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Monday, April 19, 2021
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लुभावने राजपथ पर मुंबई का जिन्न

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पंकज शर्माhttp://www.nayaindia.com
हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

जो मुंबई पुलिस के चंद अफ़सरों की सामने आई करतूतों को भी बुहेर कर गलीचे के नीचे ठेल देना चाहते हैं, उनकी अंतर-आत्मा के अंतिम संस्कार पर अगर आप आज विलाप नहीं करेंगे तो कल लोग भले ही इस गलीज़ हादसे के क़िस्से भूल जाएं, इतिहास आप के अपराध को कभी माफ़ नहीं करेगा। मुंबई-प्रसंग में कुछ अनोखा है, ऐसा नहीं है। हरियाणा से ले कर बिहार तक और तमिलनाडु से ले कर असम तक खादीधारियों और वर्दीधारियों के संयुक्त उगाही गिरोहों की भूमिगत कथाएं कोई आज से हवाओं में नहीं तैर रही हैं। मगर मुंबई-कथा क्या हमें लगातार खूंखार होते जा रहे इस बेताल के बारे में अब भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर नहीं करेगी?

सत्तासीन अपने छोटी-बड़ी टपोरी इच्छाओं को पूरा करने में नौकरशाही का, और ख़ासकर वर्दीधारी कारकूनों का, इस्तेमाल करने की कोशिश हमेशा से करते रहे हैं। मगर न तो लालासा-पूर्ति की इस इंद्रसभा के ‘देवताओं’ के मन की थिरकन पहले ऐसी बेकाबू हुआ करती थी कि वे अर्द्धनग्न हो जाएं और न उनके इशारों पर नृत्य करने वाली अप्सराएं पूरी तरह निर्वस्त्र होने को ऐसी बेताब हुआ करती थीं। छुपा-छुपाई का गंदला पानी इस खेल के नाले में सतह के नीचे चुपचाप बहता रहता था। लेकिन अब नंगे नाच का दौर है। इस दौर के शब्दकोष से लाज-शर्म के शब्द खुरच-खुरच कर मिटा दिए गए हैं। इसलिए जितनी बागड़ें हैं, वे ख़ुद ही खेत खाने में मशगूल हैं। ऐसे में इंसाफ़ का गंगाजल छिड़कने को अपना कलश ले कर निकलने वाले दूर-दूर तक हैं ही कहां?

ये हालात इसलिए हुए हैं कि पिछले कुछ बरस से हमारे प्रजापालकों ने ‘लोकतंत्र’ नाम का रथ खींचने के लिए राजनीतिक-अश्वों के बजाय कमीशनख़ोर नौकरशाहों का सहारा लेना शुरू कर दिया। सत्ता के रथ में जुतने की होड़ से लबरेज़ टट्टुओं की कमी तो पहले भी कभी नहीं थी। मगर तब के सारथी सियासत इतने आत्मविश्वासी हुआ करते थे कि अरबी घोड़ों की सोहबत में अपने को असुरक्षित नहीं, सुरक्षित महसूस करते थे। फिर लोकतंत्र के रथ की लगाम ऐसे अधकचरे सारथियों के हाथों में जाने लगी, जिनकी नींव रथ-संचालन के हुनर की प्राथमिक कक्षाओं में ही कमज़ोर पड़ गई थी। उन्हें राज्य-व्यवस्था संचालित करने के लिए विलोम उपादानों का उपयोग करने के ही पाठ पढ़ने को मिले थे। वे राजधर्म, नैतिकता और मूल्यों का पहरुआ बनने को अपने-अपने गुरुकुलों से निकले ही नहीं थे। उन्हें तो छीना-झपटी पर आधारित जनतंत्र का झंडाबरदार बनना था। वे हर हथकंडा अपना कर सब-कुछ मुट्ठी में कर लेने का फ़लसफ़ा ले कर मैदान में कूदे थे।

सो, तक़रीबन तीन दशक पहले भारत की शासन व्यवस्था में नागफनी के बीज पड़ने शुरू हुए, बाद के डेढ़ दशक में उनके अंकुर फूटे और गुज़रे पौन दशक में नागफनी का पूरा जंगल उग आया। कोई भी सियासी दल इन नागफनियों से बच नहीं पाया। भारत गणराज्य का कोई भी प्रदेश अपना दामन इन कांटों में हिलगने से बचा नहीं पाया। सारे-के-सारे कुओं में यह भांग कम-ज़्यादा घुलती गई। पिद्दी सियासतदांओं को जी-हुज़ूरिए नौकरों के ज़रिए हुकूमत चलाने में मज़ा आने लगा। वे बराबरी के हमजोलियों से कन्नी काटने लगे। फिर उन्हें काट-काट कर बौना बनाने के धंधें में लग गए। फिर उन्होंने चुन-चुन कर बौने अपने आसपास इकट्ठे कर लिए। वे भूल गए कि नौकर सिर्फ़ आप के सामने जी-हुज़ूरी करते हैं। आप की पीठ फिरी नहीं कि वे आप को अपनी फूहड़तम अंग-मुद्राओं के हवाले कर देते हैं। साथियों और नौकरों में यही फ़र्क़ होता है। सेवकों और नौकरों में भी बहुत फ़र्क़ होता है। जो नौकरों पर आश्रित हो गए थे, उन्हें नौकरों ने अंततः अपने पर इतना आश्रित कर लिया कि 2021 आते-आते मालिक अपने नौकरों के नौकर हो गए। मुंबई के जनाडू में इसी काले जादू का ‘फट्-फट् स्वाहा’ गूंज रहा है।

