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इतिहास

सोचें, पृथ्वी के करोड़ों साल पुराने इतिहास में मनुष्य के पांच हजार वर्षों पर! इन पांच हजार वर्षों का निचोड़ क्या है? कथित मानव सभ्यता का लब्बोलुआब क्या है? तीन सत्य। मनुष्यों का लगातार आपस में लड़ते रहना। झूठी कहानियां बना कर उनमें जीवन को जीना! जीवन के लिए हर तरह के पिंजरों का निर्माण और उन्हीं में आधुनिक मनुष्य का जीवन!…इतिहास मनुष्य प्रवृत्ति के व्यवहार की घटनाओं की दास्तां है। यदि सभी घटनाओं का वर्गीकरण करें तो होमो सेपियन सचमुच शिकार-शिकारी (युद्ध), टोलों-बाड़ों (व्यवस्था, देश, पिंजरों), गपोड़ कहानियों (अहंकार, धर्म), औजारों (प्रस्तर अस्त्र से परमाणु अस्त्र तक) के निर्माण के पांच-आठ वर्गों में वर्गीकृत हुआ मिलेगा।

प्रलय का मुहाना-20: इतिहास मनुष्य का सत्य है। उसकी पशुताओं का दो टूक सत्य। कैसे? आम मान्यता है कि मनुष्य का होना, उसकी पहचान दिमाग है। तब सोचें मनुष्य इतिहास कैसे लिखा होना था? मानव दिमाग के विचारों, आइडिया, तपस्वी साधकों की सत्य खोज की तारीखों और उपलब्धियों का लिखा होना था। लेकिन मानव इतिहास और उसकी टाइम लाइन में क्या उल्लेखित है? पशुगत प्रवृत्तियों से पैदा हुई लड़ाइयों की तारीखें!  मनुष्य का कथित सभ्यतागत जीवन ईस्वी पूर्व सन् 5,500 में मेसोपोटामिया की पहली मनुष्य बस्ती से आरंभ है। तब से अब तक के 7,720 वर्षों की तारीखें क्या बताती हुई हैं? कौन राजा हुआ, कौन जीता और कौन हारा? किसने किसको गुलाम बनाया और कितने लोग मौत के घाट उतरे। आंकड़ा है पिछले 34 सौ सालों में सिर्फ 268 साल शांति के थे। केवल 268 साल मनुष्य लड़ाई लड़ते हुए नहीं थे।

जरा तुलना करें पृथ्वी और उसके पैदा किए गए पशुओं (उनमें मानव भी) की पैदाइश व उसके इतिहास पर। पृथ्वी के अस्तित्व का करोड़ों साल पुराना इतिहास प्रामाणिक है। इस इतिहास में बायोमास के तमाम जीव, कछुए से लेकर डायनोसार, मनुष्य आदि पृथ्वी पर पैदा हुए। उनमें कई पशु प्रजातियां परिवेश की परिस्थियों में विलुप्त हुईं। पृथ्वी के इतिहास अनुसार मनुष्य की जैविक रचना, होमो सेपियन दो लाख साल पुरानी रचना है। इसमें मनुष्यों का आधुनिक कृषि जीवन सिर्फ आठ हजार साल पुराना। उसकी व्यवस्थाओं व सभ्यता का इतिहास मुश्किल से चार-पांच हजार साल पुराना।

सोचें, पृथ्वी के करोड़ों साल पुराने इतिहास में मनुष्य के पांच हजार वर्षों पर! इन पांच हजार वर्षों का निचोड़ क्या है? कथित मानव सभ्यता का लब्बोलुआब क्या है? तीन सत्य। मनुष्यों का लगातार आपस में लड़ते रहना। झूठी कहानियां बना कर उनमें जीवन को जीना! जीवन के लिए हर तरह के पिंजरों का निर्माण और उन्हीं में मनुष्य का जीवन!

रिपीटेशन निरंतर

तभी मनुष्य ने जो इतिहास लिखा है वह बेमतलब है। इतिहास शब्द ही गलत है। इतिहास, याकि “हिस्तरी” का स्थान-विषयवार, कालक्रमानुसार घटनाओं का ब्योरा मतलब वाली बात नहीं है। इससे मनुष्य को क्या फायदा है? यह इतिहास यही तो बताता है कि मनुष्य बार-बार गलतियां करता है। मनुष्य वह पशु है, जिसका आदिम शिकारी-शिकार का स्वभाव, जंगली व्यवहार स्थायी है। उस व्यवहार का रिपीटेशन निरंतर है। यदि इंसान किंगडम एनिमेलिया से अलग और खास होता तो क्या वह बार-बार उन्हीं गलतियों, व्यवस्थाओं, कहानियों को रिपीट करते हुए होता, जैसे पशु अपने स्वभावों में करते हैं।

उस नाते इतिहास नहीं रिपीट होता है, बल्कि मनुष्य का स्वभाव पशुगत यांत्रिकता में पुनरावृत्त होता है।

बाड़ों की व्यवस्था, कबीला प्रमुख, राजा-रानी, युद्ध, औजार निर्माण और उनके उपयोग की इतिहास घटनाएं चिम्पांजी के वंशानुगत अतीत की पुनरावृत्ति बार-बार है। इसलिए यदि विज्ञान और मनोविज्ञान मनुष्य के पशु व्यवहार का रहस्योद्घाटन है तो उस पशु व्यवहार की मेमोरी इतिहास है। इतिहास वंशानुगत डीएनए और उनके परिवेश से क्रमिक विकसित होने के इवोल्यूशन की परोक्ष दास्तां है। यह ह्यूमन विकास किस बात का? क्या युद्ध की संहारक शक्तियों, झूठी कहानियों, पिंजरों और भस्मासुर बनाने वाला क्या नहीं?

