भाजपा के खेल में कैसे जीतेगी कांग्रेस?

भारतीय जनता पार्टी ने देश के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह से बदल दिया है। भाजपा ने अपने राजनीतिक एजेंडे के हिसाब से इसे बदला है पर हैरानी की बात है कि देश की सारी पार्टियां इसी विमर्श में ढलने लगी हैं। वे वहीं राजनीति करने लगी हैं, जो भाजपा करती है या चाहती है कि बाकी पार्टियां भी ऐसा ही करें। यह बहुत अद्भुत बात है, जो कहीं और देखने को नहीं मिलेगी। दुनिया के ज्यादातर देशों में उदार, लोकतांत्रिक और सेकुलर राजनीति करने वाली पार्टियां हैं और उनके बरक्स कट्टरपंथी राजनीतिक सोच वाली पार्टियां भी मौजूद हैं परंतु विचारों और सिद्धांतों की ऐसी ओवरलैपिंग उनके यहां देखने को नहीं मिलती है।

अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक सोच कई मामलों में अलग है। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश की राजनीति को नस्ल और राष्ट्रीयता के आधार पर विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीयता के आधार पर विभाजन बढ़ाने के लिए अमेरिकी वीजा को हथियार बनाया है तो अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की एक पुलिसकर्मी के हाथों हुई हत्या के बाद नस्ल का मुद्दा अपने आप केंद्रीय विमर्श का मुद्दा बना है। पर एक बार भी यह देखने को नहीं मिला कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता इस विमर्श को बढ़ाने का काम कर रहे हों। उन्होंने उलटे जोखिम लेकर ट्रंप की इस राजनीति का विरोध किया है। चुनावी साल होने के बावजूद यह नहीं दिखा है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन चुप हो गए हों। उन्होंने ट्रंप की वीजा नीति का भी विरोध किया है तो नस्ली हिंसा के लिए भी उनकी निंदा की है।

इसके उलट भारत में कांग्रेस सहित सारी विपक्षी पार्टियां भाजपा के एजेंडे पर काम करने लगी हैं और हैरानी है कि सब इसे मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं। अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के भूमिपूजन और शिलान्यास से ठीक पहले प्रियंका गांधी ने राम की महिमा बखान करने वाला एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखा तो उसे मास्टरस्ट्रोक कहा गया। मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने मंदिर निर्माण का समर्थन किया और चांदी की ईंटे शिलान्यास के लिए भेजीं तो यह भी मास्टरस्ट्रोक कहलाया। इसी तरह कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों और पार्टी के पदाधिकारियों ने आम लोगों के साथ मिल कर शिलान्यास और भूमिपूजन का जश्न मनाया तो इसे बहुत अच्छी राजनीति माना गया और बहुत से जानकार इस बात पर खुश भी हो गए कि अब कांग्रेस भी भाजपा जैसी राजनीति करने लगी है।

इसी सोच में राहुल गांधी को बरसों से नरेंद्र मोदी का क्लोन बनाने का प्रयास चल रहा है। वे केदारनाथ मंदिर गए तो कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर भी गए लेकिन यह सब कुछ इतना बनावटी और प्रायोजित था कि इससे कांग्रेस को या निजी तौर पर राहुल गांधी को कोई फायदा नहीं हुआ। वे खुद उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से चुनाव हार गए और केरल में वायनाड जाकर जीते, जहां ज्यादातर लोगों को कैलाश मानसरोवर के बारे में पता भी नहीं होगा या पता होगा भी तो उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ा होगा कि राहुल वहां गए थे।

अगर कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को नरेंद्र मोदी के एंटीडॉट के तौर पर पेश कर रही है तो वह नरेंद्र मोदी जैसी राजनीति करके कैसे संभव होगा? उसके लिए तो कांग्रेस और इन दोनों नेताओं को एक सामानांतर राजनीतिक सिद्धांत तय करना होगा, एक एंटी थीसिस तैयार करनी होगी, उन मूल्यों को अपनाना होगा, जो भाजपा की राजनीति को चुनौती देने वाले हों और साथ ही लोगों को अपील करने वाले भी हों। पर लगता है कि कांग्रेस के सिद्धांतकारों ने इस सतही ज्ञान कि ‘लोहा लोहे को काटता है’ को अपना मूल राजनीतिक सिद्धांत बना लिया है। इसलिए वे वहीं राजनीति करने की सलाह दे रहे हैं, जो भाजपा कर रही है।

