parliament ruckus bill passed संसद की प्रासंगिकता का सवाल
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संसद की प्रासंगिकता का सवाल

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parliament ruckus bill passed संसद के सम्मान की रक्षा किसकी जिम्मेदारी है? कह सकते हैं कि जो भी संसद में बैठा है, चाहे वह सत्तापक्ष का सांसद या हो विपक्ष का हो, चाहे कार्यपालिका के सदस्य हों, संसदीय कामकाज के सुचारू संचालन के लिए नियुक्त किए गए अधिकारी हों या प्रेस के सदस्य हों, सबकी जिम्मेदारी बनती है कि वे इस संस्था के सम्मान और इसकी परंपराओं को न सिर्फ बचाए रखें, बल्कि उसे बढ़ाने का काम करें। दुर्भाग्य से भारत में जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह शोर-शराबा करके कामकाज बाधित करने की आलोचना करती है और इसे विधायी कामकाज में बाधा डालना बताती है लेकिन वहीं पार्टी विपक्ष में रहते हुए इस तरह के शोर-शराबे को संसदीय रणनीति का हिस्सा मानती है। यह एक किस्म की हिप्पोक्रेसी है, जिस पर भारत की पूरी राजनीति आधारित है। लेकिन संसद में हंगामा करना संसद के सम्मान से जुड़ा सिर्फ एक पहलू है। इसके अलावा भी और कई चीजें हैं, जिनसे संसद की गरिमा बनती-बिगड़ती है। दुर्भाग्य से इस समय ये सारी चीजें संकट में दिख रही हैं।

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संसद की गरिमा इस बात में है कि इसकी नियमित बैठकें हों, बैठकों में सदन के नेता और नेता विपक्ष दोनों ज्यादा से ज्यादा समय मौजूद रहें, विधायी मसलों पर ज्यादा चर्चा हो और आम सहमति बनाने का प्रयास हो, अगर आम सहमति नहीं बने तो ऐसे विषय संसदीय समितियों को भेजे जाएं और अगर राष्ट्रीय महत्व का कोई बड़ा मुद्दा है तो उस पर विचार के लिए दोनों सदनों की प्रवर समिति बने या संयुक्त संसदीय समिति बनाई जाए। संसदीय समितियों की नियमित बैठक हो और इन बैठकों में सदस्य पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर विषय के विशेषज्ञों की बात सुनें और वस्तुनिष्ठ तरीके से राय बनाएं। ध्यान रहे इन संसदीय समितियों का काम कोई फैसला करना नहीं होता है, जिन मसले पर संसद के अंदर ज्यादा विस्तार से चर्चा नहीं हो सकती है उन विषयों को या विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजा जाता है, जहां विषय के विशेषज्ञ उस मसले के बारे में समझाते हैं। उसके हर पहलू पर विचार किया जाता है। फिर उस आधार पर समिति एक रिपोर्ट तैयार करके संसद को देती है। अंतिम फैसला संसद को ही करना होता है। इसके बावजूद इन संसदीय समितियों के सदस्य पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर विचार नहीं कर रहे हैं। सत्तापक्ष अपने बहुमत के दम पर संसद की स्थायी समितियों के काम में बाधा डाल रहा है और रिपोर्ट स्वीकार नहीं होने दे रहा है।

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भारत की मौजूदा सरकार ने संसदीय समितियों को एक तरह से अप्रासंगिक या गैरजरूरी बना दिया है। पिछले साल यानी 2020 में संसद में पेश किया गया कोई भी बिल संसदीय समिति को नहीं भेजा गया। इस साल भी अभी तक यही स्थिति है। कोई बिल उस विषय या मंत्रालय की स्थायी समिति को नहीं भेजा गया है। इस बार तो और भी अनोखी स्थिति है। इस बार सरकार औसतन सात मिनट के भीतर एक बिल पास करा रही है। विपक्ष पेगासस जासूसी मामले और केंद्रीय कृषि कानूनों के लेकर हंगामा कर रहा है और इसे अवसर बना कर सरकार बिल पास करा रही है। संसद के मॉनसून सत्र में सरकार ने आधा दर्जन बिल पास कराए हैं और इनमें से किसी पर चर्चा नहीं हुई है। चार से 13 मिनट के बीच ये बिल बिना चर्चा के पास करा लिए गए हैं। इस तरह से बिल पास कराना संसद के सम्मान पर विपक्ष के हंगामे से ज्यादा चोट करने वाला है। इससे जाहिर होता है कि सरकार संसद को किस रूप में देखती है और उसकी क्या जरूरत मानती है!

