जनसंख्या नीति राजनीतिक एजेंडा है population policy political agenda
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जनसंख्या नीति राजनीतिक एजेंडा है!

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population policy political agenda : सबसे पहले तो यह डिस्क्लेमर जरूरी है कि मैं जनसंख्या विस्फोट का समर्थन नहीं कर रहा हूं और न देश की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के उपायों का विरोधी हूं। आबादी को नियंत्रित करने के लिए निश्चित रूप से कुछ उपाय किए जाने चाहिए। यह भारत के लिए कई कारणों से बहुत जरूरी है और तभी देश की पहली सरकार ने 1952 में जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाया था। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने जनसंख्या नियंत्रण की जरूरत समझी थी और उसके लिए कानून बनाया था। लेकिन वह कानून बाध्यकारी नहीं था और अनुपालन नहीं करने वालों के लिए किसी सख्त कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया गया था। इमरजेंसी के समय के दो साल को छोड़ दें तो भारत में लोगों को जागरूक बना कर, स्वास्थ्य समस्याओं और संसाधनों के सीमित होने की जानकारी देकर और समझा-बूझा कर ही जनसंख्या रोकने के उपाय किए गए।

देर से ही सही लेकिन ये स्वैच्छिक उपाय काम करने लगे और भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर तेजी से स्थिर होने की तरफ बढ़ने लगी। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर औसत प्रजनन दर 2.2 फीसदी है। किसी भी देश में अगर प्रजनन दर 2.1 फीसदी हो जाती है तो वहां जनसंख्या का बढ़ना बंद हो जाता है। इस 2.1 फीसदी को रिप्लेसमेंट लेवल कहते हैं, जिसे हासिल करने के बाद जनसंख्या वृद्धि रूक जाती है। भारत इस दर के बिल्कुल करीब पहुंच गया है। सोचें, 1992-93 में भारत में प्रजनन दर 3.4 फीसदी थी। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के मुताबिक प्रजनन दर घट कर 2.2 फीसदी हो गई थी। उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर 2.7 फीसदी थी, लेकिन 2015-16 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुमान के मुताबिक 2025 में वहां प्रजनन दर 2.1 फीसदी यानी रिप्लेसमेंट लेवल तक पहुंच जाएगी। इसका मतलब है कि सिर्फ चार साल के बाद उत्तर प्रदेश में आबादी का बढ़ना अपने आप रूक जाना है। चार साल में वहां आबादी स्थिर हो जाएगी, फिर भी 2030 तक के लिए जनसंख्या नीति जारी की गई है!

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population policy political agenda  : तभी सवाल है कि इस समय जनसंख्या नीति लाने की क्या जरूरत है? क्यों दो बच्चों की नीति लाई जा रही है और इसे नहीं मानने वालों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है? असल में ऐसा एक राजनीतिक एजेंडे के तहत किया जा रहा है। दशकों से यह प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान देश की आबादी बढ़ा रहे हैं और अगर ऐसे ही उनकी आबादी बढ़ती रही तो एक दिन अपने ही देश में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। इस सांप्रदायिक नैरेटिव को कई तरह के झूठे-सच्चे आंकड़ों के सहारे स्थापित किया गया है। यह सही है कि आजादी के बाद देश की आबादी में हिंदुओं की संख्या घटी है। 1951 की जनगणना के समय हिंदू आबादी 84 फीसदी थी, जो अभी 79 फीसदी है यानी पांच फीसदी की कमी हुई। दूसरी ओर 1951 में मुस्लिम आबादी 10 फीसदी के करीब थी, जो अब 14 फीसदी है। यानी इसमें चार फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। संख्या के लिहाज से देखें तो हिंदू एक सौ करोड़ और मुस्लिम 18 करोड़ के करीब हैं। अमेरिकी संस्था प्यू रिसर्च के मुताबिक 2050 में हिंदू आबादी 77 फीसदी और मुस्लिम आबादी 18 फीसदी तक पहुंचेगी। इसका मतलब है कि भविष्य में लंबे समय तक देश के पांच लोगों में से एक व्यक्ति हिंदू रहने वाला है।

तभी जनसंख्या वृद्धि का सांप्रदायिक नैरेटिव बुनियादी समस्याओं से ध्यान भटकाने का उपाय है। एक पीआर स्टंट है। इससे एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश है। पहला, सांप्रदायिक एजेंडे को हवा देना ताकि ध्रुवीकरण कराया जाए और दूसरा जरूरी मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना। इस समय उत्तर प्रदेश हो या देश का कोई भी हिस्सा हो, लोगों का ध्यान सांप्रदायिक मुद्दों पर नहीं, बल्कि अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों पर है। (population policy political agenda ) लोगों के रोजगार बंद हुए हैं और करोड़ों लोगों की नौकरियां गई हैं। कोरोना की वजह से करोड़ों परिवार प्रभावित हुए हैं और करोड़ों परिवार घनघोर आर्थिक संकट झेल रहे हैं। उन सबके हाथ में जनसंख्या नियंत्रण का झुनझुना पकड़ाया जा रहा है। उनको बताया जा रहा है कि सारे संकट की जड़ बड़ी आबादी है और अगर इस पर रोक लगा दिया गया तो झटपट विकास होने लगेगा और सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

