मोदी भाषणः चित भी मेरी पट भी मेरी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जो कुछ कहा, दो-तीन दिन पहले वहीं बातें उनके स्वास्थ्य मंत्री ने भी कही थी। फिर अलग से इस संबोधन की क्या जरूरत थी? डॉक्टर हर्षवर्धन ने देश को लोगों को चेतावनी दी थी कि त्योहारों के सीजन में लापरवाही न बरतें, सावधान रहें और दिशा-निर्देशों का पालन करें। उन्होंने केरल की मिसाल दी थी और कहा था कि वहां ओणम के दौरान लापरवाही बरती गई, जिसका नतीजा यह हुआ है कि हजारों की संख्या में केसेज आने लगे हैं। यह अलग बात है कि उन्होंने कबीर दास या तुलसीदास का दोहा नहीं सुनाया था पर बाकी लगभग सारा कंटेंट एक ही जैसा था!

तभी प्रधानमंत्री के भाषण को जरा बारीकी से देखने की जरूरत है और इस भाषण से बनने वाली सुर्खियों के बीच में कुछ तलाशने की जरूरत है। प्रधानमंत्री का कोई काम अनायास नहीं होता है। उसके पीछे एक सुविचारित योजना होती है। इस भाषण के पीछे भी है। सोचें, यह भाषण किस समय हुआ है? जब पिछले दो-तीन हफ्ते से लगातार कोरोना के केसेज कम हो रहे हैं और जिस दिन तीन महीने में पहली बार कोरोना के केसेज 50 हजार से नीचे आए, उसके अगले दिन प्रधानमंत्री का भाषण हुआ। सो, इसका पहला मकसद तो यह बताना था कि भारत ने कोरोना संक्रमण को रोक दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा भी कि भारत संभली हुई स्थिति में है और दुनिया के साधन संपन्न देशों के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा लोगों का जीवन बचाने में सफल रहा है। लेकिन इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने यह भी कह दिया कि लोगों को लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए वरना अमेरिका और यूरोप जैसा हस्र हो सकता है।

उन्होंने बताया कि अमेरिका और यूरोप के देशों में केसेज कम हो रहे थे पर अचानक अब बहुत बढ़ने लगे हैं। उनके कहने का मतलब था कि भारत में भी ऐसा हो सकता है। तभी उन्होंने कबीर दास का दोहा पढ़ा- पकी खेती देखि के गर्व किया किसान, अजहूं झोला बहुत है घर आवे तब जान।

उन्होंने अमेरिका, यूरोप की मिसाल दी पर यह नहीं बताया कि अमेरिका और यूरोप के लोगों ने कोई बड़ी लापरवाही नहीं बरती थी। वहां लॉकडाउन हटने के बाद सामान्य जनजीवन बहाल होने और सर्दियां शुरू होने की वजह से कोरोना वायरस की दूसरी लहर आई हुई है। तभी इस बात का पूरा अंदेशा है कि लॉकडाउन खत्म होने, सामान्य जनजीवन बहाल होने, सर्दियां शुरू होने और त्योहारों के सीजन में भारत में भी केसेज बढ़ सकते हैं। प्रधानमंत्री ने खुद ही कहा कि लॉकडाउन चला गया है पर वायरस नहीं गया है। जब वायरस गया नहीं है तो वह कैसे नहीं फैलेगा? जब लोग जीवन को गति देने के लिए बाहर निकल रहे हैं, धीरे धीरे बाजारों में रौनक लौट रही है तो तय मानें कि कोरोना भी फैलेगा। भले अभी केसेज थमे हुए दिख रहे हैं पर इसका यह मतलब नहीं है कि कोरोना से हमारी लड़ाई पूरी हो गई है।

जहां तक संभला हुआ होने की बात है तो वह सब्जेक्टिव और सापेक्षिक मामला है। अभी भारत में 75 लाख से ज्यादा केसेज हैं और एक लाख 15 हजार लोगों की मौत हुई है उसे संभला हुआ होना कहा जा रहा है। अगर यह संख्या दोगुनी होती तब भी उसे संभला हुआ होना कहा जा सकता था क्योंकि यह सब्जेक्टिव मामला है। अमेरिका के मुकाबले भारत में प्रति दस लाख लोगों पर मृत्यु कम हुई है, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने किया। उन्होंने कहा कि भारत में दस लाख की आबादी पर मृत्यु दर 83 है, जबकि साधन संपन्न देशों में छह सौ तक है। सवाल है कि आप अमेरिका, यूरोप के साधन संपन्न देशों से अपनी तुलना क्यों कर रहे हैं? या तो एशिया के साधन संपन्न देशों से तुलना करें या दक्षिण एशिया के अपने जैसे देशों से तुलना करें, फिर देखें क्या तस्वीर बनती है!

