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जो असल मुद्दा है

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1970 के दशक में ऐसा ही मामला अमेरिका में हुआ था, जिसे वाटरगेट कांड के नाम से जाना जाता है। सार यही था कि तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की चर्चाओं की गुपचुप रिकॉर्डिंग कराई। वो मामला इतना उछला कि निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था।

pegasus hacking case : इजराइली कंपनी पेगासस के मालवेयर से भारत में जासूसी हुई, ये खबर दो साल पहले भी ब्रेक हुई थी। तब बताया गया था कि इस मालवेयर के जरिए ह्वाट्सऐप की गोपनीयता को तोड़ा गया। अब सामने आया है कि फोन में जो भी डेटा हो, सब तक पहुंच बनाई गई। पेगासस कंपनी का कहना है कि वह इस सॉफ्टवेयर को सिर्फ सरकारों को बेचती है, ताकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के इंतजामों को पुख्ता बना सकें। अब अगर भारत में बड़े पैमाने पर इसके जरिए जासूसी हुई, तो ये मानने का आधार बनता है कि इसकी खरीदारी किसी सरकारी एजेंसी ने की।

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चूंकि सरकार के घोषित बजट में इस खर्च का कोई ब्योरा नहीं है, इसलिए यह मानने का आधार बनता है कि ये खरीदारी भारत की खुफिया एजेंसियों के जरिए की गई। ये बात हम सभी जानते हैं कि भारत में खुफिया एजेंसियों की कोई लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं है। उन्हें कितना बजट दिया जाता है, यह हमेशा गुप्त रहता है। तो असल मुद्दा यह उठता है कि इस हाल में किसी व्यक्ति की निजता और लोकतांत्रिक पैमानों की पवित्रता की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? जहां तक लोकतांत्रिक पैमानों का सवाल है, तो उसमें एक यह है कि चुनावों के दौरान पक्ष और विपक्ष को समान धरातल मिले। हालांकि कई दूसरे कारणों से भी हाल के वर्षों में ये धरातल टूट गया है, लेकिन इस मामले ने एक बार फिर इस सवाल को उठाया है। इसलिए खबर आई है कि 2019 के आम चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जासूसी की गई। pegasus hacking case

अब अगर सत्ता पक्ष को विपक्ष की रणनीतियों का भान हो, तो जाहिर है, मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाएगा। 1970 के दशक में ऐसा ही मामला अमेरिका में हुआ था, जिसे वाटरगेट कांड के नाम से जाना जाता है। सार यही था कि तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की चर्चाओं की गुपचुप रिकॉर्डिंग कराई। वो मामला इतना उछला कि निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। क्या भारत में आज यह सोचा भी जा सकता है कि पेगासस मामले में जवाबदेही तय होगी? बहराहल, बात फिर से खुफिया एजेंसियों पर आती है, जिन्होंने अपने आकाओं के निर्देश पर ये काम किया होगा। तो क्या यह विचारणीय नहीं है कि स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने के लिए अब इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए?

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