बच्चों की वैक्सीन, जल्दी न करें!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

बच्चों को टीका लगना चाहिए लेकिन उससे पहले वैक्सीन का ज्यादा वालंटियर्स के साथ, ज्यादा बड़े पैमाने पर और ज्यादा समय के लिए  ट्रायल होना चाहिए। क्योंकि किसी को पता नहीं है कि वैक्सीन व्यस्कों के मुकाबले बच्चों पर किस तरह का असर करेगी, उसके साइड इफेक्ट्स कैसे होंगे और बच्चों को दी जाने वाली दूसरी बीमारियों की वैक्सीन के साथ कोरोना वैक्सीन की प्रतिक्रिया कैसी होगी।

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कनाडा ने सबसे पहले 12 साल से ऊपर के बच्चों को वैक्सीन लगानी शुरू की थी। अब अमेरिका में भी 12 साल से ऊपर के बच्चों को वैक्सीन लगने लगी है और फाइजर बायोएनटेक की जो वैक्सीन अमेरिका के बच्चों को लग रही है उसे ब्रिटेन ने भी मंजूरी दे दी है। ब्रिटेन में हालांकि अभी बच्चों पर इसका परीक्षण चल रहा है परंतु जल्दी ही वहां भी यह टीका लगने लगेगा। फाइजर के अलावा मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन तीनों की वैक्सीन को बच्चों के लिए मंजूरी मिल जाएगी। भारत में कोवैक्सीन का परीक्षण बच्चों के ऊपर हो रहा है और सरकार ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया के बड़े देशों और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस वैक्सीन को मंजूरी दे दी है उसे भारत में बिना परीक्षण के इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह बात अभी बच्चों की वैक्सीनेशन के बारे में नहीं कही गई है लेकिन एक बार जब लोगों को बिना परीक्षण के अमेरिकी वैक्सीन लगने लगेगी तो बच्चों को लगना शुरू हो जाना महज वक्त की बात होगी।

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दो से 12 साल और 12 से 18 साल की बच्चों व किशोरों की दो श्रेणियां बनाई गई हैं। दूसरी श्रेणी यानी 12 साल से ऊपर के बच्चों को व्यस्कों की तरह ही टीका लगाया जाएगा। यानी जो वैक्सीन, जिस मात्रा में व्यस्कों को लगाई जा रही है वहीं वैक्सीन, उतनी ही मात्रा में 12 साल से ऊपर के बच्चों को भी लगाई जाएगी। दो से 12 साल तक के बच्चों के ऊपर वैक्सीन का अलग परीक्षण होगा और तब उसकी मात्रा आदि तय की जाएगी। जाहिर है जितनी तेजी से व्यस्क आबादी के टीकाकरण की बात हो रही है उसी तेजी से बच्चों व किशोरों के टीकाकरण की तैयारी भी चल रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बच्चों को टीका लगना चाहिए लेकिन उससे पहले वैक्सीन का ज्यादा वालंटियर्स के साथ, ज्यादा बड़े पैमाने पर और ज्यादा समय के लिए  ट्रायल होना चाहिए। क्योंकि किसी को पता नहीं है कि वैक्सीन व्यस्कों के मुकाबले बच्चों पर किस तरह का असर करेगी, उसके साइड इफेक्ट्स कैसे होंगे और बच्चों को दी जाने वाली दूसरी बीमारियों की वैक्सीन के साथ कोरोना वैक्सीन की प्रतिक्रिया कैसी होगी। इससे पहले बच्चों को कभी ऐसी वैक्सीन नहीं दी गई है इसलिए स्वाभाविक रूप से चिंता ज्यादा है।  

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ध्यान रहे अमेरिका में जो वैक्सीन बनी है वह मैसेंजर आरएनए यानी एमआरएनए तकनीक पर बनी है। इंसानों को लगाने वाली वैक्सीन में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस वैक्सीन के जरिए शरीर की कोशिशकाओं को एक मैसेज जाता है कि वे स्पाइक प्रोटीन यानी नोकदार प्रोटीन का निर्माण करें। इसी आकार का कोरोना वायरस होता है इसलिए जैसे ही नोकदार प्रोटीन दिखाई देता है वैसे ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता सक्रिय हो जाती है और उसे मारने लगती है। इस लिहाज से यह बहुत प्रभावी वैक्सीन है। लेकिन मुश्किल यह है कि पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल होने की वजह से किसी को लंबे समय में होने वाले इसके असर का अंदाजा नहीं है। तभी अमेरिका में इस बात को लेकर चिंता शुरू हो गई है। अमेरिकी अभिभावक बच्चों को टीका लगाने से पहले इसके लंबे समय में होने वाले असर के बारे में जानना चाह रहे हैं। उनको अंदेशा है कि वैक्सीन बच्चों के शरीर में कुछ बदलाव कर सकती है, जिसका लंबे समय में नुकसान होगा। इसलिए पूरी जानकारी इकट्ठा होने तक वैक्सीनेशन रोकने की भी मांग उठी है।

