राजनीति में चौपट हुई पुलिस

हाल में दिल्ली पुलिस ने हमारे आरडब्लूए (रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) को एक एडवायजरी भेजी। इसमें लोगों को कार चोरों के बारे में सचेत किया गया था। कोई शक नहीं कि आजकल के कार चोर हाईटैक हो चुके हैं, और कार चोरी के लिए जिन तरीकों और तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, उनके बारे में हम-आप सोच भी नहीं सकते। अगर हम यह सोचते हैं कि कार कंपनियां बहुत ही उच्च सुरक्षा वाली कारें बना रही हैं जिन्हें कोई नहीं चुरा सकता तो यह गलत होगा। बल्कि हकीकत ये है कि कार कंपनियों के साथ-साथ चोरों ने भी हर चीज का तोड़ निकाल लिया है और कारें उड़ा ले जा रहे हैं। आजकल बिना चाबी वाली (कीलैस) जो महंगी एसयूवी आ रही हैं, उनके लॉक-सिस्टम को लैपटाप और सस्ते सॉफ्टवेयरों के इस्तेमाल से तोड़ना कोई मुश्किल काम नहीं रह गया है। इसलिए पुलिस अब इन ऑटोमैटिक गाड़ियों में भी गियर-लॉक लगवाने की सलाह दे रही है। पुलिस के इस सुझाव पर मेरी तात्कालिक प्रतिक्रिया ये थी कि- क्या पुलिस ने हाथ झाड़ लिए हैं? क्या हमें यह कहा जा रहा है कि पुलिस और उसके संरक्षण पर अब भरोसा करना छोड़ देना चाहिए? क्या हम घर और बाहर के सारे काम छोड़ कर घर के बाहर कारों की चौकीदारी करने के लिए तैयार हो जाएं?

संदेह नहीं कि हाल के दिनों में दिल्ली अराजकता के गर्त में चली जा रही है। कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। नब्बे के दशक में जो राजधानी विकास के जिस रास्ते पर बढ़नी शुरू हुई थी और 2000 के शुरू तक काफी कुछ विकसित हो चुकी थी, वही राजधानी आज रेप कैपिटल (बलात्कारियों की राजधानी) में तब्दील हो चुकी है, सबसे ज्यादा हिंसक महानगर का तमगा इस पर लग गया है और यहां की अपराध दर दूसरे महानगरों के मुकाबले चौगुनी है।

निसंदेह, देश की राजधानी दिल्ली जीने लायक नहीं रह गया है।सबसे ज्यादा असुरक्षित, अनुपयुक्त और पीड़ादायक महानगर हो गया है दिल्ली। 2017 में वसंत कुंज थाने में तैनात एक पुलिस वाले ने कहा था- क्या करें? सारा समय या तो जेएनयू में तैनात रहने में निकल जाता है, या फिर वीवीआईपी के आने-जाने की सुरक्षा चिंता में।   और जब से निर्भया कांड हुआ, तब से रात में सुनसान सड़कों पर गश्त देने में वक्त निकल जाता है। ऐसे में तो गाड़ियां चोरी होंगी ही या चोरी, लूटपाट, खूनखराबा होगा ही। उस पुलिस वाले के वे शब्द लगातार खरे साबित होते जा रहे हैं और रोजाना चिंता का कारण बन रहे हैं।

मैं रोजाना जेएनयू की तरफ से गुजरती हूं। इसके चारों तरफ बैरिकडों का घेरा रोजाना बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा विश्वविद्यालय जिसके साथ राष्ट्रीय भावना जुड़ी है, क्या उसे सुरक्षा के घेरों में लाकर इस तरह से बंद कर दिया जाना चाहिए? गुस्सा लिए यही सवाल उठता है कि आखिर क्यों हो रहा है ऐसा? जब यहां से कुछ सौ मीटर दूर ग्रांट होटल के पास लुटेरे बंदूक दिखाकर दिनदहाड़े लोगों को लूट रहे हैं, गाड़ियां छीन रहे हैं, तो फिर पुलिस को यहां क्यों लगा रखा है? इतने लंबे रास्ते पर सिर्फ एक जगह ही पुलिस तैनात करने की जरूरत क्यों है जबकि कुछ मीटर दूरी पर ही एक घर के बाहर ही लुटेरे एक परिवार को लूट रहे हैं (याद करें जब पिछले साल ये वीडियो वायरल हुआ था) ?

वीवीआईपी काफिलों की सेवा के चक्कर में छोटे-मोटे अपराधों जैसे पर्स, मोबाइल छीन कर भाग जाने की तो शिकायत ही सुनने वाला कोई नहीं है। अगर पुलिस वीवीआईपी की सेवा में तैनात है और कुछ मीटर दूरी पर ये अपराध हो जाते हैं तो पुलिस कुछ नहीं करती। ये अब सब समान्य हो चुका है। साफ है, पिछले कुछ सालों में राजधानी के संरक्षक अपनी हैसियत, अपना ताकत खो चुके हैं, अपने काम और सम्मान को भूल चुके हैं। वे कमजोर और असहाय हो गए हैं, औपचारिक शिकायत, एफआईआर तक मुश्किल से दर्ज हो पाती है। कुल मिलाकर, पुलिस जो हमें संरक्षण देने, हमारी सुरक्षा के लिए बनाई गई है, वह खुद अपनी ही सुरक्षा के लिए भी लड़ रही है।