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असल में यह हर मोर्चे पर विफल सरकारों का आखिरी दांव होता है। याद करें कैसे कोरोना वायरस की महामारी को कंट्रोल करने में विफलता के आरोपों का जवाब बड़ी आबादी के तर्क से दिया गया था! कैसे देश के सरकारी विद्वानों ने टेलीविजन चैनलों पर समझाया था कि यूरोप के देश छोटे-छोटे हैं और भारत एक विशाल आबादी वाला देश है इसलिए कोरोना नियंत्रण के मामले में उनसे भारत की तुलना नहीं की जा सकती है! पिछले कुछ समय से जान बूझकर आबादी को विकास के विमर्श के साथ भी जोड़ा गया है। सरकार के काम में जब भी कोई कमी बताई जाती है तो बड़ी आबादी का तर्क दिया जाता है। लेकिन असलियत यह है कि जब सरकारें लोगों को शिक्षा देने में विफल रहती है, स्वास्थ्य जरूरतें पूरी करने में असफल हो जाती हैं, रोजगार नहीं दे पाती हैं तो इस तरह के बहाने बनाती हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार भी वहीं कर रही है।

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यह समझना मुश्किल नहीं है कि उत्तर प्रदेश की सरकार ऐसा क्यों कर रही है। अगले साल चुनाव होने वाले हैं और उसमें उपलब्धियों की बजाय ध्रुवीकरण कराने वाले भावनात्मक मुद्दों पर ही वोट लेने हैं। इसके अलावा इस नीति की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इस नीति से फायदा कुछ नहीं होना है और नुकसान कई हैं। राज्य सरकार भी इससे अनजान नहीं है। आखिर देश के कई राज्यों में दो बच्चों की नीति लागू की गई है, जिसका कोई फायदा नहीं हुआ है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों में कई साल पहले यह नियम लागू किया गया था कि दो से ज्यादा बच्चे वालों को स्थानीय निकाय चुनाव में नहीं लड़ने दिया जाएगा या दूसरी सुविधाओं से वंचित किया जाएगा। इसके बावजूद इन राज्यों में भी जनसंख्या उसी दर से बढ़ी, जिस दर से उन राज्यों में बढ़ी, जहां ऐसे कानून नहीं थे।

उलटे दो बच्चों की नीति लागू करने और नहीं मानने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई के नियमों का नुकसान बहुत बड़ा है। इससे लैंगिक असमानता बढ़ती है। लिंगानुपात में भारत का राष्ट्रीय औसत बहुत खराब है और कई राज्यों में तो स्थिति बदतर है। अगर दो बच्चों का नियम लागू होता है या एक बच्चा करने वालों को प्रोत्साहित किया जाता है, जैसा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने किया है तो चयनात्मक गर्भपात यानी लिंग परीक्षण करा कर लड़कियों को गर्भ में मारने की घटनाएं बढ़ेंगी। यह जनसंख्या असंतुलन को जन्म देगा। चीन जैसा देश इस समस्या से जूझ रहा है और तभी उसने अपनी सिंगल चाइल्ड पॉलिसी को बदला है। जनसंख्या दर को निगेटिव करना किसी भी सरकार का लक्ष्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे देश के सामने चीन जैसा संकट खड़ा होगा। चीन में बड़ी आबादी बूढ़ी हो रही है, युवाओं की आबादी घट रही है और कामकाजी लोगों या श्रमिकों की कमी हो रही है। यूरोप के कई देश भी इस संकट से जूझ रहे हैं तभी उनके यहां आबादी को सबसे बड़ा संसाधन माना जाने लगा है।

भारत के पास प्राकृतिक रूप से यह संसाधन है। दुनिया की सर्वाधिक युवा आबादी भारत में है। उसे सकारात्मक दिशा देने, संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने और आर्थिक विकास को गति देने में उसकी भूमिका बनवाने की बजाय सरकार उसे समस्या के रूप में देख रही है। भारत एक विकासशील देश है और इसकी बड़ी आबादी समस्या नहीं है, बल्कि शक्ति और संसाधन है, जिसका सही इस्तेमाल करने में सरकारें विफल रही हैं। और अब राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान देना चाहिए और युवा आबादी के सकारात्मक इस्तेमाल के उपाय करना चाहिए, जनसंख्या अपने आप स्थिर हो रही है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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