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जहां तक भारत का सवाल है तो यहां बच्चों को वैक्सीन लगाने की पूरी जमीन तैयार कर दी गई। दूसरी लहर के अधबीच यह कहा जाने लगा कि तीसरी लहर आएगी, जो ज्यादा खतरनाक होगी और बच्चों पर सबसे ज्यादा असर डालेगी। इन खबरों ने बच्चों और किशोरों के अभिभावकों को डरा दिया है। वे अपने बच्चों को सुरक्षित करने के लिए टीका लगाने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि पहली और दूसरी लहर में देश में बच्चों और किशोरों को संक्रमण नहीं हुआ है। भारत में 10 साल की उम्र तक के आठ लाख से ज्यादा बच्चों को और 10 से 20 साल तक की उम्र के 21 लाख से ज्यादा बच्चों को संक्रमण हुआ। परंतु इनमें से ज्यादातर बच्चे बिना किसी इलाज के ठीक हो गए। अब कहा जा रहा है कि वायरस ने अपना रूप बदल लिया है और अगली लहर में यह बच्चों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसी चिंता में अमेरिकी वैक्सीन को मंजूरी देने की तैयारी है और भारत में भी कोवैक्सीन का परीक्षण बच्चों पर शुरू हो गया है।

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लेकिन क्या यह परीक्षण लंबे समय में होने वाले असर के बारे में कुछ बता पाएगा? इसका जवाब ना में है। इस परीक्षण से सिर्फ यह पता चलेगा कि वैक्सीन कितनी असरदार है और बच्चों में क्या तात्कालिक साइड इफेक्ट्स होते हैं। लंबे समय के असर का पता नहीं चलेगा। अमेरिका में इसी को लेकर सबसे ज्यादा चिंता है। अमेरिका के माउंट सिनाई अस्पताल में बच्चों के विशेषज्ञ डॉक्टर क्रिस्टिन ऑलिवर का कहना है कि वैक्सीन का बच्चों पर कोई स्थायी दुष्प्रभाव है या नहीं, इस बारे में लंबे समय का कोई रिसर्च डाटा नहीं है। जैसे अमेरिका में अभिभावक पूछ रहे हैं कि वैक्सीन का बच्चियों के मासिक चक्र या प्रजनन क्षमता पर क्या कोई दुष्प्रभाव हो सकता है? इस बारे में डॉक्टर ऑलिवर का कहना है कि इसका कोई बायोलॉजिक अध्ययन या डाटा नहीं है कि वैक्सीन ऐसे मामलों में क्या असर डालेगी।

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तभी समझदारी की बात यह होगी कि इस मामले में जल्दबाजी न की जाए। वैसे भी अगर बच्चों में कोरोना का संक्रमण होने की संभावना कम है और संक्रमण के गंभीर होने का खतरा और भी कम है तो उन्हें वैक्सीन लगाने की जल्दबाजी क्यों करनी चाहिए! बच्चों को लगने वाली वैक्सीन के ट्रायल की ज्यादा जरूरत है। अलग अलग पहलुओं से इसका ट्रायल होना चाहिए और लंबे समय का क्लीनिकल डाटा और बायोलॉजिक अध्ययन किया जाना चाहिए। ध्यान रहे यह वैक्सीन एक साथ दुनिया के करोड़ों बच्चों को लगेगी और इसकी जरा सी गड़बड़ी करोड़ों बच्चों का भविष्य खराब कर सकती है। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि कोरोना की वैक्सीन रिकार्ड समय में बनी है। यह पहली बार हुआ है कि दवा आने से पहले वैक्सीन आई है। आमतौर पर वैक्सीन का परीक्षण सात से 10 साल तक चलता है और तब वैक्सीन को मंजूरी दी जाती है। कोरोना महामारी की भयावहता को देखते हुए एक साल के अंदर वैक्सीन तैयार की गई है। इसलिए इस वैक्सीन में कई किस्म की कमियां हो सकती हैं। वैक्सीनेशन होने के बावजूद लोगों को संक्रमण होना, इसकी एक कमी है। ऐसी और भी कमियां हो सकती हैं। व्यस्कों का शरीर तो हो सकता है कि इन कमियों को झेल ले लेकिन बच्चों के लिए मुश्किल हो सकती है।

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कम जोखिम वाले समूह यानी बच्चों और किशोरों के लिए यूनिवर्सल वैक्सीनेशन के साथ एक नैतिकता का सवाल भी जुड़ा है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लुएचओ ने उठाया है। डब्लुएचओ चाहता है कि बच्चों और किशोरों को वैक्सीन देने में थोड़ी देरी की जाए और वैक्सीन की आपूर्ति गरीब व कम आय वाले देशों को की जाए ताकि वहां ज्यादा से ज्यादा व्यस्क आबादी को वैक्सीन लगा कर उनकी जान बचाई जा सके। ध्यान रहे दुनिया के अनेक देशों में अभी बहुत मामूली वैक्सीनेशन हुआ है क्योंकि वे टीका खरीदने में सक्षम नहीं हैं या उन्होंने पहले से टीके का ऑर्डर नहीं दिया है। डब्लुएचओ को लग रहा है कि अमीर देशों के बच्चों को टीका लगाने से पहले इन गरीब देशों में व्यस्कों को टीका लगाना जरूरी है तभी इन देशों में व्यस्क और बच्चे दोनों बचेंगे। बच्चों के वैक्सीनेशन को इस नजरिए से भी देखने की जरूरत है। भारत में वैसे ही 18 साल से ऊपर की आबादी 106 करोड़ से ज्यादा है और उसी आबादी को टीका लगाना मुश्किल हो रहा है इसलिए 18 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के लिए वैक्सीनेशन शुरू कर देना बहुत समझदारी की बात नहीं होगी।

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