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भाजपा को चाहिए पसंमादा मुससमान!

मुस्लिम समाज तीन वर्गो में बंटा हुआ है। पहले नंबर पर अशरफ समाज में समुदाय के सबसे सम्मानजनक लोग आते हैं जिन्हें मूल अरबों के उच्च वर्ग का वंशज माना जाता है। दूसरे नंबर पर अजलाफ या पिछड़े वर्ग के मुसलमान आते हैं व तीसरा नंबर अरजल या दलित मुसलमानों का ही माना जाता है। अशरफ वर्ग में आने वाले लोग मुस्लिम आक्रांताओं या उनके डर के बराबर अपना धर्म बदलने वाले उच्च जाति वाले हिंदुओं के वशंज है। इनमें से आने वाले ज्यादातर लोग सैयद, पठान आदि सरनेम लगाते हैं।

कुछ माह पहले भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमें हिंदुओं को ही नहीं अन्य वर्गो के पिछड़े हुए लोगों को भी साथ लेना है। उनका इशारा मुसलमानों के पिछड़े समाज या  पसमांदा मुसलमानों की और था। पसमांदा शब्द मूलतः फारसी का शब्द है जिसका अर्थ होता है पिछड़े हुए लोग या मुसलमानों का दलित समाज। ऐसा माना जाता है कि देश में कुल मुसलमानों का 80-85 फीसदी लोग पसमांदा समाज के है। ये लोग आर्थिक या सामाजिक रूप से पिछड़े हुए है।

उत्तरप्रदेश में इन लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। उसके बाद बिहार का नंबर आता है। यह सोच गलत है कि मुसलमानों में जाति व्यवस्था नहीं होती। दक्षिण एशिया के मुसलमानों में यह जाति व्यवस्था खुलकर देखने को मिलती है। इन दलित मुसलमानों को ‘अरजाल’ भी कहा जाता है। सबसे पहले 1998 में पटना में अनवर अली ने पसमांदा मुसलमानों के संगठन महाज की स्थापना की थी। उन्हें मुसलमानों का पिछड़ा वर्ग या ओबीसी भी कहा जाता है जबकि उंची जाति के मुसलमान अशरफ वर्ग से आते हैं।

ये लोग पैसे के साथ ही काफी शिक्षित भी होते हैं। मुसलमानों में ब्राम्हण माने जाते हैं। पसमांदा मुसलमानों का दावा है कि मुसलमानों के नाम पर मिलने वाले ज्यादातर फायदा के लाभ अशरफ ही उठाते हैं। जैसे कि आजादी के बाद से अब तक लोकसभा चुनावों में कुल 400 मुसलमानों जीते इनमें से सिर्फ 60 मुसलमान ही पसमांदा वर्ग से है।

मुसलमानों की भारतीय जनता पार्टी से बढ़ती दूरी व उनके महत्व को पहचानते हुए अली अनवर अंसारी ने बिहार में पसमांदा मुसलमानों का संगठन आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज की स्थापना की थी। राजनीतिक रूप से देख जाए तो अभी तक यह समाज राजद, सपा व जदयू को ही मतदान करता आया है। थोड़ा बहुत कांग्रेस को भी वोट पड़ जाता है। भाजपा मुस्लिम समाज के इस वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है। वे उन्हें अपना नया वोट बैंक बनाना चाहती है ताकि वे अन्य पार्टियों का समर्थन करना बंद कर दें।

हमारे देश में मुस्लिम समाज तीन वर्गो में बंटा हुआ है। पहले नंबर पर अशरफ समाज में समुदाय के सबसे सम्मानजनक लोग आते हैं जिन्हें मूल अरबों के उच्च वर्ग का वंशज माना जाता है। दूसरे नंबर पर अजलाफ या पिछड़े वर्ग के मुसलमान आते हैं व तीसरा नंबर अरजल या दलित मुसलमानों का ही माना जाता है। अशरफ वर्ग में आने वाले लोग मुस्लिम आक्रांताओं या उनके डर के बराबर अपना धर्म बदलने वाले उच्च जाति वाले हिंदुओं के वशंज है। इनमें से आने वाले ज्यादातर लोग सैयद, पठान आदि सरनेम लगाते हैं। अजलाफ व अरजाल में आने वाले मुसलमानों को पिछड़ा या दलित मानते है व पसमांदा कहा जाता है।

