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स्वास्थ्य पर करो राजनीति, बनाओ मुद्दा

एक दशक से ज्यादा समय तक बीएसपी की राजनीति के बाद नरेंद्र मोदी ने विकास और अच्छे दिन का वादा किया। उन्होंने गुजरात मॉडल पूरे देश में बेचा। लेकिन उसमें भी स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं था। गुजरात की अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है इसकी पोल कोरोना वायरस की महामारी के समय हाई कोर्ट में हुई सुनवाइयों से खुल गई है।

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कोरोना वायरस की महामारी ने पूरी दुनिया के राजनीतिक विमर्श को बदल दिया है। अब दुनिया की राजनीति स्वास्थ्य और चिकित्सा के ईर्द-गिर्द घूम रही हैं। दशकों या सदियों तक मुख्यधारा में उपेक्षित रहा स्वास्थ्य का क्षेत्र ही अब राजनीति का केंद्र है। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में तो फिर भी लोगों का स्वास्थ्य राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है लेकिन विकासशाली और अविकसित देशों में यह कभी भी राजनीतिक विमर्श का केंद्र नहीं रहा। भारत में पिछले तीन दशक में राजनीति जरूर बदली है लेकिन एकाध राज्यों को छोड़ दें तो राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य का मुद्दा चर्चा का केंद्र नहीं रहा है। पार्टियां लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करने के वादे नहीं करती हैं और न स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने का वादा किया जाता है।

तीन दशक पहले भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति शुरू हुई थी। यह सीधे सीधे अस्मिता यानी पहचान की राजनीति से जुड़ी है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में जातिवादी राजनीति कहते हैं। कोई एक दशक तक सामाजिक न्याय की आक्रामक राजनीति के बाद इसमें थोड़ा बदलाव आया तो बीएसपी यानी बिजली, सड़क और पानी को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाने का प्रयास हुआ। एक दशक से ज्यादा समय तक बीएसपी की राजनीति के बाद नरेंद्र मोदी ने विकास और अच्छे दिन का वादा किया। उन्होंने गुजरात मॉडल पूरे देश में बेचा। लेकिन उसमें भी स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं था। गुजरात की अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है इसकी पोल कोरोना वायरस की महामारी के समय हाई कोर्ट में हुई सुनवाइयों से खुल गई है। सो, विकास की नरेंद्र मोदी की अवधारणा में भी स्वास्थ्य प्रमुख नहीं रहा है।

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लेकिन सोचें, कोरोना वायरस की महामारी के बीच पहले बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर बोलने का मौका मिला तो उन्होंने किस बारे में बात की! उन्होंने वन अर्थ, वन हेल्थ की बात की। जी-7 देशों के मंच के शिखर सम्मेलन में अतिथि के तौर पर शामिल हुए प्रधानमंत्री मोदी ने पहले दिन के भाषण में वन अर्थ, वन हेल्थ की बात की और कहा कि दुनिया के देशों को एक साथ मिल कर कोरोना की महामारी का सामना करना होगा। इसी सम्मेलन में अपने दूसरे भाषण में प्रधानमंत्री ने वैक्सीन का मुद्दा उठाया और दुनिया के देशों से वैक्सीन का पेटेंट फ्री करने की मांग की। साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़े कारोबारी पहलुओं यानी ट्रिप्स में छूट देने की भी मांग की ताकि दुनिया के देशों को आसानी से वैक्सीन और कोरोना की दवाएं उपलब्ध हो सकें।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के नेताओं ने भी इस शिखर सम्मेलन में ज्यादा समय स्वास्थ्य के मुद्दे पर ही बात की। सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए ब्रिटेन पहुंचने के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने फाइजर की वैक्सीन की 50 करोड़ डोज खरीद कर दुनिया के गरीब देशों को बांटने का ऐलान किया। सम्मेलन की शुरुआत ही इसी बात से हुई। उसके बाद दुनिया के सात बड़े देशों ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति का मुद्दा उठाया और चीन की भूमिका को लेकर चिंता जताई। जी-7 देशों के नेता ब्रिटेन में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लुएचओ के प्रमुख टेड्रोस एडेनॉम गैब्रिएसस से मिले और उनको वायरस की उत्पत्ति की जांच कराने को कहा। इसके बाद ही उन्होंने पारदर्शी जांच की जरूरत बताई और चीन से सहयोग की अपील की। ब्रिटेन रवाना होने से पहले बाइडेन ने अमेरिका की खुफिया एजेंसियों को इसकी जांच करने और 90 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। जी-7 देशों की बैठक में कुछ और चीजों को लेकर भी चर्चा हुई लेकिन मुख्य रूप से वायरस, वैक्सीन, दवा और लोगों की सेहत के मुद्दे पर विचार किया गया।

