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Monday, April 19, 2021
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निदान तो सही है

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राहुल गांधी ने आज के भारत की राजनीतिक समस्या की नब्ज पर हाथ रखा है। उन्होंने जिस समाधान की ओर इशारा किया है, वह भी सही दिशा में है। लेकिन इस ओर जाने की रणनीति क्या होगी, इस बारे में अभी स्पष्टता नहीं है। जबकि इसके बिना ठोस समझ का कोई व्यावहारिक परिणाम नहीं हो सकता। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष गांधी ने कहा कि वर्तमान सरकार भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को नुकसान पहुंचा रही है। भारत में हर संस्था की स्वतंत्रता पर हमला किया जा रहा है। इसके बीच सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया से विपक्ष के लिए राजनीति कर पाना लगभग असंभव हो गया है। अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कौशिक बसु और छात्रों से एक संवाद में राहुल गांधी ने कहा कि 1975 में लगाई गई इमरजेंसी और अभी जो हो रहा है उसमें काफी अंतर है। तब कांग्रेस पार्टी ने संस्थानों पर कब्जा नहीं किया था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का ढांचा ऐसा है कि वह चाहे भी तो यह नहीं कर सकती।

जबकि आज चाहे न्यायालय हो, चाहे चुनाव आयोग हो, या कोई भी स्वतंत्र संस्था- सब जगह पर एक ही विचारधारा के लोगों का कब्जा हो गया है। मीडिया से लेकर न्यायालय तक को निशाना बनाया जा रहा है। राज्यों में राज्यपाल सत्ताधारी भाजपा की मदद कर रहे हैं। इसी बातचीत में राहुल गांधी ने दो टूक कहा कि इमरजेंसी लगाना तत्कालीन कांग्रेस सरकार की गलती थी, जिसे बाद में उनकी दादी यानी इंदिरा गांधी ने स्वीकार भी किया था। उन्होंने कहा कि आज आरएसएस से जुड़े लोगों की संस्थानों में ऐसी पैठ हो गई है कि कि ‘अगर हम भाजपा को चुनाव में हरा भी दें तब भी हम संस्थागत ढांचे में उनके लोगों से छुटकारा नहीं पा सकेंगे।’ गांधी ने कमलनाथ के साथ हुई बातचीत को याद करते हुए कहा कि कमलनाथ ने उन्हें बताया था कि मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते थे, क्योंकि वे आरएसएस के लोग थे। क्या इन बातों में सच्चाई नहीं है? राहुल गांधी ने कहा कि इस स्थिति में कांग्रेस की भूमिका उभर रहे जन संघर्षों के बीच समनव्य बनाने की रह गई है। यानी उनकी सारी उम्मीद किसान आंदोलन जैसे संघर्षों पर टिकी है। बहरहाल, संघर्ष से उम्मीद जोड़ना तो ठीक है, लेकिन एक पार्टी के तौर पर अपने को इस असहाय भूमिका में बताना एक ऐसी स्थिति है, जिससे लोगों के मन में कांग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैँ।

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