योगी से दिल्ली की चिढ़ क्यों? - Naya India
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योगी से दिल्ली की चिढ़ क्यों?

हां, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की योगी आदित्यनाथ के प्रति अब वह भावना कतई नहीं है, जो सन् 2017 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाते वक्त थी। तब नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों की उनके प्रति भावना वैसी ही थी जैसे विजय रूपानी के प्रति है। मतलब योगी इशारों पर नाचेंगे। अपना कद नहीं बढ़ाएंगे। प्रधानमंत्री बन सकने का ख्याल नहीं बनाएंगे और मोदी जब कहेंगे कि मैं फलां आईएएस की नौकरी छुड़वा (एके शर्मा) उसे विधायक, उसे उप मुख्यमंत्री या गृह मंत्री बना तुम्हारी मदद की सोच रहा हूं तो मेरी सर्वज्ञता में मेरे आदेश की पालना करो। कोई माने या न माने और शायद योगी भी नहीं स्वीकारेंगे कि लगभग चार साल योगी ने मोदी-शाह के साये में वैसे ही राज किया, जैसे विजय रूपानी ने किया। कैबिनेट हो या मुख्यमंत्री सचिवालय, अफसरशाही-प्रोजेक्ट-पैसे हैंडल करने की हर अहम जगह में वहीं हुआ जो मोदी-शाह से निर्देशित था।

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तब गड़बड़ कैसे? जवाब है योगी के भगवा वस्त्र से! मोदी-शाह ने भगवा वस्त्र के राजनीतिक लाभ में योगी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया था। तब कल्पना नहीं थी कि चार सालों में देश की बरबादी के चलते और मोदी-शाह के गुजराती चेहरों के किस्सों से हिंदू अनुयायियों में योगी का कद इतना बढ़ जाएगा कि केरल में प्रचार हो या पश्चिम बंगाल में, योगी आदित्यनाथ ही कम खर्च में ज्यादा हिंदू भीड़ लिए हुए होंगे। और संघ-भाजपा में लोग सोचने लगेंगे कि यदि 2022 में योगी की कमान में यूपी का चुनाव जीत लेते हैं तो सन् 2024 के लोकसभा चुनाव में योगी को तुरूप कार्ड बनाना चाहिए।

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दोष वक्त का है। वक्त ने हिंदुओं में ही मोदी से दस तरह की निराशा, मोहभंग बनवाया है और उनकी जगह योगी आदित्यनाथ में आस्था बनवाई है। ऐसे में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का उनके प्रति भाव क्यों नहीं बदले? यह तथ्य निर्विवाद है कि बतौर सीएम योगी के निजी आचरण पर कोई दाग नहीं है। दिल्ली की लंगूर सोशल मीडिया टीम ने भले योगी की कल्याण सिंह और उमा भारती से तुलना कर बदनाम करना चाहा और चेताया कि योगी का हश्र इन जैसा होगा। पर सब फालतू। इसलिए कि पहली बात योगी प्रामाणिक हिंदू वाहिनी नेता हैं। वे विशाल नाथ संप्रदाय के सबसे बड़े मठ के प्रमुख और देशव्यापी भक्तों के प्रणेता हैं। मेंने 20 मार्च 2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ‘अपन तो कहेंगे’ कॉलम में ‘योगी हैं हिंदू भारत का यर्थाथ!’ में ये वाक्य लिखे थे- ‘विकास हो या न हो, योगी का चेहरा यदि सुरक्षा और हिंदू आस्था की कसौटी में खरा बना रहा तो वह अपने आप में बहुत होगा। न ही योगी को मध्य प्रदेश में उमा भारती के अनुभव की कसौटी में तौलें। इतना जान लें कि हिंदू मठों में गोरखपंथी तासीर उग्र व करो-मरो वाली मानी जाती है।’

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सो, योगी को कल्याण सिंह-उमा भारती की तरह खारिज करना बेतुकी बात है। कल्याण सिंह का मुख्यमंत्रित्व भ्रष्टाचार, कुसुम राय जैसे किस्सों से निजी आचरण के विवाद लिए हुए था तो उमा भारती का मुख्यमंत्रित्व शुरुआत से ही विवादों में था। सबसे बड़ी बात इन दोनों नेताओं का प्रभाव दायरा योगी की तरह अखिल भारतीय हिंदू इमेज वाला नहीं था। यूपी के औसत हिंदू मानस में योगी मुसलमानों से सुरक्षा, दबंगी वाली वह इमेज लिए हुए हैं, जैसी गुजरात दंगों के बावजूद गुजरात में मोदी की भी नहीं थी। योगी मतलब मुसलमान में स्पार्क, करंट और हिंदू में सुरक्षा कवच। तभी ब्राह्मणों की नाराजगी के सत्य के बावजूद विकास दुबे के एनकाउंटर से भी कानून-व्यवस्था में योगी की दबंगी का मौन प्रचार हुआ है।

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इस सबसे योगी की अखिल भारतीय हिंदू रेटिंग जो बनी है उससे अपने आप 2024 या 2029 की प्रधानमंत्री दौड़ में असफल मोदी की जगह योगी तुरूप हैं तो अमित शाह तो खैर पूरी तरह से आउट (हां, पूरे देश में सड़कों पर पानीपत की लड़ाई का गृहयुद्ध बनवा दें तो अलग बात) है। इसलिए ज्योंहि कोरोना की दूसरी लहर और शववाहिनी गंगा का हल्ला हुआ तो मौका नहीं चुका गया। सोचें फैसला प्रधानमंत्री ने लिया कि गुजरात से लगातार साथ रहे अफसर का नौकरी से इस्तीफा करवा कर यूपी में विधायक-मंत्री बनवाना है। फैसला अनहोना था। योगी जब सब कुछ दिल्ली-संघ के कहने से करते हुए लेकिन बावजूद इसके एक अफसर को बतौर उप मुख्यमंत्री या गृह मंत्री बनाने की चर्चाएं योगी के लिए कितनी अपमानजनक थी? शायद वह पहला मौका था जब योगी ने निजी तौर पर समझा होगा कि यह तो उनके कद को घटाने की, अगले चुनाव से हाशिए में डालने का मोदी-शाह का प्लान! सो, अचानक योगी ने नाथ संप्रदाय की अपनी करो-मरो वाली दबंगी में ठाना कि चुनाव से ऐन पहले उनके पांव कतरने के इस दांव में वे अब झुकेंगे नहीं।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दिल्ली में मोदी-शाह से योगी की मुलाकात का निचोड़ जाहिर नहीं है। संभव है योगी झुक गए हों और दो-चार दिन में दिल्ली की लिस्ट अनुसार कैबिनेट में फेरबदल कर डालें लेकिन अपने को लगता नहीं कि नरेंद्र मोदी ने एके शर्मा का जो रोल यूपी में सोचा था वह बने। उतना योगी नहीं झुकेंगे। उन्होंने पिछले तीन महीनों में दिल्ली के इरादों की जो समझ बनाई है उससे वे अब चुनाव तक सतर्क रहेंगे। उन्हें अहसास है कि यूपी में उनका कोई विकल्प नहीं है। वे कतई मोदी-शाह के यूपी में विजय रूपानी नहीं होंगे, बल्कि वे हिंदू राजनीति के राष्ट्रीय विकल्प बनेंगे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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