संसदीय समितियां और कृषि विधेयक

मोदी सरकार ने जिस तरह से विपक्ष की परवाह न करते हुए तीनो विवादास्पद कृषि विधेयक को संसद के दोनों सदनो में पारित करवाया है उससे कमोबेश देश में कई जगह सड़को पर विरोध शुरू हो गया है। इसके साथ ही संसदीय समितियों के महत्व पर चर्चा शुरू हो गई है। लोकसभा में विपक्ष चाहता था कि इन विधेयकों को जल्दबाजी में पारित न करके उन्हें गंभीर अध्ययन के लिए समिति को सौंपा जाए। जबकि राज्यसभा में विपक्ष के हंगामे के बीच उपसभापति ने इसे ध्वनिमत से पारित करवाने का काम किया। बिल के कारण संसदीय समितियां चर्चा में आई है। विपक्ष इस बात से नाराज था कि सरकार उनकी मांग को मानते हुए इस विधेयको का संसदीय समितियों में गहराई से अध्ययन के लिए राजी क्यों नहीं हुई?

संसदीय समितियो का गठन 1993 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने किया था। भारतीय संसद में इन समितियों का गठन विशेष उद्देश्य से किया गया था। कुछ समितियां बजट व तमाम मंत्रालय से संबंधित नीतियों का अध्ययन करती है। इनकी संख्या 24 है व इन्हें विभागों से संबंधित स्थायी समिति कहा जाता है। हर समिति में 31 सांसद होते हैं। इनमे से 21 लोकसभा 10 सांसद राज्यसभा के होते हैं। ये मंत्रालयों के कामकाज की भी समीक्षा करती है। इनकी स्थापना का उद्देश्य संबंधित मंत्रालय की सरकार के प्रति जवाबदेही बढ़ाना या उनके कामकाज का गहराई से अध्ययन करके उन्हें सुचारू रूप से काम करने योग्य बनाकर संसद की मदद करना है। जब तक लोकसभा का कार्यकाल रहता है तब तक हर साल विभागों से संबंधित समितियां गठित की जाती है व उनका कार्यकाल एक साल का होता है।

एक साल पूरा होने पर वह समिति भंग कर दी जाती है व नई समिति सक्रिय हो जाती है। इनमें वित्त, रक्षा व गृह मंत्रालय की समितियां शामिल हैं। आमतौर पर किसी मंत्री को इनका सदस्य नहीं बनाया जाता है व आमतौर पर रक्षा, गृह व वित्त मंत्रालयों की समितियो के अध्यक्ष विपक्षी दलों के सांसद होते हैं। इनके अलावा कुछ समितियों को विशेष उद्देश्य के लिए गठित किया जाता है।आमतौर पर इनके गठन का उद्देश्य किसी विधेयक का गहराई से अध्ययन करना होता है। इनके अलावा संयुक्त संसदीय समितियां या जेपीसी होती है। आमतौर पर जब किसी विवाद में फंसती है तो इन्हें बनाते वक्त इनका अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल का सांसद ही होता है। जैसे बोफोर्स रिश्वत कांड की जांच के लिए जेपीसी बनाई गई थी व जब पिछले साल इलेक्ट्रानिक्स व सूचना तकनीक मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने लोकसभा के निजी डेटा संरक्षण विधेयक पेश किया तो उसे जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया।

जब संबंधित मंत्रालय या विभाग का मंत्री इस तरह का फैसला नहीं कर पाता है तो उस स्थिति में सदन के अध्यक्ष या सभापति को तय करना होता है कि उस मामले को संसदीय समिति को सौंपा जाए या नहीं। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 2014 में चुनी गई लोकसभा के कार्यकाल के दौरान राज्यसभा के तत्कालीन सभापति एस वैंकेया नायडू ने आठ विधेयक विभागों से संबंधित स्थायी समितियो को भेजे थे।अगर एक सदन किसी विधयेक को पारित कर देता है तो भी दूसरा सदन उसे समिति को भेज सकता है। यहा यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 2018 में ऐसा ही हुआ था।जबकि लोकसभा ने लोकपाल बिल पारित कर दिया था तो राज्यसभा ने उसे अपनी प्रवर (सेलेक्ट) कमेटी को भेज दिया था।

पिछली लोकसभा में उसके द्वारा पारित तमाम विधेयक राज्यसभा की (प्रवर) समिति को भेज दिए गए थे। समितियां विधेयको का गहराई से अध्ययन करने के लिए उनसे संबंधित व उनके कारण प्रभावित होने वाले लोगों के विचार आमंत्रित करती है। आम नागरिक भी इस मामले में अपने विचार दे सकते हैं। सबके विचार व राय जानने के बाद ही समिति यह तय करती है कि क्या विधेयक में कुछ संशोधन या बदलाव किए जाए। समिति की रिपोर्ट आने के बाद उस विधेयक को संसद में पारित किया जाता है। आमतौर पर समितियो को तीन माह के अंदर अपनी रिपोर्ट देने की अपेक्षा की जाती हैं।

आमतौर पर जब भी देश में कोई विवादस्पद मामला सामने आया तो संसद द्वारा ऐसी समितियो के जरिए उनकी जांच की गई रही है। जब राजीव गांधी के कार्यकाल में बोफोर्स तोप घोटाले के मामले को जोड़ कर कमेटी बनी तो सरकार ने अपने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बी शकरानंद की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था।  ऐसा ही हर्षद मेहता द्वारा शेयर घोटाले के उजागर होने के बाद किया गया था।

इस बार इंतहा हो गई। संसदीय समिति में सरकार ने विचार की जरूरत ही नहीं समझी।  आमतौर पर देखा गया है कि अगर सदन में एक सांसद भी किसी मामले से संबंधित विधेयक को किसी संसदीय समिति को भेजे जाने की मांग करता है तो उसकी इच्छा पूरी की जाती है। अगर किसी विधेयक पर कोई सदस्य मतविभाजन की मांग करता है तो इसे पीठासीन अधिकारी जरूर पूरी करता है। ज्यादा से ज्यादा यह आदेश देने से पहले वह सदन की भावना का पता लगा लेता है।इस बार तो गजब हुआ। देश के 16 विपक्षी दलों के सांसद कृषि संबंधी विधेयक को पारित करने की जगह उन्हें संसदीय प्रवर समिति को सौंपे जाने की मांगे करते रहे मगर उपसभापति ने उनकी एक बात नहीं सुनी व ध्वनि मत के जरिए इनके पारित हो जाने का ऐलान कर दिया गया।

मेरे उत्तर प्रदेश में इस तरह के मामले उत्तर प्रदेश पुलिस की भरती के समय देखने को मिलते थे। भरती करने वाले उनकी शारीरिक परीक्षा लेने वाला निरीक्षण उनसे उठक-बैठक लगाने को कहता व खुद उनकी गिनती शुरू कर देता था जिन्हें लेना होता था वह उनके बैठक लगाते समय कुछ इस तरह से जोर-जोर से गिनती करता कि ‘एक, पांच, नौ तेरह पच्चीस, जल्दी-जल्दी करो।’ तुम पास हो गए कहकर उसके चुने जाने का ऐलान कर देता था। व जो उसकी सूची में नहीं होते थे वे चाहे कितनी भी तेजी से बैठक क्यों ना लगाए वह जोर-जोर से धीमी आवाज में कहता एक, दो तीन चार, क्या घर से कुछ खाकर नहीं आए थे जो इतनी धीमी बैठके लगा रहे हो। संसद में जो कुछ हुआ वह ऐसा ही लगता है।

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