इतिहास का सार

मनुष्य प्रवृत्ति के व्यवहार की घटनाओं की दास्तां है इतिहास। यदि इतिहास की टाईमलाइन की सभी घटनाओं का वर्गीकरण करें तो होमो सेपियन सचमुच शिकार-शिकारी (युद्ध), टोलों-बाड़ों (व्यवस्था, देश, पिंजरों), गपोड़ कहानियों (अहंकार, धर्म), औजारों (प्रस्तर अस्त्र से परमाणु अस्त्र तक) के निर्माण के पांच-आठ वर्गों में वर्गीकृत हुआ मिलेगा। पूरे इतिहास का समुच्चय है कि सभ्यता के विकास में मनुष्य का न केवल एक-दूसरे के लिए भस्मासुर बनना हुआ, बल्कि पृथ्वी के लिए भी वह भस्मासुर बना। तब सभ्य होना, सभ्यताओं का निर्माण क्या?  क्या मै गलत हूं?

सवाल है पांच हजार सालों में मनुष्य ने वह क्या बनाया है, जिससे पृथ्वी की सुंदरता बढ़ी? पृथ्वी की दीर्घायुता, उसकी सेहत बढ़ी हो? तभी दार्शनिकों के मनुष्य के जन्मजात दुष्ट होने या अच्छे होने के सवाल का पृथ्वी के संदर्भ में जवाब सोचें तो वह यही होगा कि मनुष्य प्राइमरी तौर पर पृथ्वी का सबसे बड़ा दुष्ट प्राणी है!

और इस सत्य को इतिहास की तारीखें प्रमाणित करते हुए हैं।

तभी 21 वीं सदी का संकट ‘इंसान’ है। वह इंसान, जिसके व्यवहार से पृथ्वी की प्राणवायु सूखते हुए है, जिसके अतीत के ‘निशान’ लगातार मनुष्यों में महा कलह और लड़ाइयां बनाते हुए हैं। खोपड़ी के डीएनए और वंशानुगत मेमोरी दोनों ने मनुष्य को आत्महंता व भस्मासुर बनाया है। तभी सभ्यतागत संघर्ष अनिवार्य है। आठ अरब लोगों में बहुसंख्यकों को निरंतर लावारिस जिंदगी जीते जाना है, वही पृथ्वी को भी फड़फड़ाती मौत की दिशा की और बढ़ते जाना है!

पर मनुष्य दिमाग ऐसा नहीं मानता है। उसका इतिहास लड़ाइयों की लाठी से उत्तरोत्तर प्रगति हुई देखता है। उसके श्रेष्ठ होते जाने का अहंकार परमाणु हथियारों और ऊर्जाओं का विकास है। वह अब कदं-मूल का वनमानुषी खाना नहीं, बल्कि छप्पन भोग की थाली से पेट भरता है। उसका आदिम औजार निर्माण, उसका पहिया अब अंतरिक्ष में मनुष्य ग्रह बनवाने वाले यान में परिवर्तित है।

सब सही बात! बावजूद इसके सोचें कि इंसान के निज-आम जीवन की दशा में क्या? इक्कीसवीं सदी के मनुष्यों में बहुसंख्यक क्या आदिम अवस्था से अधिक भयाकुलता, भूख, झूठ और अंधेरों में जीते हुए नहीं है?

क्या पृथ्वी पर अब तक जिदंगी जीए 108  अरब लोगों ने स्वर्ग पाया?

इतिहास का सत्य है कि संख्या में होमो सेपियन बढ़ते गए। वह खोपड़ी के आकार, परिणाम, संख्या और विविधता व भिन्नताओं में बढ़ता गया। लेकिन लोगों ने स्वर्ग तो नहीं भोगा!  उन्हें भूख, भय, झूठ और अंधकार से मुक्ति तो नहीं मिली! सात हजार साल या पांच, तीन, दो हजार साल पहले पृथ्वी पर पचास लाख, करोड़, दो करोड़ जितने भी मनुष्य थे वे आज के मुकाबले तब कम भूख, कम खौफ (राजा का या तलवार का) और अधिक सुकून व संतोष से क्या जिंदगी जीते हुए नहीं थे? यदि धीरे-धीरे मनुष्य विकास, डार्विन की विकासवाद की थ्योरी में इवोल्यूशन हुआ तो वह विकास कहां है, जिससे मूल चिम्पांजी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति बदली हुई होती और मनुष्य सुखी, समझदार, सत्यवादी स्वभाव का बनता? क्या यह कोई दावा कर सकता है कि पहले इतने प्रतिशत मनुष्यों का जीवन लावारिस व पिंजरों में दुख भोगता हुआ था, जबकि इक्कीसवीं सदी की आठ अरब लोगों की आबादी में तब के मुकाबले कम अनुपात में लोग दुखी हैं!