वे सामाजिक तथा आर्थिक रूप से मुस्लिम समाज में पिछड़े हुए माने जाते हैं। अंसारी नाम जुलाहों के कारण पड़ा। पसमांदा मुसलमानों के नेताओं का मानना है कि देश के कुल मुसलमानों का 85 फीसदी हिस्सा पसमांदा है जबकि महज 15 फीसदी मुसलमान ‘अशरफ’ माने जा सकते हैं। कुछ समय पहले रामपुर व आजमगढ़ के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद भाजपा को लग रहा है कि समाजवादी पार्टी के गढ़ में जीत का मतलब यह है कि मुसलमानों के एक वर्ग को लुभाया जा सकता है। अली अनवर ने 1998 में पासमंदा मुसलमानों के संगठन का महज का गठन करते समय सोचा था कि अशरफ मुसलमानों के जातीय दमन के शिकार दलित मुसलमान को वे अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहेंगे।

ध्यान रहे कि उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल व दिल्ली के ज्यादातर मुसलमान पसमांदा श्रेणियों में ही आते हैं। अली अनवर कहते हैं कि हिंदुओं में भी दलित वर्ग को तभी लाभ मिला जबकि उन्हें अनुसूचित जाति के कारण आरक्षण मिला। अब मुसलमानों के दलित वर्ग के लिए भी ऐसी आरक्षण व्यवस्था की जानी चाहिए। वे बताते हैं कि जो दलित सिख या बौद्ध धर्म में भी शामिल हो गए थे उन्हें बाद में आरक्षण की सुविधा प्रदान की जाने लगी जबकि मुस्लिम या इसाई धर्म अपनाने वाले हिंदू धर्म के दलितों को आरक्षण का फायदा नहीं मिलता है।

वे लोग अपना पिछड़ा वर्ग या दलित होने का दर्जा खो देते हैं। बताते हैं कि 1980 में मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी व 1989 में तत्कालीन वीपी सिंह सरकार उसके सुझावों को लागू कर दिया था। इसके तहत 27 फीसदी आरक्षण अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए रखा गया था। इसमें मुस्लिम समाज की भी 79 उपजातियां शामिल थीं। मगर जब 7 दिसंबर 1994 को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य मंत्री शरद पवार ने यह प्रस्ताव जारी किया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग मामलों में मुसलमानों को भी हिंदुओं के समान माना जाए व उन्हें भी अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे से नौकरियां व दाखिलों में आरक्षण दिया जाए।

इसके बाद 2014 में कांग्रेस-राकांपा सरकारों ने मुसलमानों में 50 ओबीसी जातियों का पता लगाकर उन्हें दाखिलों व नौकरियों में आरक्षण देना शुरु कर दिया। सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई व उसने शिक्षण संस्थाओं में ही 5 फीसदी आरक्षण को सही ठहराया। इसके बाद वहां पुनः राज्य में सरकार बदल गई व भाजपा ने हर मामले पर चुप्पी साध ली। वहीं उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने पसमांदा मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी का सिलसिला शुरु कर दिया।

इस समुदाय के दानिश अंसारी को राज्य मंत्री बना दिया गया। जब कि दूसरे पसमांदा नेता जावेद अंसारी को यूपी मदरसा एजुकेशन बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया जबकि तीसरे पासमंदा नेता चौधरी कैफुल उरा को उत्तरप्रदेश के उर्दू अकादमी का लालीपाप थमा दिया। दिल्ली के नगर निगम चुनाव में भाजपा ने तीन पसमांदा उम्मीदवार खड़े कि जो कितने वोट बटोर पाते हैं पहले आने वाला समय ही बता पाएगा।

पहली बार 2014 में आम चुनाव में सत्ता में आने से लेकर आम चुनाव व विधानसभा चुनावों में भाजपा मुसलमानों के टिकट देने से बचती आयी है। पहली बार भाजपा ने दिल्ली नगर निगम चुनाव में अपने तीन मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए। भाजपा नेतृत्व मानता है कि हिंदुओं में उसकी पकड़ काफी मजबूत हो चुकी है। अब मुसलमानों में अपना आधार बनाना चाहती है। भाजपा का मानना है कि पसमांदा मुसलमान वे लोग है जिन्हें कि काफी पहले कुछ लोगों के दबाव में अपना धर्म छोड़ना पड़ा था। अतः उसका भाजपा की ओर आकर्षित होना तो मानो उनकी घर वापसी है।

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