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सो, चाहे भारत हो या अमेरिका या दुनिया के दूसरे विकसित-अविकसित देश हों, सबके यहां अब राजनीति का मुख्य मुद्दा लोगों की सेहत, चिकित्सा व्यवस्था, चिकित्सा उपकरण, दवाएं आदि हैं। इसे स्वास्थ्य की राजनीति या चिकित्सा की राजनीति कह सकते हैं। वायरस की महामारी से इस राजनीति की शुरुआत हुई है और इसने विकास की पूरी अवधारणा को बदल दिया है। अब बिजली, सड़क, पानी या खातों में नकद हस्तांतरण और चमकते मॉल्स का निर्माण विकास का पैमाना नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाएं अब विकास का पैमाना हैं। ऑक्सीजन, अस्पताल, वेंटिलेटर, वैक्सीन, मास्क, सेनिटाइजर, दवा आदि अब राजनीति का मुद्दा हैं। याद करें आपने कब ये सारे शब्द राजनीतिक भाषणों में सुने हैं! पहले कभी ये बातें राजनीतिक या चुनावी भाषणों में सुनने को नहीं मिलती थीं। सामाजिक न्याय, विकास, अधिकारों की बातें होती थीं पर चिकित्सा उपकरणों, दवाओं, वैक्सीन आदि के नाम पर वोट मांगते कभी किसी को नहीं सुना गया। लेकिन वायरस ने चुनाव और राजनीति के पूरे विमर्श को बदल दिया।

सामाजिक न्याय और अधिकारों की बजाय अब इंसानी जीवन बचाने का मुद्दा असली राजनीतिक मुद्दा हो गया है। किसने लोगों की जान बचाने के लिए सबसे बेहतर ढंग से काम किया यह नेताओं के आकलन का पैमाना बना है। हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनाव में यह देखने को मिला। केरल को फ्लिप स्टेट माना जाता है। वहां पिछले 50 साल से हर पांच साल पर सत्ता बदलती रही है। लेकिन इस बार यह परंपरा टूट गई। इस बार राज्य के लोगों ने सीपीएम के नेतृत्व वाली सरकार को लगातार दूसरी बार मौका इसलिए दिया क्योंकि सरकार ने और खास कर स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने कोरोना महामारी के खिलाफ शानदार काम किया था। लोगों की जान बचाने का ऐतिहासिक काम उन्होंने किया था। बाकी राज्यों में भी चुनाव नतीजों पर इस मुद्दे का कम या ज्यादा असर रहा। असम में भाजपा लगातार दूसरी बार जीती तो विपक्षी वोट बंटने के साथ साथ बतौर स्वास्थ्य मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा किया गया काम भी एक कारण रहा।

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अगर दुनिया के पैमाने पर बात करें तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की हार इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। ट्रंप ने कोरोना की महामारी को रोकने की बजाय इसे मजाक बना दिया और लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया। उनके उलट जो बाइडेन लगातार समझदारी के साथ कोरोना से लड़ने की बात करते रहे। डेमोक्रेटिक पार्टी की राज्य सरकारों और शहरों के मेयर्स ने ट्रंप से उलट कोरोना की गंभीरता को समझा और उसका मुकाबला किया। डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का यही मुख्य कारण बना। ताइवान से लेकर बोलीविया और अर्जेंटीना तक अनेक देशों में यह देखने को मिला है कि स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने की बात करने वाली या कोरोना से वैज्ञानिक तरीके से निपटने वाली पार्टियों को जीत मिली।

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भारत में अगले साल सात राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं और दिल्ली व मुंबई में नगर निगम के चुनाव हैं, जिनमें चिकित्सा की राजनीति के सिद्धांत की परीक्षा होनी है। निश्चित रूप से पार्टियां और सरकारें अपने आधे-अधूरे प्रयासों का ढिंढोरा पीटेंगी, लोगों को बताया जाएगा कि कैसे कोरोना की लहर को रोकने का काम किया गया, कैसे ऑक्सीजन उपलब्ध कराया गया, दवाओं का बंदोबस्त कैसे हुआ और कैसे दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान शुरू हुआ। अब यह लोगों के विवेक पर है कि वे महामारी के अपने निजी अनुभवों यानी अस्पताल में बेड्स के लिए भागदौड़, ऑक्सीजन के लिए कतार में लगने, दवाओं की कालाबाजारी, तड़प-तड़प कर मरते परिजनों और अंतिम संस्कार के लिए लगी कतारों को याद रखते हुए मतदान करते हैं या पार्टियों के झूठे प्रचार के झांसे में आते हैं। जो हो लेकिन यह तय है कि आगे कुछ बरसों तक राजनीति, स्वास्थ्य और चिकित्सा के मुद्दे पर ही होगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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