निष्कर्ष, सोचें पहले, अपंग दिमाग पर!

महामारी- सरकार क्या कर सकती है?-7: सब कुछ बुद्धि से है। बीज, जड़, बुनावट, फल, परिणाम सबका दाता दिमाग। पर दिमाग यदि अपंग है, बिना चैतन्यता और आजादी की हवा-पानी के है तो बुद्धि खिल नहीं सकती। वह विचार नहीं सकती, उड़ नहीं सकती। काबिल, प्रतिस्पर्धी, हौसला, ताकत लिए हुए नहीं हो सकती। अपंग, कुंद, मंद, गुलाम बुद्धि के इंसानों का कुल समुच्चय तब मुर्दा कौम, मुर्दा देश का होगा। उस मुर्दा देश में राजा हो या प्रजा दोनों के कोर-छोर, सत्व-तत्व में बुद्धि सीमाबद्ध है। अन्य शब्दों में औसत हिंदू के दिमाग-बुद्धि में गुलामी, भक्ति, चाकरी, ख्याली पुलाव, भाग्य-नियति है तो उसका प्रधानमंत्री भी वहीं बुद्धि लिए हुए होगा। ख्याल, व्यवहार में यथा प्रजा तथा राजा और तथा सरकार। महामारी है तो वक्त कोई हो, सन् 1890  का हो या 1918 का या 2020 का हिंदू सदा-सर्वदा ताली-थाली-दीया जला कर मतलब भूत-प्रेत को भगाने वाले जादू-टोने लिए हुए होगा ही। वक्त 1962 का हो या सन् 2020 का, चीन के आगे लूली प्रतिक्रिया स्थायी है। 1965 में अकाल का-आर्थिकी संकट हो या नोटबंदी से लक्ष्मी की खत्म चंचलता में बरबाद आर्थिकी का सन् 2020 का संकट, बहाने में लाचारगी-दैवीय घटना की बातें-समझ भारत की स्थायी पहचान है।

तभी दो टूक निष्कर्ष है कि मुर्दा कौम की मानसिक अपंगता काल निरपेक्ष है। मानसिक अपंग व्यक्ति, कौम, देश कभी सोच ही नहीं पाता कि वह अपंग है इसलिए बार-बार, लगातार एक से अनुभव से गुजरते हुए वह लगातार बिगड़ते गया है। पर अपंग होना जब वह बूझे तब तो इलाज की सोच पाएगा। जब वायरस व महामारी को, मौत को भी दिमाग और बुद्धि फील नहीं कर पाती है और वह ताली-थाली-दीये से उसे भगा देने के इलहाम में है तो क्या यह हकीकत अपने आप में मानसिक अपंगता, मुर्दा कौम की बुनावट का प्रमाण नहीं है?

जो है वह गुलामी में ढले कुंद दिमाग के डीएनए से है। इस डीएनए में ही भाग्य, नियति, रामभरोसे जीवन, ईश्वर की कृपा के बीज चौतरफा बिखरे हुए हैं। औसत हिंदू यदि भाग्य, नियति, रामभरोसे व भगवान विष्णु के अवतार रूप में नरेंद्र मोदी से जादू हुआ मानता है तो खुद नरेंद्र मोदी भी इस विश्वास से राज कर रहे हैं कि उनके भाग्य से हिंदू और देश का वर्तमान है तो भगवान की उन पर छप्पर फाड़ कृपा प्रमाण है कि वे अकेले ही समर्थ हैं। वे जो फैसले लेंगे, जो व्यवहार करेंगे वह ईश्वरीय इलहाम में उनके निमित्त होने से है। ईश्वर उनमें जो भाव-इलहाम-विचार बनाते हैं उस अनुसार वे हिंदुओं की सेवा कर रहे हैं। वे ईश्वर कृपा, भाग्य से हिंदुओं के रक्षक, वक्त के बादशाह हैं तो वक्त उनके आगे नाचता हुआ गुजरेगा। टीका आएगा तो सबको टीका लगवा देंगे और जब वायरस मरेगा, तो लोगों का या देश का चाहे जो हुआ पड़ा हो लेकिन हिंदू अनुभव यह तराना लिए हुए होगा कि बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय। चीन से 1962 में हार गए तो हार गए, आगे की सुध लो। उसने कुछ हजार किलोमीटर जमीन और खा ली तो खा ली। आगे बढ़ो, उसे पटाओ, धंधा करो, पैसा कमाओ, समृद्धि बनाओ।

