‘देश नहीं बिकने दूंगा’ का नारा

यह भी भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि देश का प्रधानमंत्री अपने प्रचार में कहे कि देश नहीं बिकने दूंगा, देश नहीं झुकने दूंगा! वह भी तब जब कभी भी देश के झुकने या बिकने की कोई मिसाल पहले नहीं रही हो। इस मामले में आजाद भारत का इतिहास गौरवशाली रहा है। चीन से हम लड़ाई हारे जरूर पर हारना और झुक जाना दोनों अलग चीजें हैं। पर पता नहीं किस सोच में देश नहीं बिकने दूंगा का नारा दिया गया। आज सारा देश देख रहा है कि देश के संसाधन कैसे बिक रहे हैं। ऐसे बिक रहे हैं कि अगर बिकने की रफ्तार यहीं रही तो पांच साल के बाद देश के पास अपना कहने को कुछ नहीं रह जाएगा।

विनिवेश के नाम पर देश के सारे संसाधन बेचे जा रहे हैं। अपनी आर्थिक नीतियों की विफलता से जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई उन संसाधनों को बेच कर की जा रहा है, जो उन लोगों ने बनाए हैं, जिन्होंने कथित तौर पर 70 साल में कुछ नहीं किया। जिन्होंने कुछ नहीं किया उनकी बनाई चीजें बेच कर सरकार अपना काम चला रही है या अपने लोगों को उपकृत कर रही है। पहले विनिवेश सिर्फ उन्हीं कंपनियों का करना था, जो बेकार हो गई हैं, घाटे में हैं या बीमार हैं। पर अब खुला खेल है। मुनाफे में चल रही कंपनियों को बेचा जा रहा है। दो-चार क्रोनी उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए विनिवेश के रास्ते का इस्तेमाल किया जा रहा है।

यह इतने खुलेआम तरीके से हो रहा है बावजूद इसके लोगों को दिखाई नहीं दे रहा है। यह भी जादूगर का कमाल होता है जो वह सारे जादू लोगों की आंखों के सामने करता है पर किसी को दिखता नहीं है कि असल में क्या हो रहा है। असल में वह लोगों की नजरों को धोखा दे रहा होता है। वैसे ही कुछ अभी हो रहा है। सरकार रोज कह रही है कि वह रेलवे का निजीकरण नहीं करेगी। अब भी कहा जाएगा। पर पहली निजी ट्रेन का परिचालन शुरू हो गया है और जल्दी ही डेढ़ सौ ट्रेनें और 50 स्टेशन निजी हाथ में दिए जाने वाले हैं। कोई पूछे कि सरकारी जमीन पर, सरकारी खर्च से बने बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल कर आम लोगों की लूट की छूट निजी कंपनियों को देने का अधिकार सरकार को किसने दिया?

सरकार एयर इंडिया को बेचने जा रही है। पहली बार इसे बेचने की कोशिश हुई तो खरीदार नहीं मिला। वह भी एक रहस्य है कि ऐसा क्यों हुआ। पर अब खरीदार मिल जाएगा क्योंकि सरकार ने इसे बिक्री पर लगाने से पहले एक बदलाव किया है। इस बदलाव के बाद जो भी एयर इंडिया को खरीदेगा उसे कंपनी का पूरा कर्ज नहीं चुकाना होगा। कंपनी ने अपने संचालन के लिए जो कर्ज लिया था, जो करीब 50 हजार करोड़ रुपए है वह खरीदार को नहीं चुकाना है वह सरकार यानी आम लोग चुकाएंगे। अब खरीदार को सिर्फ विमानों की लीज के नाम पर लिया गया 15 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ही चुकाना होगा। क्या कोई अपनी संपत्ति को इस तरह औने पौने में बेचने के बारे में सोच भी सकता है? पर चूंकि संपत्ति सरकारी है और इसकी बिक्री से कुछ आना ही अपना जाना कुछ नहीं है तो जैसे हो वैसे बेच दो!

इसी तरह सरकार पेट्रोलियम क्षेत्र की भारत की बड़ी कंपनी भारत पेट्रोलियम यानी बीपीसीएल को बेचने जा रही है। सोचें, देश के सबसे बड़े उद्योगपति की सारी कमाई पेट्रोलियम सेक्टर की है पर सरकार की पेट्रोलियम कंपनी ठीक काम नहीं कर रही है और उसे बेचा जा रहा है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस कंपनी का राष्ट्रीयकऱण संसद के बनाए कानून के जरिए किया गया था पर अब इसे बेचने के लिए संसद की मंजूरी नहीं ली जाएगी क्योंकि सरकार ने चुपचाप राष्ट्रीयकरण वाले कानून को ही खत्म कर दिया है। सो, सरकार अपनी मर्जी से और अपने बनाए नियमों के हिसाब से इसे बेच देगी। सरकार हवाईअड्डे बेच रही है। पिछले दिनों छह हवाईअड्डों की नीलामी हुई और देश के एक ही उद्योग समूह को पांच हवाईअड्डे मिल गए।

ध्यान रहे भारत में सिर्फ 14 हवाईअड्डे हैं, जिनके परिचालन में मुनाफा है। ये पांच हवाईअड्डे भी उन्हीं में से थे। अब सरकार बचे हुए मुनाफा कमाने वाले हवाईअड्डे बेचने जा रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि इनमें से भी ज्यादातर हवाईअड्डे उसी कंपनी को मिलेंगे, जिसे पहले मिले हैं। पर कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। असली कहानी यह है कि पिछले दिनों सरकार ने हवाईअड्डों के परिचालन से जुड़े कानून को भी बदल दिया है। पहले हवाईअड्डों का परिचालन निजी हाथ में देने के बावजूद नियंत्रण एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया, एएआई का रहता था। हवाईअड्डों का शुल्क आदि बढ़ाने का फैसला एएआई की मंजूरी से किया जाता था। अब नए नियम के मुताबिक जो हवाईअड्डे निजी हाथ में दिए जाएंगे, उनके परिचालन में एएआई की कोई भूमिका नहीं रहेगी। सारे फैसले वह निजी कंपनी करेगी।

देश की सड़कें तो सरकार ने पहले ही निजी कंपनियों को बनाने और उन पर चलने वालों से ‘लगान’ वसूलने के लिए दे दिया है। सरकार ने देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो के लिए सेटेलाइट बनाने का काम निजी कंपनियों को देना शुरू कर दिया है। सेना के लिए हथियार बनाने के काम में निजी कंपनियों को शामिल कर दिया गया है। सरकार अपनी दोनों संचार कंपनियों- बीएसएनएल और एमटीएनएल को बंद करने जा रही है। उसके बाद हो सकता है कि हजारों करोड़ रुपए की लागत से बने इनके टावर संचार की उस कंपनी को चले जाएं, जिसकी वजह से ये कंपनियां बंद हो रही हैं। सरकार अपनी बिजली कंपनी के ट्रांसमिशन लाइन बेचने जा रही है, गैस पाइपलाइन बेचे जा रहे हैं, खदान औने पौने दाम पर बेचे जा रहे हैं, रिजर्व बैंक का आरक्षित रखा गया पैसा निकाला जा रहा है। सवाल है कि इन सबसे मिला कर ही देश बनता है या देश अलग है और ये चीजें अलग हैं? अगर इनको बेचा जा रहा है तो यह क्या देश बेचना नहीं कहा जाएगा?

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