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विपक्ष बनवा रहा है एकक्षत्रपता

क्या कोई सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में विपक्ष को खत्म कर सकती है? यह एक बेहूदासवाल है। थोड़े समय पहले तक इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। लेकिन अब न सिर्फ इस बारे में सोचा और पूछा जा रहा है, बल्कि यह सुदूर ही सही लेकिन संभावना दिख रही है कि भारत में विपक्ष खत्म हो जाए या इतना कमजोर हो जाए कि उसके होने न होने का कोई मतलब न हो। अभी भारतीय जनता पार्टी जिस पैटर्न पर राजनीति कर रही है अगर वह जारी रहता है तो संभव है कि सिर्फ वहीं पार्टियां बचें, जो सरकार के साथ हैं और बाकी पार्टियां दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फ्रिंज एलीमेंट बन जाएं। इस तरह विपक्ष रहेगा भी लेकिन प्रभावी रूप से देश में एकदलीय व्यवस्था लागू हो जाएगी। वैसे अगर पीछे जाकर देखें तो आजादी के बाद बहुत बरसों तक, जिस अवधि के बारे में कहा जाता है कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा था, उस समय भी देश में एकदलीय व्यवस्था ही थी। एक राज्य केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी तो उसे भी भंग करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। इस स्थिति में बदलाव 1967 के बाद यानी आजादी के 20 साल बाद आना शुरू हुआ।

बहरहाल, आजादी के ठीक बाद और अगले 20 साल तक कांग्रेस जिस स्थिति में रही उस स्थिति में भाजपा को लाने की राजनीति हो रही है। पिछले 10 साल में कमोबेश यह स्थिति देखने को मिली है। कुछ राज्यों में जरूर विपक्षी पार्टियों ने भाजपा को हराया या भाजपा की स्थिति कमजोर है लेकिन देश के स्तर पर भाजपा ने अपने को विकल्पहीन बना लिया है। जिस तरह से कभी गैर कांग्रेसवाद की राजनीति के तहत विपक्षी पार्टियां एकजुट होती थीं वैसे ही पार्टियां गैर-भाजपावाद के तहत एकजुट हो रही हैं लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हो रहा है। क्योंकि सरकार में आने के बाद सरकार की ताकत और भाजपा व संघ के संगठन के इस्तेमाल से विपक्ष इतना कमजोर हो गया कि वह मुकाबला करता नहीं दिख रहा है। विपक्ष को कमजोर बनाने के लिए भाजपा और केंद्र सरकार ने विपक्षी पार्टियों का ही इस्तेमाल किया है।

आगे भी विपक्षी पार्टियों के इस्तेमाल से ही विपक्ष को कमजोर किया जाएगा। महाराष्ट्र का प्रयोग इसकी मिसाल है। महाराष्ट्र में भाजपा को पता है कि उसकी जो राजनीति पूंजी है उसमें हिस्सेदारी सिर्फ शिव सेना की हो सकती है। शिव सेना इकलौती पार्टी है, जो भाजपा और आरएसएस ब्रांड के हिंदुत्व से अलग लेकिन प्रभावी रूप से हिंदुत्व की राजनीति करती है। अगर वह कमजोर होती है या खत्म होती है तो एनसीपी और कांग्रेस से कोई खतरा नहीं है क्योंकि वो दोनों पार्टियां एक ही वोट बैंक की राजनीति करती हैं। तभी शिव सेना के अलग होने के बाद से ही शिव सेना को कमजोर या खत्म करने की रणनीति पर काम हो रहा था, जो अब सफल होती हुई है। ठाकरे परिवार के नियंत्रण वाली शिव सेना अब बहुत कमजोर हो गई है। अगर बाला साहेब के शिव सैनिक एकनाथ शिंदे की सरकार दो साल चल जाती है तो वहीं असली शिव सेना होगी, जो एक तरह से भाजपा की प्रॉक्सी होगी। शिव सेना के साथ साथ पूरा विपक्ष वहां हाशिए में जा सकता है।