क्या नौकरशाही में पनपी इस अपसंस्कृति के लिए वे ज़िम्मेदार नहीं हैं, जो पिछले पांच-सात बरस में देश के सर्वोच्च कार्यालय से ले कर तमाम जांच एजेंसियों, टैक्स एजेंसियों और सत्ता-गलियारे के सभी अहम गुंबदों पर अपने प्रदेश के भाई-बंधुओं को बैठाने की तंगदिली से ख़ुद को बचा नहीं पाए? इस पर ज़रा गहराई से सोचिए कि जब कोई अफ़सरशाही के राजनीतिकरण को बढ़ावा देने का खाद-पानी डाल रहा हो तो दूसरे भी इस उकसावे में आ कर ऐसा ही क्यों नहीं करेंगे? अपनी नौकरियां छोड़ कर ताज़ा-ताज़ा राजनीति में आने वाले गृह सचिव और पुलिस आयुक्त को सीधे मंत्री बना देने की पीसीसरकारी करने के लिए क्या मतदाताओं ने किसी से कहा था? विदेश सचिव को संसद में आए बिना ही सीधे विदेश मंत्री बना देने की आप की सादगी पर जो मर रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि आप के ऐसे क़दमों ने देश को कितना मर दिया है?

नरेंद्र भाई मोदी ने पहली बार धूम-धड़ाके के साथ प्रधानमंत्री का सिंहासन संभालने के कोई एक बरस बाद, 2015 के अगस्त में, जब अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए 47 साल पहले नियमों में संशोधन किया, तो मुझे लगा था कि वे खर-पतवार की जड़ों में डालने के लिए मट्ठे का मटका ले कर निकल पड़े हैं। तब नरेंद्र भाई ने अफ़सरशाही की राजनीतिक निष्पक्षता पर बार-बार ऐसा ज़ोर दिया कि लोग मुग्ध हो कर झूमने लगे। मगर तब क्या पता था कि सियासी तटस्थता के इस मंत्र में दरअसल उस ध्रुवीकरण के श्लोक लहरा रहे हैं, जो अधिकारी-तंत्र को मौजूदा सरकार के पितृ-संगठन की विचारधारा पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं। नरेंद्र भाई ने प्रशासनिक अधिकारियों की सैर के लिए बेहद लुभावने राजपथ का निर्माण करने में इन सात वर्षों में कोई कोताही नहीं बरती।

इसी का नतीजा है कि खरबूजों को देख कर, खरबूजे तो खरबूजे, टिंडे-बैंगन भी रंग बदलने पर उतारू हो गए। अधोलोक की देगची से बाहर आ कर हमारी-आपकी आंखों-में-आंखें डाले हुंकार रहा मुंबई का जिन्न इन्हीं पापों का परिणाम है। इस पाप में सभी शामिल हैं। वे भी, जो यह प्रेत-क्रिया कर रहे थे। और, वे भी, जो यह कापालिक-नृत्य ख़ामोशी से देख रहे थे। जब प्रशासनिक नियुक्तियों की मंत्रिमंडलीय समिति में संबंधित विभाग के मंत्री को शामिल किए जाने की व्यवस्था नरेंद्र भाई ने ख़त्म की, तब विपक्ष कहां था? जब इस समिति के प्रमुख समेत सीबीआई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, आयकर विभाग, सीबीडीटी, जैसे तमाम महकमों के मुखिया देश के एक ही भौगोलिक हिस्से से हस्तिनापुर आ कर बसने वाली प्रतिभाएं बन रही थीं, तब विपक्ष कहां था? तब विपक्ष मुंह छिपाए घूम रहा था। इसलिए कि पहला पत्थर वह किस मुंह से अपने हाथ में उठाता? अगर विपक्ष इस पर ताल ठोकता तो नरेंद्र भाई उसकी अलमारी में पड़े कंकाल बाहर निकाल कर गांव की चौपाल पर सजा देते।

‘तेरा पाप, पाप; मेरा पाप, पुण्य’ की अंक-जोड़ू कलाकारी से परे हो कर शासन-प्रशासन के बुनियादी मसलों पर अगर हमारे प्रजापालक अब भी ग़ौर करने को तैयार नहीं हैं तो आज अपने पराक्रम की मदमस्ती में डोलने वाले भी जल्दी ही अपने को असहाय पाएंगे। जम्हूरियत अर्दलियों के ज़रिए नहीं चला करती। उसका प्रवाह तो जन-प्रतिनिधियों के सशक्तिकरण से ही सुनिश्चित किया जा सकता है। ‘हृदय-सम्राट’ होने का प्रमाणपत्र खा़दिमों से लिया तो काहे के हृदय-सम्राट? मुलाज़िमों की जय-जयकार सुन-सुन कर अपने को सिरमौर समझ लेने वालों का कोई नामलेवा आज आप को कहीं दिखाई देता है? इतिहास के अनुभवों की डलिया से अपने लिए फूल चुनने की फ़ुरसत जिन्हें नहीं है, इतिहास ने उन सभी के लिए एक कूड़ेदान भी बग़ल में रख रक्खा है।

(लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं)

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