राजनीति में उफान, लाचार मोदी! क्यों लाचार नजर आ रहे हैं नरेन्द्र मोदी
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राजनीति में उफान, लाचार मोदी!

narendra modi in politics

वक्त बदल रहा है। बंगाल में भाजपाई तृणमूल कांग्रेस में जाते हुए हैं तो त्रिपुरा की भाजपा सरकार पर खतरे के बादल हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के खिलाफ भाजपाई विधायकों में ऐसा माहौल बना है कि पार्टी को दिल्ली से महासचिव भेज कर रायशुमारी करानी पड़ी। उत्तराखंड में भाजपा के नए मुख्यमंत्री तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे विधायक बनने के लिए कहां से चुनाव लड़ें? छह महीने की अवधि में क्या वे विधायक बन सकेंगे? बिहार में भाजपा अपने सत्तारूढ़ एलायंस में घिरी हुई है तो सहयोगी दलों की भीतरी राजनीति ने अलग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हैरान-परेशान किया हुआ होगा। और उत्तर प्रदेश…एक तरफ अखिलेश यादव की पार्टी की तरफ बसपा विधायकों, छोटी पार्टियों का रेला बनता हुआ तो दूसरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पार्टी के भीतर ही यह दुविधा बनाए बैठे हैं कि करें तो क्या करें?

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narendra modi and yogi adityanath

जाहिर है पूरे देश में अलग-अलग कारणों से राजनीति पुराने अंदाज में लौट रही है। बड़ा प्रमुख कारण पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का घटा ग्राफ है। यों मैं कोरोना काल की हकीकत, मोदी सरकार की असफलताओं में लिखता आ रहा हूं कि अब घटनाओं पर नरेंद्र मोदी का नियंत्रण नहीं है। वे गुलाम मीडिया में भले दिल-प्रतिदिन हेडलाइन-खबरें मैनेजमेंट करते हुए हों लेकिन घटनाओं पर उनका नियंत्रण खत्म है। देश के भले वे मालिक हों लेकिन न देश की आर्थिकी उनकी इच्छा अनुसार चलती हुई है और न विदेश नीति, कोरोना महामारी और राजनीति को वे अपने मनमाफिक घूमा सकने में पहले की तरह समर्थ हैं। तभी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब का छह महीने बाद का चुनाव उनका विकट चुनाव होगा।

सोचें, मई 2014 से लेकर मार्च 2021 तक भाजपा किस दशा में थी? पूरी तरह नरेंद्र मोदी की इच्छा में बंधी हुई। उन्होंने एक बार जिसे मुख्यमंत्री बना दिया तो फिर उसे बदलने का सवाल नहीं। विधायकों, सांसदों की राय, असंतोष का कोई मतलब नहीं। इसलिए कि सबको जिताने वाले अकेले नरेंद्र मोदी। उनके चेहरे से क्योंकि वोट मिलते हैं न कि सांसद और विधायकों के नाम से तो वे विजय रूपानी, त्रिवेंद्र सिंह रावत, योगी आदित्यनाथ, येदियुरप्पा, सोनोवाल किसी को भी मुख्यमंत्री बनाएं उसके खिलाफ विधायकों के असंतोष का मतलब नहीं। उनका जो फैसला वह अंतिम और सरकार, प्रदेश कमान, पार्टी पूरी तरह उन पर निर्भर, उनके नियंत्रण में!

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narendra modi photo

लेकिन मार्च 2021 में अनहोनी हुई। नरेंद्र मोदी ने यह जान कर उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदला कि विधायक नाराज हैं और त्रिवेंद्र सिंह के रहते उत्तराखंड में वापिस चुनाव नहीं जीता जा सकता। सो, तुरत-फुरत उन्हें हटा कर तीरथ सिंह रावत को नया मुख्यमंत्री बनाया गया। जाहिर है वह फैसला मोदी द्वारा पहली बार यह स्वीकारना था कि वे अब पहले की तरह प्रदेशों में अकेले चुनाव नहीं जितवा सकते।

और मई में फिर यह बात पश्चिम बंगाल व केरल में प्रमाणित हुई। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में जो दम लगाया और जैसा हिंदू-मुस्लिम कराया उसके बावजूद भाजपा को सत्ता नहीं मिलना पूरे देश में यह मैसेज बनाने वाला था कि मोदी का अब पहले जैसा करिश्मा नहीं है! इसका संकेत असम में भी मिला। मोदी-शाह को मानना पड़ा कि वहा जीत हिमंता सरमा से है इसलिए उनका दबाव चला और उनको मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।

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narendra modi and amit shah

तभी आश्चर्य नहीं कि चिंता में तुरंत बाद मोदी ने दिल्ली की अपनी सत्ता की चाबी याकि उत्तर प्रदेश पर ध्यान दिया। कोई माने या न माने बंगाल के नतीजों के बाद से अब तक प्रधानमंत्री मोदी का सर्वाधिक सियासी फोकस उत्तर प्रदेश रहा होगा। मतलब योगी आदित्यनाथ! जैसा मैने पिछले सप्ताह लिखा कि हिंदू-मुस्लिम राजनीति के प्रामाणिक नंबर एक नेता योगी आदित्यनाथ हैं न कि मोदी-शाह तो इसलिए योगी को न हटाया जा सकता है और न अब पहले की तरह बांधे रखा सकता है। पर योगी से विधायक, सांसद, ब्राह्मण, ओबीसी वोटों का जो झमेला है वह ऐसी रियलिटी है, जिससे छह महीने बाद के विधानसभा चुनाव में गुलगपाड़ा संभव है। आखिर मोदी का खुद का चेहरा अब पहले जैसा वोट दिलाऊ नहीं और ऊपर से भाजपा के विधायक बिना जोश, बिना पावर के तो चुनावी हवा कैसे बनेगी? तभी उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में आज जैसा डेडलॉक बना है उसकी कल्पना छह महीने पहले नहीं थी। समय खराब है, घटनाओं पर नियंत्रण नहीं है तो नरेंद्र मोदी जितनी कोशिश कर रहे हैं उससे उलटा मैसेज बन रहा है और उससे विधायकों-प्रदेश नेताओं की हिम्मत ऐसे खुल रही है कि लगभग हर प्रदेश में भाजपा धीरे-धीरे झगड़ों, खींचतान, बिखराव की और बढ़ते हुए है।

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narendra modi and amit shah reading book

संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी हालातों को समझ कर सब कुछ खुद अकेले संभाल रहे हैं। अमित शाह का पहले वाला रोल खत्म है। मोदी अपने साथ पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को बैठा कर संगठन और संघ में मैसेज दे रहे है कि अब संगठन सर्वोपरि है। वे महासचिवों, संघ पदाधिकारियों, और विधायकों-सांसदों को विश्वास में ले कर काम कर रहे हैं। संघ-यूपी के पदाधिकारियों, विधायकों-सांसदों की सलाह से यूपी कैबिनेट और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हैंडल किया जा रहा है ताकि योगी अलग-थलग, अकेले पड़ें। अपना मानना है कि आगे लगातार, तीन साल नरेंद्र मोदी को प्रदेशों में भाजपा की भीतरी दशा और नीचे खिसकती जमीन की चिंता करते रहना होगा। तभी राजनीति का उफान सन् 2024 तक उफनता रहेगा।

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