महाराष्ट्र से ठीक पहले भाजपा ने विपक्ष की मदद से ही विपक्ष को खत्म करने का एक सफल प्रयोग उत्तर प्रदेश में किया था। वहां किन्हीं अज्ञात कारणों से बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती विधानसभा चुनाव में चुप बैठ गईं। उन्होंने उम्मीदवार उतारे लेकिन प्रचार नहीं किया। उन्होंने उम्मीदवार उतारे लेकिन उसका मकसद चुनाव जीतना नहीं, बल्कि भाजपा की जीत सुनिश्चित करना था। बसपा ने सपा के असर वाली सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर उसके वोट काटे। पूरे चुनाव में साफ दिख रहा था कि भाजपा की मर्जी और पसंद से बसपा ने उम्मीदवार चुने। बसपा के उम्मीदवार सामाजिक समीकरणों के लिहाज से ऐसे चुने गए थे, जो भाजपा विरोधी वोट का बंटवारा करने वाले थे। इस वजह से समाजवादी पार्टी के पक्ष में हवा होने के बावजूद भाजपा जीती। हाल में रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा चुनाव में बसपा की वजह से भाजपा जीती। सो, तय मानें कि अगले लोकसभा चुनाव में भी बसपा का यह इस्तेमाल जारी रहेगा।

इससे पहले भाजपा ने यह सफल प्रयोग बिहार में किया था, जहां उसने चिराग पासवान का इस्तेमाल करके अपने सहयोगी जनता दल यू को कमजोर किया। जिस तरह महाराष्ट्र में भाजपा को पता है कि शिव सेना से ही उसको खतरा है उसी तरह बिहार में उसे पता है कि नीतीश कुमार की पार्टी ही असली चुनौती है। सो, नीतीश की पार्टी निपटे तो भाजपा की राह निष्कंटक होगी। यह काम काफी हद तक भाजपा ने कर दिया था। इससे पहले हर चुनाव में नीतीश की पार्टी भाजपा से बड़ी पार्टी होती थी। लेकिन पिछले चुनाव में चिराग पासवान के उम्मीदवारों की वजह से जदयू के 30 से ज्यादा उम्मीदवार हारे और जदयू 43 विधायक की पार्टी रह गई, जबकि भाजपा ने 74 सीटें जीत लीं।

भाजपा के विपक्ष की एक पार्टी असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम है, जिसका एकमात्र इस्तेमाल विपक्ष को कमजोर करने के लिए हो रहा है। ओवैसी हर दिन प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के खिलाफ बयान देते हैं। हर चुनाव में पता नहीं कहां से उनके पास असीमित साधन आ जाता है और वे विपक्ष के असर वाली सीटों पर उम्मीदवार उतारते हैं। वे खुद अपने भाषणों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराते हैं और उनकी पार्टी के उम्मीदवार अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा करके भाजपा विरोधी पार्टियों की हार सुनिश्चित करते हैं। यह खेल कई राज्यों में सफलतापूर्वक खेला जा चुका है। भाजपा अपनी राजनीति के लिए कर्नाटक में ऐसे ही जेडीएस का इस्तेमाल करती है तो तमिलनाडु में अन्ना डीएमके का इस्तेमाल करती है।

एक तरफ भाजपा अपने संसाधनों और केंद्रीय एजेंसियों के दम पर विपक्षी पार्टियों का इस्तेमावल विपक्ष के खिलाफ कर रही है तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां खुद भी आगे के हालात समझे बगैर आपस में एक-दूसरे का नुकसान कर रहे हैं। ममता बनर्जी को भाजपा से ज्यादा दुश्मनी लेफ्ट और कांग्रेस से है तो के चंद्रशेखर राव भी अपना दुश्मन कांग्रेस और एमआईएम को ही मानते हैं। कांग्रेस को कर्नाटक में भाजपा से ज्यादा जेडीएस को निपटाने की चिंता है तो केरल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट आपस में लड़ रहे हैं। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के लिए भाजपा के मुकाबले आपस में लड़ना ज्यादा जरूरी लग रहा है। सो, कुछ जगह भाजपा निपटा रही है और बाकी जगह विपक्षी पार्टियां खुद ही लड़ कर भाजपा की राह आसान कर रही हैं।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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