याद कीजिए कुछ ही समय पहले दिल्ली में पुलिस और वकीलों के बीच हुए संघर्ष को। हफ्ते भर से ज्यादा तक पुलिस वाले दिल्ली की सड़कों और पुलिस मुख्यालय के सामने अपनी सुरक्षा के लिए प्रदर्शन और आंदोलन करते रहे थे, जो उनकी हताशा का सबसे बड़ा उदाहरण था। आखिर क्या नतीजा निकला उनके इस आंदोलन का? जब आपकी कार चोरी हो जाती है, पर्स छीन लिया जाता है, या कोई हत्या हो जाती है, या आपको चाकू मार दिया जाता है, तो तब भी यही नतीजा निकलता है।  तो ये है हमारी दिल्ली पुलिस, जो इस महानगर के लोगों की सुरक्षा हमारी सुरक्षा के अलावा सारे काम कर रही है।

इस वक्त दिल्ली पुलिस में कोई 83762 जवान और अधिकारी हैं। दिल्ली में जिस तेजी से आबादी और अपराध बढ़ रहे हैं, उसके हिसाब से पुलिस बल की यह क्षमता बहुत कम है। 2018 के मध्य में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि साल 2028 तक दिल्ली दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर बन जाएगा, तब इसकी आबादी पौने चार करोड़ के करीब होगी। और तब सवाल खड़ा होगा कि इतनी आबादी की सुरक्षा के लिए जितनी पुलिस चाहिए होगी, वह कहां से आएगी? इस वक्त आबादी के अनुपात में जितना पुलिस बल है, वह नाकाफी है और आने वाले दिनों में इससे काम कतई नहीं चलने वाला। सवाल है कि कितने लोग हैं जो पुलिस में भर्ती होना चाहेंगे?

भारतीय पुलिस अधिनियम के तहत पुलिस को चौबीसों घंटे ड्यूटी देनी होती है, और फिर जितनी कम तनखाह पुलिस को मिल रही है, उसमें कौन नौजवान इसमें नौकरी करना चाहेगा? और अगर आप पुलिस में चले भी गए तो फिर जिस तरह के हालात में आज पुलिस को काम करना पड़ रहा है, जिस तरह से पुलिस को सरकार की कठपुतली बनाकर छोड़ दिया गया है, वह सबसे ज्यादा चिंतादायी है।

मेरा मानना है कि पुलिस आज दुर्दशा की शिकार है, उसकी अपनी ही ताकत नहीं रह गई है। लेकिन मेरे आसपास कुछ ऐसे भी हैं जो इससे सहमत नहीं हैं। दरअसल हमारी पुलिस ने समाज के साथ खभी अच्छा तालमेल बनाया ही नहीं। वह हमेशा अपनी दादागीरी के लिए मशहूर रही। प्राचीन काल से ही पुलिस की वर्दी का इस्तेमाल जनता को उत्पीड़ित करने के लिए होता रहा है। सत्ता हमेशा लोगों पर शिकंजा कसने, जनता का दमन करने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करती है, इसी आड़ में पुलिस लोगों को फंसाती है और वसूली जैसे काम करती है। वह, इसी के लिए पुलिस जानी जाती है। हम सिर्फ बुरे से बदतर की ओर ही जा सकते हैं। आज शोषक अपराधियों में तब्दील हो गए हैं। जिस तरह से पुलिस ने जामिया में छात्रों का दमन किया और दूसरी ओर जेएनयू में वह चुपचाप सब देखती रही, उससे आमजन के मन में पुलिस की साख बुरी तरह तरह बिगड़ी है। महानगर की घिनौनी राजनीति ने पुलिस का भी पूरी तरह से राजनीतिकरण कर डाला। साफ हो गया है कि सरकार को पुलिस की कोई फिक्र नहीं है। पुलिस जिस भारी दबाव में काम कर रही है, उसका बोझ अंतत जनता पर ही फूट रहा है। सीए-एनआरसी जैसे आंदोलन के दौरान ज्यादातर पुलिसवालों को अपने तय घंटों से कहीं ज्यादा काम करना पड़ रहा है। पुलिस की गिरती छवि, घटती ताकत और समाज के हर कोने से उसके प्रति पनपते घोर अविश्वास ने पुलिस तंत्र को एक तरह से खोखला बना कर  रख दिया है।

यदि आप सुबह उठें और पता लगे कि कार चोरी हो गई है तो आप पुलिस को ही सबसे पहले 100 नंबर पर कॉल करेंगे, इस उम्मीद में कि वह आपकी बात सुनेगी। सबसे ज्यादा संभावना तो इस बात की होगी कि वह अपने किसी राजनीतिक काम में, वीवीआईपी के काम में लगी हुई होगी। इसलिए बेहतर होगा कि आप 100 नंबर के बजाय सबसे पहले इंश्योरेंस कंपनी को डायल करें। जब हमारी गाड़ी चोरी हो गई थी तब एक बड़े और सम्मानीय राजनेता ने अपनी लाचारी जाहिर करते हुए पूछा था-  ‘इंश्योरेंस तो था ना गाड़ी का।’

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