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? क्या 138 करोड़ लोगों के देश में चीन के ताजा तेवर, उसके अनुभव में कहीं यह विचार होते हुए सुना-देखा-समझा कि हमारा इस बार भी व्यवहार उस लूली प्रतिक्रिया वाला ही कैसे है जो 65 साल पहले भी था? खौफ, चिंता, लाचारी की अपंग मानसिकता में यह मुर्दा कौम होने का प्रमाण है या नहीं?

कई मायनों में 73 सालों में चीन और पाकिस्तान ने हम हिंदुओं को इतिहास का आईना बार-बार दिखलाया है। वह इतिहास, जिसमें सोमनाथ मंदिर पर हर हमले के बाद मुर्दा कौम सोचती थी कि बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय। हिंदु बुद्धि ने कभी नहीं सोचा कि आगे की सुध में स्थायी मंदिर तभी है जब सबक लेकर भविष्य का संकल्प बने। गुजरातियों ने, गुजराती राजाओं ने सोमनाथ के विध्वंस के बाद कभी गांठ नहीं बांधी कि घास खाएंगे, लेकिन हजार साल तक लड़ेंगे, यवनों को चैन से नहीं बैठने देंगे। अब हम अपनी सेना बना उसे यवनों के पीछे भगाए रखेंगे और उनके पाले में जा कर उन्हें ऐसा गुलाम बनाएंगे ताकि हमेशा के लिए डरे रहें। लेकिन हमने अपने मंदिर भी भगवान के भरोसे छोड़े रखे तो अपना राजा भी भगवान भरोसे और आम हिंदू तो खैर इस दर्शन में बंधा ही है कि होइहे सोइ जो राम रचि राखा!

सो, दुनिया की बाकी नस्लों, सभ्यतागत देशों से अलग अपना मानसिक विकास है। गुलामी काल के अनुभव में हमारे संस्कार विकसित हैं। हिंदू इतने हमलों और इतनी तरह के हमलों (विदेशी आक्रमणों से लेकर गुलामी के आधुनिक रूपों विदेशी भाषा, विदेशी सामान से नकलाश्रित टेंपलेटों, जुमलों, लोक व्यवहार आदि) का मारा था और है कि मुर्दा जीवन में यह अहसास, यह बोध नहीं बन सकता कि दुनिया की जो जिंदा कौमें हैं उनमें और हममें क्या फर्क है? उन कौमों, उन देशों का अर्थ, उनका सुख, उनके वैभव, चुनौतियों से लड़ने की उनकी क्षमता, जिंदादिली, आजादी के साथ बौद्धिक उड़ान से क्या सधता है और मुर्दा कौम होने में कैसा लूला अस्तित्व है।

जिंदा कौम और जिंदादिल लोग चेतन संवेदना लिए होते हैं। वे झूठ और सत्य का भेद जानने का बौद्धिक विन्यास, उसके साधन, उसकी निर्भीकता, हिम्मत और सुरक्षा लिए होते हैं। सत्य, ज्ञान-विज्ञान, काबलियत, समानता के स्वतंत्रचेता जीवन, इंसानी संवेदनशीलता, साहस, निडरता, प्रजा-राजा-व्यवस्था के चेक-बैलेंस, जवाबदेही में लोग-राष्ट्र सचमुच जिंदादिल व्यवहार रखते हुए जीते हैं। ठीक विपरित मुर्दा कौम के लोग झूठ, भय, गुलामी, भक्ति में जीते हैं। कोई माने या न माने, अपना मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह वर्षों में प्रामाणिक तौर पर दुनिया का जतलाया है कि पृथ्वी के पौने आठ अरब लोगों में सर्वाधिक झूठ, सर्वाधिक मूर्खताओं में जीने के सहज स्वभाव वाली यदि कोई कौम है तो वह हिंदू प्रजाति के वे बेचारे लोग हैं, जिन्हें भक्ति, आस्था में यह सुध नहीं है कि इंसान को भगवान ने दिमाग, बुद्धि दी है तो इसलिए कि रामजी भी चाहते हैं कि वह अपने से जीना सीखे। होइहे सोइ जो राम रचि राखा नहीं, बल्कि होइहे सोई जो खुद रचि राखा!

