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रेवड़ी संस्कृतिः बेतुकी बहस

निर्वाचन आयोग की बात गौरतलब है कि “अतार्किक” और “रेवड़ी” दोनों को परिभाषित करना कठिन है। कोई चुनावी वादा किसी के लिए रेवड़ी हो सकता है, लेकिन वह किसी को जरूरी राजनीतिक मुद्दा भी महसूस हो सकता है।

भारत के निर्वाचन आयोग की तारीफ की जानी चाहिए कि रेवड़ी संस्कृति पर केंद्र सरकार की तरफ छेड़ी गई बहस पर उसने विवेक और संविधान-सम्मत रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट से भी ऐसे ही रुख की अपेक्षा थी, लेकिन उसने स्पष्टतः राजनीतिक मकसद से दायर की गई एक याचिका को आधार बना कर इस चर्चा को एक प्रकार की वैधता प्रदान करने की कोशिश की। बहस खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू की और वे इसे लगातार आगे बढ़ा रहे हैँ। उनके विदेश मंत्री ने तो इस बहस को श्रीलंका के संकट से जोड़ दिया। एस जयशंकर ने कहा कि श्रीलंका के संकट का यही सबक है कि रेवड़ियां नहीं बांटी जानी चाहिए। बुधवार को प्रधानमंत्री ने राजनीतिक दलों की तरफ से मुफ्त सेवाएं देने का वादा करने की संस्कृति को राष्ट्र हित के खिलाफ बताया। प्रधानमंत्री को ऐसी राय रखने का पूरा हक है, जिसे उन्हें राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहिए। उन्हें अपनी पार्टी और उसके नेताओं को प्रेरित करना चाहिए कि वे चुनावों के समय ऐसे कोई वादे ना करें। लेकिन कोई दूसरी पार्टी ऐसा वादा करती है, तो उसे राष्ट्र हित का विरोधी बताना लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध होगा।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव अत्यंत समस्याग्रस्त है कि सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओँ से संबंधित व्यक्तियों को लेकर एक समिति बनाई जानी चाहिए, जो “अतार्किक रेवड़ी” (फ्रीबीज) बांटने के चुनावी वादों पर रोक लगाए। उचित ही निर्वाचन आयोग ने ऐसी किसी समिति का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। उसकी बात गौरतलब है कि अतार्किक और रेवड़ी दोनों को परिभाषित करना कठिन है। कोई चुनावी वादा किसी के लिए रेवड़ी हो सकता है, लेकिन वह किसी को जरूरी राजनीतिक मुद्दा भी महसूस हो सकता है। आयोग के मुताबिक यह भी संभव है कि जिसे सामान्य दिनों में रेवड़ी कहा जाता हो, आपदा काल में वह जीवन रक्षक उपाय साबित हो। तो अपेक्षित यह होगा कि आयोग की बात पर ध्यान दिया जाए और इस बहस पर विराम लगाई जाए। वैसे भी जनता के विवेक पर भरोसा किए बिना कोई लोकतंत्र नहीं चल सकता। तो फिर यह लोगों पर ही क्यों न छोड़ दिया जाए कि वे “रेवड़ियां” चाहते हैं, या नहीं।

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