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सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की संसदीय समिति में जो हुआ वह संसद के सम्मान को और संसदीय प्रक्रिया को गहरी चोट पहुंचाने वाला है। समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने पेगासस जासूसी मामले पर विचार के लिए बैठक बुलाई थी, जिसमें सूचना और प्रौद्योगिकी, संचार और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों को भी बुलाया गया था। सत्तापक्ष के सदस्यों ने समिति की इस बैठक को ही विफल करा दिया। एक तिहाई से ज्यादा सदस्य मीटिंग के लिए नहीं पहुंचे और बाकी एक तिहाई सदस्यों ने बैठक में पहुंचने के बावजूद उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तखत नहीं किए। इस तरह सत्तापक्ष ने बैठक के लिए जरूरी कोरम ही नहीं बनने दिया। सबसे हैरानी की बात है कि जिन तीन मंत्रालयों के अधिकारियों को संसदीय समिति ने बुलाया था वे दूसरे काम का हवाला देकर बैठक के लिए नहीं आए। यह सिर्फ संसदीय समिति का नहीं, बल्कि पूरी संसद का अपमान है। संसदीय प्रक्रियाओं के प्रति सम्मान और दूरदृष्टि की कमी का शिकार सत्तापक्ष के सदस्य समझ रहे हैं कि इससे सिर्फ समिति के अध्यक्ष यानी कांग्रेस सांसद का अपमान हुआ है। इससे पहले भी संसद की सबसे महत्वपूर्ण लोक लेखा समिति में पिछली लोकसभा के कार्यकाल में भाजपा के सांसदों ने राफेल मसले पर बनाई गई रिपोर्ट नहीं स्वीकार करने दी थी।

इसी से जुड़ा एक और दिलचस्प वाकया हुआ। केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने कहा है कि डाटा प्रोटेक्शन बिल लोकसभा स्पीकर को सौंप दिया गया है। संसदीय समिति के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने रिपोर्ट देखी ही नहीं है और सरकार दावा कर रही है कि रिपोर्ट स्पीकर को सौंप दी गई। समिति के दो सदस्यों जयराम रमेश और मनीष तिवारी ने सरकार के दावे पर सवाल उठाया है। उनका यह भी कहना है कि समिति के तीन सदस्य केंद्र में मंत्री बन गए हैं और मंत्री बनने से पहले वे भी रिपोर्ट की कॉपी मांग रहे थे। ऐसा लग रहा है कि संसदीय समिति ने रिपोर्ट तैयार की और बिना सदस्यों को दिखाए ही संसद के सामने पेश कर दी। सोचें, ऐसा मनमाना काम हुआ है तो क्या इससे संसद का सम्मान बढ़ेगा?

असल में पिछले सात साल से लगातार इस तरह के काम हो रहे हैं, जिससे संसद का सम्मान घटे और उसकी प्रासंगिकता कम हो। संसद और संसदीय समितियां भी अब सरकार के शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन कर रह गई हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय 14वीं लोकसभा में जितने बिल पेश किए गए उनमें से 60 फीसदी बिल संसदीय समितियों को भेजे गए। अगली यानी 15वीं लोकसभा में जब कांग्रेस का बहुमत थोड़ा और बढ़ गया तब 71 फीसदी बिल संसदीय समितियों में भेजे गए। लेकिन 16वीं लोकसभा में यानी 2014-19 के बीच सिर्फ 25 फीसदी विधेयक ही संसदीय समितियों में गए। मौजूदा यानी 17वीं लोकसभा में यह संख्या और कम हो गई है। सरकार ने इस लोकसभा में नागरिकता कानून में संशोधन किया, नए कृषि कानून बनाए, श्रम कानूनों को बदल दिया लेकिन इनमें से किसी को संसदीय समिति के पास भेजने की जरूरत नहीं समझी। संसदीय समितियों के प्रति यह सरकार क्या सोच रखती है यह इससे पता चलता है। पिछले सात साल में कोई साझा प्रवर समिति नहीं बनाई गई है और राफेल मसले से लेकर पेगासस जासूसी विवाद तक विपक्ष की लगातार मांग के बावजूद संयुक्त संसदीय समिति नहीं बनाई गई। जबकि बोफोर्स से लेकर 2जी तक के विवाद पर संयुक्त संसदीय समिति ने विचार किया था।

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बहरहाल, पिछले सात साल से संसद की बैठकें लगातार कम होती जा रही हैं, अध्यादेश के जरिए अहम विषयों पर कानून बना कर लागू किए जा रहे हैं, विधेयकों पर संसद में चर्चा का समय घटता जा रहा है, विधेयक का मसौदा संसदीय समितियों में नहीं के बराबर भेजा जा रहा है और संसदीय समितियां खुद से जो विषय उठा रही हैं उन पर सत्तापक्ष बहुमत के दम पर विचार ही नहीं होने दे रहा है। इससे पूरी संसदीय प्रक्रिया मजाक बन गई है। विपक्ष के हंगामे से संसद की छवि पर असर पड़ता है लेकिन इसमें भी बड़ी जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है। अगर विपक्ष के उठाए मसलों पर सरकार चर्चा के लिए तैयार हो जाए तो फिर हंगामा होगा ही नहीं। लेकिन सरकार हंगामा होने दे रही है और उसका फायदा उठा कर संसद के महत्व को कम करते हुए मिनटों में बिल पास करा रही है। यह संसद के सम्मान से ज्यादा बड़ा खिलवाड़ है क्योंकि इससे सिर्फ सम्मान नहीं घट रहा है, बल्कि उपयोगिता और प्रासंगिकता भी कम हो रही है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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