भक्त लंगूरजन सोच सकते हैं मैं झूठा हूं। उन्हें जो दिखलाई दे रहा है वह मुझे नहीं दिखलाई देता है क्योंकि मैं अपनी आंखों पर दृष्टि दोष का दूरबीन लिए हुए हूं। लंगूरों के अनुसार नरेंद्र मोदी से हिंदुओं में जागृति है। उनसे जिंदा कौम बनने का, मुसलमानों को औकात दिखलाने का, दुश्मनों को ठिकाने लगाने का मौका बना है। हिंदुओं का वह स्वर्ण काल आया है, जिससे दुनिया हतप्रभ है। मोदीजी ने इतना कर दिया है, इतना कर देंगे कि हिंदू कभी न दबेगा, न सोएगा, न झुकेगा और न बेबसी-लाचारी में जीएगा।

क्या कहा जाए! लंगूरों, भक्तों को बधाई जो महामारी काल में भी आस्थावान हैं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा की इनके घर महामारी न घुसे। दिवालिया आर्थिकी से दिवाली के इनके दीये बुझे हुए नहीं हों और आने वाली सर्दियों में दुश्मन के आगे इनका कोई परिजन लद्दाख में खड़ा हुआ न हो। बावजूद इसके अपनी चाहना है कि भक्त, लंगूर बतौर इंसान, बतौर हिंदू पृथ्वी के पौने आठ अरब लोगों के बीच सौ करोड़ हिंदुओं के मतलब पर जरा सोचें। मानवता के कोई आठवें हिस्से का जीना कैसा है? सदियों गुलामी, बेहाली-बीमारी-विपदाओं-आपदाओं में मर-मर कर जीते हुए हम लोग 21 वीं में भी अपना जीना कैसा बनाए हुए हैं।

दिक्कत है सोचें तो कैसे? मानसिक अपंगता में जब चेतनता, संवेदना, चुनौती लिए हुए दिमाग नहीं होता है और स्मृतियों में भी जीना मरते हुए जीना अंकित है तो सोचें तो कैसे सोचेंतभी घुट-घुट कर जीना भी भक्ति-आस्था से सहज है तो मरना नियति से। आपने सुने होंगे ये वाक्य कि मर भी गए तो प्रभु की इच्छा! मरा हुआ और कितना मरेगा। वायरस से मरें या न मरें भूख से मर जाएंगे। या यह कि पहले ही लोग इतने मरते हैं तो वायरस से कितने और मर जाएंगे!

शायद तभी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहान की चिंता में मौत का अनलॉक कुंआ जैसा खोदा है तो इस बेफिक्री में ही कि ज्यादा से ज्यादा कितने लोग मरेंगे? पांच-दस लाख लोग मर भी जाए तो 130 करोड़ लोगों में क्या मृत्यु दर होगी? भारत की भीड़ में, भेड़-बकरियों के बाड़े में इंसान की कीमत पहले ही जब नहीं है तो महामारी से क्या डरना? तभी एक लेवल पर लोगों में सोचना है कि ज्यादा से ज्यादा कितने लोग मरेंगे!

तभी भारत एकदम सामान्य। आईसीयू के वेंटिलेटर पर लेटे हुए होने के बावजूद वह सुशांत-रिया-कंगना, बॉलीवुड के किस्सों में खोया हुआ है। आश्चर्य नहीं जो हम हिंदू दुनिया के लिए सांप-सपेरों की बीन लिए, ताली-थाली-दीये के चमत्कार लिए हमेशा विस्मयकारी रहे।

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