योगी और ब्राह्मण नाराजगी

Must Read

नई परिस्थितियों में बीजेपी और संघ के लिए सामाजिक समीकरण साधना मुश्किल हो रहे हैं। योगी का अपने आप में एक ब्रांड बन जाना संघ परिवार के लिए न उगलते न निगलते वाली स्थिति बन गया है। … यहां समर्थ जातियों की प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वद्विता से निपटने में भाजपा को पसीने आ रहे हैं।

यह भी पढ़ें: परिवार है तो कांग्रेस की आत्मा है!

भारतीय राजनीति से आप जाति को नहीं हटा सकते। जब तक कि जाति ही खत्म न हो जाए। जाति मतलब समर्थ- असमर्थ जातियों का प्रबल राजनीतिक जाति बोध। भाजपा या संघ ने पिछड़ी जाति के नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया कहीं कोई विरोध या समस्या नहीं हुई क्योंकि मोदी पिछड़ों में भी कमजोर जाति से आते थे।

इसी तरह नंबर दो अमित शाह को बनाया। उसमें भी कोई समस्या नहीं आई। क्योंकि शाह एक छोटे समुदाय जैन समाज से थे। शिवराज सिंह चौहान 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, चौथी बार भी बनने में सफल हो गए। अब थोड़ी बहुत समस्या आई है, मगर वह भी उनके स्वयं के कारण नहीं बल्कि उनके पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की वजह से।

क्या हुआ उत्तर प्रदेश में? उत्तर प्रदेश में भाजपा और संघ का नया प्रयोग बड़े खतरनाक मोड़ पर फंस गया है। भाजपा के जातीय समीकरण न केवल बुरी तरह हिल गए बल्कि पहली बार देश भर का ब्राह्मण भाजपा से नाराज दिख रहा है। इसी ब्राह्मण नाराजगी को कम करने के लिए मध्यप्रदेश में ब्राह्मण मुख्यमंत्री की बात हो रही है। मध्यप्रदेश में पिछले तीन दशक से कोई ब्राहम्ण मुख्यमंत्री नहीं हुआ। वहां 1956 में राज्य के गठन के साथ ही पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल बने थे। और आखिरी ब्राह्मण मुख्यमंत्री 31 साल पहले उनके बेटे श्यामाचरण शुक्ल रहे थे। उसके बाद के आधे से ज्यादा समय भाजपा को मौका मिला। उसने तीन मुख्यमंत्री उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान बनाए। मगर तीनों ओबीसी। मध्य प्रदेश भाजपा में यह सवाल चल तो बहुत समय से रहा था मगर उत्तर प्रदेश की ताजा हलचल ने उसे सतह पर ला दिया।

यह भी पढ़ें: राहुल को कमान संभालनी होगी!

यूपी में चुनाव सिर पर हैं। वही यूपी जिसने 2014 में 80 में से 73 सीटें जीतकर केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया था। उस यूपी में आज भाजपा विचलित है। लोग कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में ठीक से काम न कर पाने के कारण यूपी के मुख्यमंत्री योगी निशाने पर हैं। मगर ठीक से काम तो राष्ट्रीय स्तर पर नहीं हुआ था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी तो निशाने पर नहीं आए! भाजपा के बाकी मुख्यमंत्री भी नहीं आए। फिर योगी ही क्यों? कहते हैं गंगा में लाशें बहने के कारण। अब गंगा का बड़ा हिस्सा यूपी में है तो इसमें कोई क्या कर सकता है?

यह भी पढ़ें: मोदी राज का ‘प्रलय प्रवाह’ और मीडिया

दरअसल ये सब बहाने हैं। यूपी में समस्या कुछ और है। समस्या है पिछले चार साल में राज्य के प्रबल जातीय समीकरण में हुआ बड़ा फेरबदल। आदित्यनाथ योगी देश के सबसे बडी गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर, मंहत हैं। ठाकुरों के लिए गोरखनाथ मंदिर श्रद्धा का सबसे बड़ा केन्द्र है। सामान्य लोग ही नही, राजनीति से जुड़े और बड़े साहित्यकार भी यहां जाकर पीठाधीश्वर मंहत आदित्यनाथ योगी के हाथों सम्मानित होते रहे हैं। इनमें

सबसे प्रमुख नाम हिन्दी लेखक उदय प्रकाश का माना जाता है। उदय प्रकाश पिछले दो तीन दशकों में कहानी लेखन में बड़ा नाम है। वे खुद को जनवादी भी कहते हैं। 2009 में जब वे गोऱखपुर में योगी जी के हाथों सम्मानित और पुरस्कृत हुए तो साहित्य जगत में इसकी बहुत आलोचना हुई। एक धार्मिक पीठ से सम्मानित होना, ठाकुर होने के कारण, ठाकुर के हाथों सम्मानित होना, सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों पुरस्कार लेना जैसे आरोप तो थे ही। इनके अलावा एक बड़ा आरोप था कि उदय प्रकाश का लेखन ब्राह्मण विरोधी है, इसलिए वे पुरस्कृत हुए। उदय प्रकाश की कहानियों में से वे अंश निकालकर लाए गएजिनमें वे ब्राह्मण के खिलाफ दिखते हैं। यह भी कहा गया कि ये ब्राह्मणवाद या मनुवाद के खिलाफ व्यापक विचारों के लेखन का मामला नहीं है बल्कि जाति के तौर पर ब्राह्मण विरोध का मामला है।

यह भी पढ़ें: आखिर कौन बनेगा कांग्रेस अध्यक्ष?

