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आंसुओं को संभालिए साहेब!

अगर आपके आंसू दूसरों के लिए नहीं हैं तो फिर माफ कीजिएगा उन आंसुओं का कोई मतलब नहीं है। अपनी तकलीफ में तो जानवर भी आंसू बहाते हैं और दिखावे के लिए आंसू बहाने का कारोबार बहुत से लोग करते हैं। प्रधानमंत्री के ऐसे भाषण भी हैं, जिनमें वे रोते रहने वालों का मजाक उड़ाते हैं। उन्होंने एक भाषण में कहा था- बहुत से लोग हमेशा रोते रहते हैं। मैं न रोने में विश्वास रखता हूं न रूलाने में। पर हकीकत यह है कि इस भाषण के बाद वे दर्जनों बार रो चुके हैं और पूरे देश को खून के आंसू रूला चुके हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंसू अब मजाक की श्रेणी में आ गए हैं। अब उनके आंसू मन में किसी प्रकार की भावना पैदा नहीं करते हैं। उनके आंसुओं से जुगुप्सा पैदा होती है। उनके आंसुओं का या उनके भावुक होने का मजाक बनता है। अगर प्रधानमंत्री के आंसू मजाक बन जाएं तो आप सोच सकते हैं कि देश के सर्वोच्च पद की गरिमा और विश्वसनीयता को कितना नुकसान पहुंचा है!

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आंसू अनमोल होते हैं। आंसुओं से पाप धुल जाते हैं। मन का कलुष मिट जाता है। मुनव्वर राणा ने अपनी मां और दुनिया भर की माओं के लिए लिखा है कि ‘मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है और इस तरह वो मेरे गुनाहों को धो देती है’। मतलब आंसू गुस्से को भी बहा ले जाते हैं और गुनाहों को भी धो देते हैं। आंसुओं को मोती भी कहा जाता है। कुमार विश्वास ने लिखा है कि ‘यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आंसू हैं, जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है’। आंसुओं से सैलाब आने की अनगिनत कहानियां भारत के मिथक कथाओं से लेकर आधुनिक समय तक में मौजूद हैं। द्रौपदी के आंसुओं से कैसा सैलाब आया था, उसकी कथा महाभारत में दर्ज है। किसान नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने क्या करिश्मा किया, यह हाल ही में देश और दुनिया ने देखा। भारत में न्यूज चैनलों ने अपने शुरुआती दिनों में ईश्वर की अनेक प्रतिमाओं की आंखों से आंसू निकालने का चमत्कार किया था और खूब टीआरपी बटोरी थी।

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मां के आंसू, प्रेमिका के आंसू, दोस्त और यहां तक कि दुश्मन के आंसू भी बेशकीमती होते हैं। यह कोई लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं है पर आंसू को स्त्रियों का अमोघ अस्त्र भी माना गया है। आंसू खुशी के होते हैं तो दुख के भी होते हैं। दर्द होने पर भी आंसू निकलते हैं और क्रोध आने पर भी आंखों में आंसू आते हैं। कुछ लोग बहुत संवेदनशील होते हैं और दूसरों के दुख देख कर उनकी आंखें अनायास भर आती हैं। ऐसे लोगों को ही ‘वैष्णव जन’ कहा गया है। आंसू निकालने का एक कारोबार भी होता है। अनेक जगहों पर दुख के मौकों पर रोने के लिए महिलाओं को बुलाया जाता है। उन्हें रूदाली कहते हैं। कल्पना लाजमी ने 1993 में ‘रूदाली’ नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई थी, जिसके लिए डिंपल कपाड़िया को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था।

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पशु-पक्षियों के भी आंसू निकलते हैं। एक माननीय न्यायमूर्ति ने कुछ समय पहले कहा था कि मोर से आंसू पीकर मोरनी गर्भवती होती है। हालांकि जीव वैज्ञानिकों ने माननीय न्यायमूर्ति की यह बात मानने से इनकार कर दिया! बहरहाल, यह जीव विज्ञान का तथ्य है कि मगरमच्छ जब अपने शिकार को पकड़ता है और उसे निगलने-पचाने की कोशिश करता है तो उसकी आंखों से आंसू निकलते हैं। यह आंसू इसलिए नहीं आता है कि मगरमच्छ के मन में पकड़े गए शिकार के प्रति कोई दया या करुणा का भाव होता है। असल में मगरमच्छ को शिकार पकड़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है लेकिन उसे निगलने और हजम करने में ज्यादा तकलीफ होती है और इसी कोशिश में उसकी आंखों से आंसू निकलते हैं। इसी वजह से ‘घड़ियाली आंसू बहाने’ या ‘मगरमच्छ के आंसू’ यानी रोने का दिखावा करने या रोने की मजबूरी का मुहावरा बना है।

