pegasus case supreme court पहले भी जब कभी सरकार
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‘नैरेटिव’ के सच में रुचि!

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pegasus case supreme court  पहले भी जब कभी सरकार के दिमाग में जांच की बात आई है, तो इसकी नहीं कि उस घटना या परिघटना की जड़ कहां है। बल्कि उसकी रुचि यह जानने में होती है कि उससे संबंधित कोई ऐसा नैरेटिव समाज में कैसे चला गया, जो उसकी मंशा के खिलाफ था। वह पेगासस मामले में ऐसी ही जांच चाहती है।

ये कोई नई बात नहीं है। मामला चाहे जो हो, नरेंद्र मोदी सरकार की दिलचस्पी यही जानने में होती है कि उसको लेकर सरकार के खिलाफ कोई नैरैटिव कैसे प्रचारित हो गया। ये बात सबसे ज्यादा उजागर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन के दौरान हुए दिल्ली दंगों के समय सबसे ज्यादा मुखर होकर जाहिर हुई थी। वैसे उसके पहले भी जब कभी सरकार के दिमाग में जांच की बात आई है, तो इसकी नहीं कि उस घटना या परिघटना की जड़ कहां है। बल्कि उसकी रुचि यह जानने में होती है कि उससे संबंधित कोई ऐसा नैरेटिव समाज में कैसे चला गया, जो उसकी मंशा के खिलाफ था। तो अगर ऐसा ही जांच वह पेगासस मामले में कराना चाहती है, तो उस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए।

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केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पेगासस जासूसी के आरोपों की जांच इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का एक समूह करेगा। वह पेगासस मामले को लेकर बने नैरेटिव के सच तक पहुंचने की कोशिश करेगा। ये अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट उससे सहमत नहीं हुआ। दरअसल, जिन याचिकाकर्ताओं की अर्जी पर वह सुनवाई कर रहा है, वे सहमत नहीं हुए। तो कोर्ट ने केंद्र से दूसरा हलफनामा देने को कहा। पहले हलफनामे में केंद्र ने कहा कि ये याचिकाएं और अन्य संबंधित याचिकाओं के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये अनुमानों और अन्य अप्रमाणित मीडिया रिपोर्टों या अधूरी या अपुष्ट सामग्री पर आधारित हैं।

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ये बात अपने आप साबित हो जाती, अगर केंद्र सिर्फ एक बात दो टूक कह देता कि भारत सरकार ने इजराइली कंपनी एनएसओ से पेगासस नाम के किसी सॉफ्टवेयर की खरीदारी नहीं की। या फिर वह ऐसी खरीदारी की पुष्टि कर देता। लेकिन इतनी सीधी सी बात कहने के बजाय बातों को घुमाने का तरीका अपनाया गया है। सरकार जानती है कि अगर वह खरीदारी का खंडन करेगी, तो फिर बात ये जांच कराने पर आ जाएगी कि आखिर किस विदेशी एजेंसी ने सैकड़ों भारतीयों की जासूसी कराई। अगर उसने पुष्टि की, तो फिर सारी जवाबदेही उस पर आ जाएगी। केंद्र इन दोनों बातों से बचना चाहता है। अब प्रश्न है कि क्या कोर्ट उसे ऐसा करने देगा? इस बिंदु पर कोर्ट का भी इम्तहान होना है। उसकी सख्त टिप्पणियां कितनी सार्थक थीं, ये उसके अंतिम आदेश से जाहिर होगा।

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