राज्यों में नए नेतृत्व के लिए जगह

यह विज्ञान का नियम है कि कोई भी जगह खाली नहीं रहती है। राजनीति में भी यह ऐसे ही लागू होता है। नेतृत्व की जगह कभी खाली नहीं होती है। उसकी जगह लेने के लिए अच्छा या बुरा नेता आ ही जाता है। इसे नेतृत्व का सहज पीढ़ीगत परिवर्तन भी कह सकते हैं। और यह भी कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति हमेशा नए नेतृत्व के उभरने की संभावनाओं से भरी होती है, बात सिर्फ समय की होती है। इस समय ऐसा लग रहा है कि अलग अलग राज्यों की राजनीति ऐसे ही संभावनाओं के दौर में है। राज्यों में नेतृत्व की जगह खाली हो रही है और लोग नए नेतृत्व के इंतजार में हैं।
जैसे दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने लोगों का इंतजार खत्म किया। 1993 में दिल्ली विधानसभा का पहला चुनाव हुआ था। उसके ठीक दो दशक बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों की पहली पीढ़ी नेपथ्य की ओर बढ़ी और उसी समय अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व उभरा। आज वे राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति की एक धुरी हैं। ऐसे ही आंध्र प्रदेश में हुआ। वहां भाजपा नहीं है और राज्य के बंटवारे के साथ ही कांग्रेस हाशिए में चली गई थी। तभी तेलुगू देशम पार्टी की वंशवादी राजनीति के बरक्स दूसरे वंश के जगन मोहन रेड्डी का उदय हुआ।

ऐसी संभावना लगभग हर राज्य में है। उत्तर प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व आगे कर दिया है। इसलिए उनके राजनीतिक स्पेस में किसी और के प्रवेश की संभावना नहीं है। पर बसपा का राजनीतिक स्पेस खाली है या खाली होने वाला है। मायावती की कमान में पार्टी अपनी दिशा से भटक रही है और इसलिए दलित सेना के नेता चंद्रशेखर आजाद के लिए स्पेस बन रहा है। अब यह उनके ऊपर निर्भर है कि बसपा के राजनीतिक स्पेस को हासिल करने के लिए वे कैसी राजनीति करते हैं। अगर वे उसके वैचारिक स्पेस को भी भर देते हैं तो राजनीतिक स्पेस अपने आप मिल जाएगा।

दलित और पिछड़ा राजनीति में इस किस्म का स्पेस महाराष्ट्र में भी बन रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रकाश अंबेडकर की बहुजन विकास अघाड़ी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के गठबंधन ने जैसा प्रदर्शन किया था वह काबिलेतारीफ था। यह राज्य की दबंग और राजनीतिक रूप से ताकतवर जातियों के बीच एक वैकल्पिक राजनीतिक विचार के लिए स्पेस बनाने की संभावना बढ़ाने वाला था। पर विधानसभा चुनाव में दोनों का गठबंधन नहीं हो सका। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि संभावना खत्म हो गई है। शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस दोनों जितना हाशिए में जाएंगे वैकल्पिक राजनीति के लिए बना स्पेस उतना ही बढ़ता जाएगा। इसमें ओवैसी की पार्टी पर खासतौर से नजर रखने की जरूरत है। यह पार्टी तेजी से अखिल भारतीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बढ़ा रही है। भाजपा की आक्रामक राजनीति से उसके लिए स्पेस बन रहा है।

हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल से अलग होकर बनी जननायक जनता पार्टी और पूर्व सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी पर नजर रखने की जरूरत है। इस बार के चुनाव के बाद दोनों पार्टियां अगर अपने एजेंडे पर काम करती रहीं तो उनके लिए जगह बनेगी। बिहार में अभी ऐसा लग रहा है कि नेतृत्व का टोटा नहीं है। लालू प्रसाद ने बेटे को कमान सौंप दी है और दूसरी धुरी नीतीश कुमार की है। पर यह अस्थायी स्थिति है। निकट भविष्य में ही नए नेतृत्व के लिए स्पेस बनेगा। हालांकि अभी ऐसा कोई दिख नहीं रहा है, जिसके बारे में पक्के तौर पर कहा जाए कि यह उस कमी को पूरा करेगा पर पप्पू यादव से लेकर उपेंद्र कुशवाहा तक कई नेता हैं, जिनकी राजनीति पर नजर रखनी चाहिए।

राज्यों में नेतृत्व बनाने के लिए संघर्ष कर रहे नेताओं को हमेशा यह ध्यान रखना होगा कि हर बार नेतृत्व की स्थापना बिग बैंग के अंदाज में नहीं हो सकती है। बहुत पहले आंध्र प्रदेश में एनटीआर, असम में प्रफुल्ल महंत या दिल्ली में अरविंद केजरीवाल इसका अपवाद हैं। कई बार बिहार के नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश के कांशीराम-मायावती, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी आदि की तरह लंबा इंतजार करना पड़ता है। जो जितने लंबे इंतजार और संघर्ष के बाद अपनी जगह बनाएगा वह उतना स्थायी होगा। दूसरी जो अहम बात ध्यान रखने वाली है वह ये है कि सिर्फ पुराने नेतृत्व के खत्म होने का इंतजार करने से नए नेतृत्व का स्पेस नहीं बनेगा। अपनी जगह बनाने के लिए एक वैकल्पिक विचार और जमीनी संघर्ष की भी जरूरत होगी।

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