ऐसी पृष्ठभूमि में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में ठाकुरों के ब्राह्मणों पर वर्चस्व की बातें शुरू हो गईं। ठाकुरों का वर्चस्व कोई नई बात नहीं थी, दलितों, अन्य पिछड़ी जातियों पर यह हमेशा से रहा है। मगर उत्तर प्रदेश  में यह पहली बार हुआ कि ब्राह्मणों को अहसास हुआ कि कोई उन्हें किनारे कर रहा है। सरकार, प्रशासन, पुलिस में उनकी सुनवाई नहीं है। सपा और कांग्रेस दोनों ने तो इसे मुद्दा बनाया ही पिछले एक साल में भाजपा के अंदर से भी आवाजें उठने लगीं। खासतौर पर कानपुर के माफिया विकास दुबे के आत्मसमर्पण और एनकाउटंर के बाद। ब्राह्मण सम्मेलन हुए। ब्राह्मणों की ह्त्याओं के आंकड़े जारी हुए और भाजपा एवं संघ के केन्द्रीय नेतृत्व तक मामला पहुंचा।

यह भी पढ़ें: अब सोनिया गांधी को भी नहीं बख्श रहे कांग्रेसी!

अब विधानसभा चुनाव सामने आते ही भाजपा की चिताएं बढ़ गईं है। 2014 की लोकसभा जीत और उसके बाद 2017 की विधानसभा जीत में ब्राह्मणों का बड़ा योगदान था। ब्राह्मण संख्या में चाहे कम हो मगर प्रभाव उसका सबसे ज्यादा है। गांव, शहर हर जगह माहौल बनाने में वह सबसे बड़ी भूमिका अदा करता है। 2007 में

मुलायम सिंह की हार का सबसे बड़ा कारण यही था। मुलायम राज में अमर सिंह बहुत प्रभावी थे। 2004- 05 में वे यूपी में जगह जगह क्षत्रिय सम्मेलन कर रहे थे। कुंडा के राजा भैया भी मुलायम के साथ थे और उनका दबदबा बढ़ गया था।

मायावती ने इसका फायदा उठाया। उन्होंने सतीश मिश्रा को आगे किया। राज्य में जगह जगह ब्राह्मण सम्मेलन किए। 2007 में आश्चर्यजनक परिणाम आए। और मायावती ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल किया। आज उत्तर प्रदेश में हर पार्टी प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं की खोज में है। भाजपा अफसरशाह मगर राजनीति में गहरी समझ रखने वाले अरविंद शर्मा को स्थापित करना चाह रही थी। मगर प्रधानमंत्री मोदी के खास समझे जाने वाले शर्मा को मुख्यमंत्री योगी सरकार में कोई बड़ा पद देने को राजी नहीं बताए जा रहे हैं।

यह भी पढ़ें: भारत की डाक्टरी पर बाबा का डंक

विवाद यहीं से बढ़ा। और फिर से ब्राहम्णों को अपमानित करने का सवाल उठने लगा। साथ ही इसे एक और एंगल दिया गया मोदी बनाम योगी का। कहा गया कि योगी के जन्मदिन पर मोदी और अमितशाह ने इस बार शुभकामनाएं नहीं दीं। इसके जवाब में बताया गया कि भाजपा के प्रदेश सोशल मीडिया के हेडरों से मोदी के फोटो हटा दिए गए।

इन राजनीतिक परिस्थितयों में बीजेपी और संघ के लिए सामाजिक समीकरण साधना मुश्किल हो रहे हैं। योगी का अपने आप में एक ब्रांड बन जाना संघ परिवार के लिए न उगलते न निगलते वाली स्थिति बन गया है। ऐसी ही ब्रांड बनीं तो उमा भारती भी थीं मगर पिछड़ी जाति की होने के कराण भाजपा के लिए उन्हें निपटाना आसान था। यहां समर्थ जातियों की प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वद्विता से निपटने में भाजपा को पसीने आ रहे हैं। कांग्रेस को ब्राह्मण, राजपूतों में सामन्जस्य बनाए रखने का कौशल आता था।

भारतीय राजनीति में जाति एक सच्चाई है। हिन्दु मुसलमान करके उसे खत्म नहीं किया जा सकता। केवल कुछ समय के लिए ही टाला जा सकता है। जैसा कि अभी सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में यह बड़ा मुद्दा बन गई। और मध्य प्रदेश में अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। धार्मिक ध्रुविकरण की अपनी सीमाएं हैं। जातिगत वर्चस्व की राजनीति ने इसे उजागर कर दिया।

भाजपा प्रतीकात्मकता में बड़ा भरोसा करती है। यह पिछड़ों और दलितों में तो चल गया। मगर समर्थ और हमेशा राजनीतिक वर्चस्व रखने वाली जातियों के प्रतिनिधि प्रतीकात्मक रुप से संतुष्ट नहीं होते। उत्तर प्रदेश का ताजा घटनाक्रम भाजपा और संघ के लिए कठिन चुनौती है। साथ ही भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का मूल सवाल भी।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

साभार - ऐसे भी जानें सत्य

Latest News

rajasthan : अजमेर की वर्षा ने पेश की बलिदानी की मिसाल, कैंसर पीड़ितों के चेहरे पर खुशी लाने के लिए दान किए बाल

ajmer: राजस्थान के कण-कण में बसा है बलिदान और साहस। फिर बात अमृता देवी की हो या महाराणा प्रताप...

More Articles Like This