ऐसा नहीं है कि यह सिद्धांत हर जगह विफल है। कई जगह इस सिद्धांत को सफलता भी मिली है। पिछले साल तुर्की के सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में मेयर के चुनाव में राष्ट्रपति एर्दोआन और उनकी कट्टरपंथी राजनीति को बड़ा झटका लगा था। उनके उम्मीदवार बिनाली इल्दीरिम को एकरेम इमामोगलु ने नौ फीसदी वोट के अंतर से हरा दिया था। इस चुनाव में एकरेम ने एर्दोआन की कट्टरपंथी राजनीति के ही दांव आजमाए थे, जिसे दुनिया के मशहूर राजनीतिक विश्लेषक थॉमस एल फ्रीडमैन ने ‘अतिवादी प्रेम’ का नाम दिया। एकरेम ने उन लोगों पर ज्यादा फोकस किया था, जो एर्दोआन की कट्टरपंथी राजनीति से ज्यादा प्रभावित थे। उन्होंने उन्हीं लोगों के बीच प्रचार किया और उन्हें इसका फायदा भी मिला। पर भारत में कम से कम फिलहाल कट्टरपंथी हिंदुओं के साथ ‘अतिवादी प्रेम’ की यह राजनीति सफल होने की संभावना कम दिख रही है। क्योंकि इस राजनीति के सबसे माहिर खिलाड़ी अभी भाजपा के पास हैं।

जिस राजनीति में भाजपा माहिर है उस राजनीति में कांग्रेस उसे किसी कीमत पर नहीं हरा सकती है। जैसे जिस राजनीति में इस देश की क्षेत्रीय पार्टियां माहिर हैं उस राजनीति में उनको न कांग्रेस हरा सकती है और न भाजपा। भाजपा इसी गलतफहमी में बिहार में मारी गई थी। नीतीश कुमार के अलग होने के बाद भाजपा ने बिहार में जाति की राजनीति में हाथ आजमाया था। यादव वोट की उम्मीद में सबसे ज्यादा यादव उम्मीदवार उतारे थे। वैश्य, कुशवाहा, यादव, अतिपिछड़ा, दलित, मल्लाह का समीकरण बनाया था। पर इस खेल के माहिर खिलाड़ियों- लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने भाजपा को बुरी तरह से हरा दिया। वहीं उत्तर प्रदेश में भाजपा जाति के खेल में नहीं पड़ी और कट्टरपंथी हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन पर रही तो भारी बहुमत से जीती। उत्तर भारत के जिन राज्यों में जाति की राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं या दक्षिणी व पूर्वी राज्यों में जहां अस्मिता की राजनीति के माहिर खिलाड़ी है वहां कोई भी पार्टी उनके राजनीतिक दांव से उन्हें नहीं हरा सकती है।

सो, कांग्रेस को दो बातें गांठ बांधनी होंगी। पहली बात तो यह कि वह धर्म और सांप्रदायिकता की राजनीति में भाजपा को नहीं हरा सकती है। इस राजनीति में भाजपा पहले भी माहिर थे और अब तो उसके पास इस राजनीति के चैंपियन खिलाड़ी हैं। जब इस खेल के असली खिलाड़ी मैदान में हैं तो नकली या क्लोन को लोग पसंद नहीं करेंगे। दूसरी बात यह है कि कांग्रेस को अपनी ताकत पहचाननी होगी। उसकी ताकत जाति और धर्म की राजनीति में नहीं है। उसने जाति की राजनीति करने वाली पार्टियों का साथ देकर ही तो अपना वोट आधार गंवाया है और अब धर्म की राजनीति में कूद पर बचा-खुचा आधार भी खोने का खतरा मोल ले रही है। उसे आजादी की लड़ाई के मूल्यों पर आधारित नए सिद्धांत गढ़ने चाहिए। उसे समावेशी, धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतांत्रिक मूल्यों की ही राजनीति करनी चाहिए। इन तीन मूल्यों पर वह मौजूदा समय की समस्याओं को पहचान कर उनका समाधान पेश कर सकती है। उसे एक पार्टी के तौर पर वैकल्पिक विचार बनना होगा और ऐसा कैसे होगा, यह पार्टी के सिद्धांतकारों को सोचना चाहिए। यह ध्यान रहे कि भाजपा की बनाई राजनीतिक लहर में बह कर कांग्रेस कहीं नहीं पहुंचने वाली है।

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