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तभी दिखावे के लिए बहाए गए आंसुओं की कोई कीमत नहीं होती है। बिहार के पुराने लोग बताते हैं कि वहां मुख्यमंत्री रहे एक नेता महामाया प्रसाद में ऐसी खूबी थी कि वे जहां भीड़ देखते थे, उनकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगते थे। वे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में जहां भी जाते थे, वहां धरासार रोते थे। उनका रोना उनका बड़ा राजनीतिक दांव था, उनका अमोघ अस्त्र था। ऐसे व्यक्ति विरले होते हैं, जो अपनी इच्छा से कहीं भी आंसू निकाल सकें। उनके भावुक होने और आंसू निकालने की स्वाभाविकता उन्हें विरल इंसान बनाती है। लेकिन एक समय के बाद यह स्वाभाविकता नाटकीयता में बदल जाती है और आंसू अपना असर नहीं छोड़ पाते हैं। फिर आंसू रूदाली के कारोबार में बदल जाते हैं। लोग उनकी हकीकत जानने लगते हैं। तभी आंसुओं का इस्तेमाल बहुत सोच-समझ करना चाहिए। अत्यधिक इस्तेमाल से इनकी कीमत कम होती है। कई बार झूठ-मूठ के आंसू बहाना या आंसू बहाने का अभिनय भी भारी पड़ जाता है। आंसू बहाने के अत्यधिक अभिनय की वजह से हिंदी फिल्मों के महानतम अभिनेता दिलीप कुमार और महानतम अभिनेत्री मीना कुमारी एक समय में अवसाद में चले गए थे।

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सो, आप चाहे अभिनय के लिए ही आंसू निकाल रहे हों पर उसकी भी एक सीमा होती है। एक  सीमा के आगे आपके आंसू आपके लिए या तो अवसाद का कारण बनेंगे या दूसरों के लिए मजाक का! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंसू भी अब इसी श्रेणी में आ गए हैं। अब उनके आंसू मन में किसी प्रकार की भावना पैदा नहीं करते हैं। उनके आंसुओं से जुगुप्सा पैदा होती है। उनके आंसुओं का या उनके भावुक होने का मजाक बनता है। अगर प्रधानमंत्री के आंसू मजाक बन जाएं तो आप सोच सकते हैं कि देश के सर्वोच्च पद की गरिमा और विश्वसनीयता को कितना नुकसान पहुंचा है! प्रधानमंत्री को उदार होना चाहिए। दया और करुणा ऐसे सद्गुण हैं, जो प्रधानमंत्री में अनिवार्य रूप से होने चाहिएं। लेकिन उसकी दया, करुणा और उदारता उसके कार्यों में दिखने चाहिएं, उसके आंसुओं में नहीं।

क्या प्रधानमंत्री के कार्यों में दया, करुणा और उदारता का भाव दिखता है? जिस मां गंगा ने उनको कथित तौर पर बनारस बुलाया था, उसी गंगा में पूरे मई के महीने में लाशें बहती रहीं। हजारों लोगों ने मजबूरी में अपनों की लाशों का जल प्रवाह किया या गंगा के किनारे रेती में दफना दिए। लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री के मुंह से एक लफ्ज सुनने को नहीं मिला। अपने स्वजनों की लाशों को लावारिस छोड़ आए लोगों की आत्मिक पीड़ा का अहसास अगर प्रधानमंत्री को होता तो उनके लिए दिल से आंसू निकलते और तब उन आंसुओं का मोल होता। अगर अपने मासूम बच्चों को कंधे पर लिए पैदल चल रहे करोड़ों प्रवासी मजदूरों की पीड़ा ने प्रधानमंत्री को दुखी किया होता और उनके लिए आंसू निकलते तो वो आंसू बेशकीमती माने जाते।

यह कड़वा सत्य है कि मानवता के संकट के किसी मौके पर प्रधानमंत्री के आंसू नहीं निकले हैं। उलटे ऐसे मौकों पर उनके ठहाके और कहकहे सुनने को मिले हैं। उन्होंने नोटबंदी के बाद कहकहे लगाते हुए कहा था कि घर में बेटी की शादी है और पैसे नहीं हैं’! जिस समय देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर की तकलीफ झेल रहा था और लोग अपने परिजनों को लेकर ऑक्सीजन के लिए भागदौड़ कर रहे थे तब प्रधानमंत्री ‘दीदी ओ दीदी’ की नाटकीय आवाज निकाल कर ममता बनर्जी का मजाक बना रहे थे। पिछले सात साल में देश के सामने अनेक संकट आए। ये संकट क्यों आए, उस बात को छोड़ दें तब भी यह हकीकत है कि किसी भी संकट के समय प्रधानमंत्री के आंसू नहीं निकले। उलटे ऐसे संकटों के समय वे इनसे बेपरवाह दिखे और अपने राजनीतिक लक्ष्य को पूरा करने में लगे रहे।

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तभी उनके आंसुओं का अब कोई मोल नहीं रह गया है। अगर आपके आंसू दूसरों के लिए नहीं हैं तो फिर माफ कीजिएगा उन आंसुओं का कोई मतलब नहीं है। अपनी तकलीफ में तो जानवर भी आंसू बहाते हैं और दिखावे के लिए आंसू बहाने का कारोबार बहुत से लोग करते हैं। प्रधानमंत्री के ऐसे भाषण भी हैं, जिनमें वे रोते रहने वालों का मजाक उड़ाते हैं। उन्होंने एक भाषण में कहा था- बहुत से लोग हमेशा रोते रहते हैं। मैं न रोने में विश्वास रखता हूं न रूलाने में। पर हकीकत यह है कि इस भाषण के बाद वे दर्जनों बार रो चुके हैं और पूरे देश को खून के आंसू रूला चुके हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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