पाकिस्तान का नया सिरदर्द

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वेद प्रताप वैदिकhttp://www.nayaindia.com
हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

पाकिस्तान में इमरान-सरकार की मुसीबतें एक के बाद एक बढ़ती ही चली जा रही हैं। उसे तहरीके-लबायक पाकिस्तान नामक राजनीतिक पार्टी पर प्रतिबंध भी लगाना पड़ गया और प्रतिबंध के बावजूद उससे बात भी करनी पड़ रही है। इस पार्टी पर इमरान-सरकार ने प्रतिबंध इसलिए लगाया है कि उसने पाकिस्तान के शहरों और गांवों में जबर्दस्त आंदोलन खड़ा कर दिया। कोरोना के बावजूद हजारों लोग सड़कों पर डटे हुए हैं। वे मांग कर रहे हैं कि फ्रांसीसी राजदूत को पाकिस्तान सरकार निकाल बाहर करे।

क्यों ? क्योंकि फ्रांस में सेमुअल पेटी नामक एक अध्यापक ने पैगंबर मुहम्मद का कार्टून अपनी कक्षा में छात्रों को खोलकर दिखाया था। इस पर चेचन्या मूल के एक मुस्लिम नौजवान ने उसकी हत्या कर दी थी। उसे लेकर फ्रांसीसी सरकार ने मस्जिदों और मदरसों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए थे। पिछले साल हुए इस कांड के समय से ही तहरीके-लबायक मांग कर रही थी कि फ्रांस और यूरोपीय देशों के इस इस्लाम-विरोधी रवैए का पाकिस्तान डटकर प्रतिकार करे।

प्रधानमंत्री इमरान खान ने यूरोपीय राष्ट्रों के इस रवैए की आलोचना भी की लेकिन उन्होंने फ्रांस से राजनयिक संबंध तोड़ने का समर्थन नहीं किया। इसीलिए अब तहरीके-लबायक ने इमरान-सरकार के खिलाफ देश-व्यापी आंदोलन छेड़ दिया है। 2015 में खादिम रिज़वी ने इस संगठन को खड़ा किया था और अब उनका बेटा साद रिजवी इसे चला रहा है। इस संगठन का जन्म मुमताज कादरी पर चले मुकदमे के दौरान हुआ था। कादरी ने लाहौर के राज्यपाल सलमान तासीर की इसलिए हत्या कर दी थी कि वे ईश-निंदा कानून का विरोध कर रहे थे। इस संगठन को शुरु में पाकिस्तानी फौज और सरकार का पूरा समर्थन रहा है।

पाकिस्तान के सुन्नी कट्टरपंथी और शिया व अहमदिया-विरोधी तत्वों ने इसे जमकर हवा दी है। हालांकि पाकिस्तान की संसद और विधानसभाओं में इसके सदस्य कम हैं लेकिन इसका जनाधार काफी व्यापक है। इसीलिए एक ईसाई महिला आसिया बीवी को 2018 में जब ईश-निंदा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों ने रिहा कर दिया तो रिजवी ने उन तीनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। उनकी हत्या की मांग भी की थी। इमरान सरकार ने लबायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन आसिया बीवी को चुपचाप हालैंड भी भिजवा दिया।

तहरीके-लबायक की जमीनी पकड़ इतनी मजबूत है कि उसके नेता पाकिस्तानी सेनापति क़मर जावेद बाजवा को ‘अहमदिया’ कहकर लांछित करते हैं लेकिन उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है। इसीलिए पाकिस्तान की सरकार, चाहे वह मियां नवाज की हो या इमरान की हो, लबायक के नेताओं के साथ हमेशा हकलाती रहती है। पैगंबर के कार्टूनों को लेकर अन्य इस्लामी देशों ने भी अपना क्रोध प्रकट किया है लेकिन जैसी नौटंकी पाकिस्तान में चल रही है, उसे मोहम्मद अली जिन्ना देख लेते तो वे अपना माथा ठोक लेते।

क्या यह जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान है? बेचारे इमरान की बड़ी मुसीबत है। उनकी सरकार ने तहरीके-लबायक़ के मजहबी अतिवाद की आलोचना नहीं की है। उसे सिर्फ आतंकवादी बताकर अवैध घोषित किया है ताकि पाकिस्तान की दम तोड़ती अर्थ-व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कोश मुंह न मोड़ ले।

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