भारत में दस लाख की आबादी पर 83 लोगों की मौत हुई है तो पाकिस्तान में दस लाख की आबादी पर 30 लोगों की मौत हुई है। दस लाख की आबादी पर बांग्लादेश में 35 लोगों की, इंडोनेशिया में 46 लोगों की, फिलीपींस में 61 लोगों की, नेपाल में 26 लोगों की और श्रीलंका में 0.6 लोगों की मौत हुई है। एशिया में तीन साधन संपन्न देश हैं- चीन, जापान और दक्षिण कोरिया। कोरोना वायरस से चीन में प्रति दस लाख की आबादी पर सिर्फ तीन लोगों की मौत हुई है। जापान में 13 लोगों की और दक्षिण कोरिया में नौ लोगों की मौत हुई है। इन देशों की तुलना में तो भारत में बहुत ज्यादा मौतें हुई हैं! सो, मृत्यु दर कम होना या संभला हुआ होना एक सापेक्षिक बात है, जिससे वास्तविक तस्वीर नहीं जाहिर होती है। दूसरे, भारत संभला हुआ इसलिए भी दिख रहा है कि क्योंकि दुनिया के तमाम साधन संपन्न देशों के मुकाबले यहां प्रति दस लाख आबादी पर सबसे कम टेस्ट हुए हैं।

प्रधानमंत्री का अमेरिका और यूरोप में केसेज बढ़ने की मिसाल देना या कबीर दास का दोहा पढ़ना अनायास नहीं है। यह तीन महीने बाद बनने वाली तस्वीर का पूर्वाभास है। इसका एक संकेत कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए बनाई गई केंद्रीय टीम ने भी दे दिया है। इस टीम का आकलन है कि अगर त्योहारों में और सर्दियों में सावधानी नहीं बरती गई तो देश में हर महीने 26 लाख केसेज आएंगे। यानी अगस्त-सितंबर में जिस तरह केसेज आ रहे थे, उस तरह केसेज फिर आने लगेंगे। इसी का संकेत प्रधानमंत्री ने भी दिया। उन्होंने आगाह कर दिया ताकि लोग बाद में न कहें कि बताया नहीं था। उन्होंने इसी तरह होली से एक हफ्ते पहले भी बता दिया था कि वे होली नहीं खेलेंगे और लोग सावधान रहें। अब लोग सावधान नहीं रहे और देश में कोरोना के 75 लाख केसेज हो गए तो सरकार क्या कर सकती है!

वैसे ही उन्होंने दशहरा, दिवाली, छठ, गुरु नानक जयंती से पहले भी आगाह कर दिया है। इसके बाद भी लोग लापरवाही बरतते हैं और केसेज बढ़ते हैं तो उसमें सरकार क्या कर पाएगी? सरकार तो वैसे भी कुछ नहीं कर पा रही है। जो करना है लोग खुद ही कर रहे हैं। त्योहारों के बीच ही बिहार में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं। सारी सावधानी ताक पर रख कर सभाएं हो रही हैं, हजारों लोग उसमें जुट रहे हैं और मास्क-सेनिटाइजर के दर्शन दूर-दूर तक नहीं हो रहे हैं, पर प्रधानमंत्री ने उसके बारे में सावधान नहीं किया। बहरहाल, मरने वालों की संख्या में साधन संपन्न देशों से तुलना की जाएगी पर यह नहीं देखा जाएगा कि साधन संपन्न देश अपने यहां मुफ्त में टेस्ट करा रहे हैं। भारत में तो टेस्टिंग के नाम पर अलग ही लूट मची हुई है। यहां न टेस्ट मुफ्त हुए, न देश की ज्यादा से ज्यादा आबादी को सांस्थायिक रूप से मुफ्त में मास्क उपलब्ध कराया गया और न पीपीई किट्स उपलब्ध कराए गए। इसके बावजूद भारत में स्थिति संभली हुई है तो यह आंकड़ों की बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं है।

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