nayaindia PM Modi event judges कार्यपालिका और न्यायपालिका साथ-साथ!
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| PM Modi event judges कार्यपालिका और न्यायपालिका साथ-साथ!

कार्यपालिका और न्यायपालिका साथ-साथ!

अच्छा लगा कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के शीर्ष लोग एक साथ बैठे और न्याय प्रक्रिया की मौजूदा स्थिति पर विचारों का आदान-प्रदान किया। प्रधानमंत्री और सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस के साथ राज्यों के मुख्यमंत्री और उच्च अदालतों के मुख्य न्यायाधीशों की दिन भर हुई बैठक कई मायने में अहम है। इसमें कुछ नए सुझाव सुनने को मिले तो साथ ही न्यायपालिका की मुश्किलों के बारे में भी चीफ जस्टिस ने दो टूक अंदाज में अपनी बात रखी। मुख्य न्यायाधीश की कई बातों से प्रधानमंत्री की सहमति थी। एकाध ऐसे भी सुझाव थे, जिन्हें उसी समय कानून मंत्री ने ठुकरा दिया। इसके बावजूद कुल मिला कर खुली और बेबाक चर्चा से देश की उच्च न्यायपालिका और कार्यपालिका व विधायिका के साथ उसके संबंधों की तस्वीर उभरी है। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि यह तस्वीर कोई बहुत अच्छी नहीं है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों को मिल कर इस तस्वीर को बेहतर बनाना है ताकि अधिकतम लोगों को न्याय मिल सके और न्याय प्रणाली में लोगों का भरोसा मजबूत हो।

इसकी शुरुआत लंबित मामलों के जल्दी से जल्दी निपटारे से हो सकती है। चीफ जस्टिस ने इसके लिए कार्यपालिका और विधायिका को जिम्मेदार ठहराया है। हो सकता है कि सारी जिम्मेदारी इन्हीं दो अंगों की नहीं हो लेकिन इसमें संदेह नहीं है कि ज्यादा जिम्मेदारी इन दोनों की बनती है। मौजूदा चीफ जस्टिस एनवी रमना लगातार इस पर टिप्पणी करते रहे हैं। उन्होंने बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि बिना सोचे-समझे और बिना किसी दूरदृष्टि के कानून बना दिए जाते हैं, जैसे बिहार में शराबबंदी का कानून है, इसकी वजह से अदालतें मुकदमों से भरी हैं। उन्होंने फिर यह बात दोहराई। यह बहुत अहम बात है, जिसकी गंभीरता को समझने की जरूरत है। उन्होंने कानूनों की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और कहा कि व्यापक विचार-विमर्श और आम नागरिकों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए, हर पहलू की समीक्षा के बाद कानून बनना चाहिए। यह विधि निर्माण की मौजूदा प्रक्रिया पर बहुत बड़ी टिप्पणी है। ध्यान रहे देश में इन दिनों कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की स्थायी समितियों और प्रवर समितियों की भूमिका नगण्य हो गई है। तभी केंद्र और राज्य सरकारों को भी चीफ जस्टिस की टिप्पणी की गंभीरता को समझना चाहिए और विधि निर्माण में व्यापक विचार-विमर्श का रास्ता अपनाना चाहिए।

विधायिका के साथ साथ कार्यपालिका भी लंबित मामलों के लिए बराबर जिम्मेदार है। चीफ जस्टिस ने इस ओर इशारा करते हुए कहा कि सबसे बड़ी मुकदमेबाज सरकारें हैं। ध्यान रहे अदालतों में ऐसे मुकदमों की संख्या लाखों में हैं, जिनमें एक पक्ष सरकार है। सरकारी सिस्टम और सरकारी वकीलों की वजह से ऐसे मामले निपटने में सालों लगते हैं। कार्यपालिका की दूसरी कमी यह है कि बरसों से चल रही चर्चा के बावजूद अदालतों का बुनियादी ढांचा बेहतर बनाने का कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ है। अदालतों की नई इमारतों का निर्माण नहीं हो रहा है, जजों के आवास और वकीलों के चैंबर नहीं बन रहे हैं, तकनीक के इस्तेमाल की रफ्तार बहुत धीमी है और सबसे ऊपर जजों व न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति पर्याप्त संख्या में और समय पर नहीं हो पा रही है। इसकी जिम्मेदारी कार्यपालिका की है। तभी चीफ जस्टिस ने जजों की समयबद्ध नियुक्ति का प्रस्ताव रखा। सरकार इस पर सहमत है लेकिन इसके लिए एक बेहतर सिस्टम तैयार करना होगा ताकि न सिर्फ पर्याप्त संख्या में नियुक्ति हो, बल्कि बेहतर गुणवत्ता वाले जज नियुक्त हों। पिछले कुछ समय से देश की विभिन्न अदालतों में जजों की जैसी टिप्पणी या जैसे फैसले सुनने को मिले हैं, उससे गुणवत्ता में गिरावट के संकेत मिलते हैं। उच्च न्यायपालिका को इसका खास ख्याल रखना होगा। जजों की संख्या और उनकी गुणवत्ता के मामले में न्यायपालिका की बराबर भूमिका है क्योंकि नियुक्ति अंतिम तौर पर सरकार द्वारा होनी है लेकिन उसकी प्रक्रिया न्यायपालिका से ही शुरू होती है।

सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने एक और अहम बात यह कही कि अदालतों के फैसलों पर सरकारें ध्यान नहीं देती हैं, उन पर समय से अमल नहीं होता है, जिसकी वजह से लोग अवमानना की याचिका लेकर फिर से अदालत में आते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालतों के पास अपने फैसले पर अमल कराने का मेकानिज्म नहीं होता है। उसके फैसलों पर सरकारों को ही अमल कराना होता है। अगर अदालतों के फैसलों पर पूरी तरह से और निश्चित समय में अमल नहीं होता है तो इससे सिर्फ अदालतों की साख ही नहीं घटती है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है, उसके साथ अन्याय होता है। इसी तरह के एक और अन्याय की ओर चीफ जस्टिस और प्रधानमंत्री दोनों ने ध्यान दिलाया। इस समय देश की जेलों में करीब साढ़े तीन लाख विचाराधीन कैदी बंद हैं। इनमें से ज्यादातर गरीब, पिछड़े और वंचित समूहों के हैं। बिना सुनवाई के उनका जेलों में कैद रहना उनके नागरिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। भारत सहित दुनिया भर की न्याय व्यवस्था में जमानत को अधिकार माना गया है और जेल को अपवाद। भारत की न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों को मिल कर सोचना होगा कि कैसे हर आरोपी के जमानत का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

प्रधानमंत्री ने अदालतों में स्थानीय भाषा में कामकाज की वकालत की। न्याय प्रक्रिया का यह एक जरूरी पहलू है कि अदालत में चल रही सुनवाई को वादी और प्रतिवादी दोनों समझ सकें। अभी ज्यादातर मामलों में वादी-प्रतिवादी को पता ही नहीं चलता है कि अदालत में क्या प्रक्रिया चल रही है। उनके वकील ही समझते और समझाते हैं। निचली अदालतों में स्थानीय भाषा में सुनवाई होती है लेकिन कानूनी शब्दावली इतनी जटिल है कि आम आदमी उसे समझ नहीं सकता है। इसलिए भाषा और कंटेंट दोनों के स्तर पर सुधार की जरूरत है। निचली अदालतों में पहले से स्थानीय भाषा में सुनवाई होती है। जहां तक संवैधानिक अदालतों यानी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की बात है तो वहां की स्थानीय भाषा क्या होगी, यह विचार का विषय है। उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति पूरे देश से होती है। कोई बांग्लाभाषी जज मद्रास या कर्नाटक हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस हो सकता है। उसे तमिल या कन्नड़ में सुनवाई के लिए कैसे बाध्य किया जा सकता है? इसलिए भाषा के मामले में सोच-समझ कर नीति बनानी होगी। जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी कदम नए विवाद पैदा कर सकता है।

कुल मिला कर कार्यपालिका और न्यायपालिका का साथ बैठ कर बुनियादी समस्याओं पर विचार करना एक अच्छी पहल है। इसमें मोटे तौर पर समस्याओं की पहचान हो गई है। अदालतों में करोड़ों की संख्या में मुकदमे लंबित हैं या लाखों की संख्या में विचाराधीन कैदी जेलों में बंद हैं या सहज रूप से न्याय तक सबकी पहुंच नहीं है तो उसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। कानूनों की गुणवत्ता, अदालतों में बुनियादी ढांचे की कमी, जजों की नियुक्ति में होने वाली देरी और भाषा की समस्या की पहचान हुई है। लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को मिल कर इन समस्याओं को दूर करने की ठोस पहल करनी चाहिए।

Tags :

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published.

3 × 4 =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
मुकेश अंबानी अब नहीं रहेंगे रिलायंस जियो इनफोकॉम लिमिटेड के चेयरमैन, दिया इस्तीफा…
मुकेश अंबानी अब नहीं रहेंगे रिलायंस जियो इनफोकॉम लिमिटेड के चेयरमैन, दिया इस्तीफा…