पोस्टरबाजों की हास्यास्पद गिरफ्तारी - Naya India
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पोस्टरबाजों की हास्यास्पद गिरफ्तारी

कोरोना महामारी के इस दौर में हमारी अदालतें, सरकार और पुलिस कई ऐसे काम कर रही हैं, जो उन्हें नहीं करने चाहिए और कई ऐसे काम बिल्कुल नहीं कर रही हैं, जो उन्हें एकदम करने चाहिए। जैसे वह ऑक्सीजन, इंजेक्शन और दवाइयों के कालाबाजारियों को फांसी पर लटकाने की बजाय उन्हें पुलिस थानों और जेल में बिठाकर मुफ्त का खाना खिला रही है और जो लोग मुफ्त में दवाइयाँ बांट रहे हैं, मरीज़ों को पलंग दिलवा रहे हैं, अपनी एंबूलेंस में अस्पताल पहुंचा रहे हैं, उन पर मुकदमे चला रही है।

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उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए हो रही है कि वे विरोधी दलों के हैं। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास के खिलाफ इसीलिए जांच बिठा दी गई थी। जांच में मालूम पड़ा कि वे और उनका संगठन शुद्ध परोपकार और जन-सेवा में लगे हुए थे। अदालतों में बैठे न्यायाधीश आजकल ऐसे-ऐसे फैसले दे रहे हैं और इतनी आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे हैं, जो निश्चित रुप से संविधान की मर्यादा के अनुकूल नहीं हैं लेकिन उनमें इतना दम नहीं है कि इस वक्त के कालाबाजारी हत्यारों को वे फांसी पर लटकवाएं ताकि ठगी करनेवाले इन हजारों हत्यारों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए।

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अब दिल्ली की पुलिस का एक कारनामा और देखिए। उसने दिल्ली में 27 ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, जो दीवालों पर पोस्टर चिपका रहे थे। उन पोस्टरों में ऐसा क्या छपा था, जिससे दंगे भड़क सकते थे ? उनमें ऐसा क्या लिखा था, जो घोर अश्लील या अशोभनीय था ? उन पोस्टरों में क्या लोगों को अराजकता फैलाने के लिए उकसाया गया था ? हीं, उनमें ऐसा कुछ नहीं लिखा था। उनमें सिर्फ यह लिखा था ‘‘मोदीजी, हमारे बच्चों की वेक्सीन विदेश क्यों भेज दी ?’’

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यह सवाल पोस्टर चिपकाने वाले आप पार्टी और कांग्रेस के लोग ही नहीं कर रहे हैं बल्कि कई साधारण लोग भी कर रहे हैं। अब वेक्सीन की कमी भुगत रहे लोग यह सवाल करें, यह स्वाभाविक है। इससे नाराज होने की बजाय उनके सामने अपनी तर्कपूर्ण सफाई पेश की जानी चाहिए लेकिन जी हजूर पुलिसवालों ने या तो सत्तारुढ़ और मूढ़ नेताओं के इशारे पर उनके खिलाफ कार्रवाई कर दी या उनकी खुशामदबाजी के खातिर पोस्टरबाजों को गिरफ्तार कर लिया।

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यदि गिरफ्तार ही करना था तो उन नेताओं को गिरफ्तार क्यों नहीं किया, जिन्होंने ये पोस्टर लगवाए थे या जो इनका समर्थन कर रहे हैं ? वास्तव में 6 करोड़ टीके सरकार ने उस समय दूसरे देशों को भेंट किए थे या बेचे थे, जब कोरोना की लहर भारत में एकदम उतरी हुई लग रही थी। उस समय तो किसी विरोधी नेता ने मुंह तक नहीं खोला था।अब जबकि भारत में विदेशों से करोड़ों टीके आ रहे हैं, हम अपने टीका-दान की निंदा कैसे कर सकते हैं ? लेकिन जो लोग हमारे टीका-दान पर सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें गिरफ्तार करना तो बिल्कुल अनुचित है। दिल्ली पुलिस की यह सफाई हास्यास्पद है कि पोस्टरबाजों की गिरफ्तारी इसलिए की गई है कि वे तालाबंदी का उल्लंघन कर रहे थे।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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