Lok Sabha elections 2024 मोदी अभी से 24 की चिंता में!
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मोदी अभी से 24 की चिंता में!

Lok Sabha elections 2024

यह वैसे सही बात है कि नरेंद्र मोदी चुनाव की चिंता करते हुए कब नहीं होते! उनकी कमान और राज की पहचान यह साबित करते रहना है कि उनकी जीत लगातार है। गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उनकी पहचान थी कि वे वहां लगातार चुनाव जीतते रहे तो दिल्ली में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यहीं पहचान कि वे चुनाव नहीं हार सकते। सवाल है जब ऐसा ट्रैक रिकार्ड है तो क्या तुक जो चौबीसों घंटे चुनावी मोड में रहा जाए? हर दिन जनता के आगे नई-नई झांकी और भाषण का प्रायोजन! हर दिन राजनीति, हर दिन सुर्खियों का, टीवी पर चेहरे के दर्शन का मैनेजमेंट और कभी कौन सा फोटोशूट तो कभी कौन सा! यों ये सब इतिहास के कूड़ेदानी की बातें हैं बावजूद इसके याद करें कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने कितनी तरह के फोटोशूट कराए हैं? योगी के कंधे पर हाथ रखने से ले कर दलित के पांव धोने, टैंक पर सैनिक कमांडर की तरह खड़े होने के इतनी तरह के ऐसे-ऐसे फोटोशूट हैं कि दुनिया में शायद ही कभी किसी प्रधानमंत्री ने कराए हों। Lok Sabha elections 2024

इसके पीछे का क्या मनोविज्ञान है? हिंदुओं में बतौर अवतार अपने को पैठाना। मतदाताओं के दिमाग में किसी दूसरे नेता का विचार नहीं बनने देना। लोगों की आस्था को वैसे ही स्थायी बनाना जैसे एक औसत हिंदू हर दिन भगवानजी के दर्शन कर दिल-दिमाग में भरोसा, विश्वास रखता है। कुछ हो न हो पर विश्वास। हर दिन नए शृंगार, नई झांकी, नई आरती, नए ढोल-नगाड़े और भक्ति-पूजा का यह वह प्रोसेस है, जिससे अपने आप चुनाव जीतने को रोडमैप बनता जाता है!

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तब नरेंद्र मोदी इतने कैसे घबराए, जो कृषि कानूनों को वापिस लेने का फैसला लिया? कैसे महंगाई की चिंता ऐसी हुई जो सुरक्षा मकसद से तैयार पेट्रोलियम रिजर्व से पेट्रोल निकाल कर डीजल-पेट्रोल को सस्ता बनाने का फैसला हुआ? क्यों कर योगी आदित्यनाथ के कंधों पर हाथ रख यह दर्शाने की जरूरत हुई कि योगी मजबूरी हैं? हां, मामूली बात नहीं है जो जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के सरकारी प्रोग्राम में नरेंद्र मोदी ने जहां विकास की बात कही वहीं योगी आदित्यनाथ ने बेफिक्री से जिन्ना की बात करके हिंदू-मुस्लिम राजनीति की। सो, मोदी ने पश्चिम यूपी के प्रोग्राम में भी अमित शाह को साथ नहीं रखा, बल्कि योगी का हिंदू-मुस्लिम हुंकारा लगने दिया। इसलिए यह मानना गलत नहीं होगा कि अच्छे दिन, विकास, छप्पन इंची छाती और लोगों में पैसा-राशन-खैरात बांटने से यूपी चुनाव और फिर सन् 2024 के लोकसभा चुनाव में बात नहीं बनेगी, यह सोचते हुए नरेंद्र मोदी ने भगवावस्त्रधारी योगी को सारथी बना कर हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण का लंबा और गहरा रोडमैप सोचा है।

रत्ती भर संदेह नहीं रखें कि नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हर हाल में जीतेंगे। इसलिए कि सन् 2024 का लोकसभा चुनाव यूपी के रास्ते ही जीता जा सकता है। नरेंद्र मोदी को शायद समझ आया है कि सन् 2024 में वापिस पुलवामा टाइप जैसा वाकिया पहले की तरह हिट नहीं होगा। काठ की हांडी दुबारा नहीं चढ़ेगी। सो, लोकसभा की 543 सीटों में अब पश्चिम बंगाल (42), तमिलनाडु (39), आंध्र प्रदेश (25), तेलंगाना (17), केरल (20), ओड़िशा (21), पंजाब (13), महाराष्ट्र (48) याकि कोई 225 सीटों में भाजपा को सन् 2024 में तीस सीटें जीतने के भी लाले पड़ेंगे। इसलिए उत्तर प्रदेश (80), बिहार (40), झारखंड (14) मध्य प्रदेश (29), गुजरात (25), छतीसगढ़ (11), राजस्थान (25) उत्तराखंड (5) हरियाणा (10) की कोई 239 में 2019 की तरह लगभग शत-प्रतिशत जीत की जमीन बनाए रखनी है। जबकि ध्यान रहे इनमें से 175 सीटों वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ में लोकसभा से पहले विधानसभा चुनाव हैं।

सोचें नरेंद्र मोदी के लिए कितना भयावह सिनेरियो होगा यदि लोकसभा की 175 सीटों वाले राज्यों में अगले दो साल में यदि पार्टी की छप्पर फाड़ जीत नहीं हुई तो! हां, भाजपा को उत्तर प्रदेश जीतना ही नहीं है, बल्कि छप्पर फाड़ याकि तीन सौ सीटें चाहिए ताकि वह लोकसभा चुनाव में मरे हुए विपक्ष के आगे दबंगी से लड़ सके। कल्पना करें कि 175 सीटों वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जैसे-तैसे जीत कर सरकार बना भी ली और 45 प्रतिशत सीटें भी विपक्ष की हुईं तब भी भाजपा के लिए सन् 2024 का लोकसभा चुनाव कितना भारी होगा।

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हां, नोट रखें पश्चिम बंगाल में भाजपा को आगे लोकसभा की 19 सीटें नहीं मिल सकती हैं तो महाराष्ट्र सहित 225 सीटों के गैर-हिंदी ब्लॉक में भाजपा 2019 वाला परफॉरमेंस कतई नहीं कर सकती। ऐसे ही हिंदी राज्यों में भी विपक्ष की सीटें दस-बीस प्रतिशत भी (2019 की मोदी आंधी की तुलना में) बढ़ती हैं तो भाजपा को लाले पड़ेंगे।

तभी नरेंद्र मोदी ने किसान कानूनों की वापसी का अभूतपूर्व, अकल्पनीय फैसला लिया। सोचें जिस आंदोलन को शासकीय ताकत (याद करें टूलकिट के झूठ में समर्थक नौजवानों को जेल में डालने), राजनीतिक ऐंठ, खालिस्तानी प्रचार जैसे तमाम हथकंडों से खत्म करने की कोशिश हुई उसके आगे प्रधानमंत्री मोदी का झुकना क्या बतलाता है? सो, नरेंद्र मोदी अब चौबीसों घंटे 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके पहले के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में खप गए हैं। कांग्रेस, सपा जैसी पार्टियों और अशोक गहलोत, भूपेश बघेल जैसे मुख्यमंत्रियों को या कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को अनुमान ही नहीं है कि इनके लिए नरेंद्र मोदी आगे का चुनाव कितना मुश्किल भरा बना देने वाले हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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