिर्जा के खिलाफ जनरल अरब की तख्ता पलटने में मदद की थी। उसकी मदद से ही जनरल जिया उल हक ने जुल्पिफकार अली भुट्टो की सरकार का तख्ता पलटा था व जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता पलटा था। ब्रिग्रेड 111 प्रधानमंत्री की सुरक्षा व इस्लामाबाद की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती हैं। वहीं फजलुर रहमान मौके के मुताबिक अपनी दिशा बदलने के कारण पाकिस्तानी राजनीति के मौसमी मुरगे माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि सेना का इशारा मिले बिना वे इतना सख्त कदम नहीं उठा सकते हैं। इस मार्च का अंत क्या होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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