तर्क, यथार्थ, विकास के परम वैभव के पिछले ढाई सौ सालों का सत्य त्रासद है। विकास की छलांगों से पृथ्वी और मनुष्य दोनों का जीवन रेड जोन में आया है। आठ अरब की आबादी में 95 प्रतिशत मनुष्य अमानवीय जिंदगी जीते हुए हैं। पशु से अलग होने की पहचान में मनुष्य जिंदगी के जितनी तरह के पैरामीटर हैं उनकी कसौटी में 95 प्रतिशत मनुष्य आबादी उसी घुटन भरी अवस्थाओं में जिंदगी गुजारते हुए है, जैसे मध्य काल में लोग जीवन जीते थे।

इतिहास रिपीट नहीं होता है, बल्कि इतिहास में, उससे चली आ रही लकीर में ही मनुष्य जीवन जीता है। उसके दिमाग को अतीत की मेमोरी, वंशानुगत डीएनए चलाए रहते हैं। अतीत और मानववृत्ति का चोली-दामन का नाता है। मनुष्य कहीं चला जाए, कुछ भी हो जाए, उसकी वजह, उसके साथ और अंत में नियति, डीएनए प्रकृति व इतिहास से सब तय होता है। तभी भाग्य और नियति का मामला मनुष्य प्रकृति से स्वचालित लगता है।

चिंतकों का महा बलंडर!

सहस्त्राब्दियों से विचारक, दार्शनिक, धर्माचार्य, इतिहासकार मनुष्य पर सोचते चले आ रहे हैं। वह कैसे सुसंस्कृत, सभ्य और मानवीय हो? कैसे वह जंगली अवस्था के स्वभाव, अवशेषों, पिंजरों से मुक्त हो कर स्वतंत्रचेता मानव बने? और इसी की उधेड़बुन में चिंतकों ने महा बलंडर किया। मनुष्य दिमाग का रियल विकास कराने, उनके पंख बनाने के बजाय उसकी बेड़ियां बनवा डाली। मनुष्य को नियंत्रित, दुरूस्त करने के जादू-टोने-टोटके सोचे और उनसे धर्म और व्यवस्थाएं बनाईं। सत्ता के तंत्र-मंत्र बनाए। कथानक, नायक-खलनायक, देव-असुर की शाखाओं-प्रशाखाओं की कहानियां बनाईं। नतीजतन मनुष्य बनाम मनुष्य को लड़ाने, बांटने, भटकाने, मालिक-गुलाम और साम्राज्य-सभ्यता की तारीखों का इतिहास बनता गया।

आश्चर्य नहीं जो आठ अरब लोगों की भीड भिन्नताओं-विचित्रताओं में सांस लेती हुई है। अधिकांश लोगों के पंख कतरे हुए है। पालतू जीवन की उनकी प्रवृत्ति है। मनुष्य की व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना चित, वृत्ति, रूढ़ी में जड़ है। निश्चित ही डार्विन का विकासवाद आदि मानव चिम्पांजी के भौतिक मनुष्य बनने की गजब थीसिस है। पर इस पहलू पर चिंतन नहीं के बराबर है कि मनुष्य चेतना के जागने-जगाने, उसे परफेक्ट बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद समझदारियों में मनुष्य क्यों नहीं पूर्ण, परफेक्ट मानव है?

इतिहास दिलचस्प विषय है। इसमें मनुष्य प्रकृति व अस्तित्व के राज है। सवाल है इतिहास ऐसा कैसे जो मनुष्य को बांधने, लडाईयों, विनाश की तारीखों से भरा है? ध्यान रहे, युद्ध और लड़ाइयों के कारण ही मनुष्य के आदिम डीएनए याकि भय, भूख-लालच, अहंकार, झूठ उत्तरोत्तर बढ़ते गए।

इतिहास में जकड़ा भारत

बतौर उदाहरण भारत पर गौर करें। आबादी इतिहास में जकड़ी हुई है। लोगों की प्रकृति कहानियों, अनुभव और उनसे बने दिमागी निशान से बाहर प्रभावित है। इसलिए कि ढाई हजार साल के ज्ञात इतिहास में कहानियों, लड़ाइयों और गुलामी में ही लोग जीवन गुजारते रहे। इतिहास की तमाम भारत थ्योरियों, मान्यताओं का सत्व-तत्व है कि अराजक-अंधकार युग में भी मनुष्य जीवन लावारिस था तो वैभव काल के अश्वमेध यज्ञों में भी प्रजा की स्वतंत्रता की गारंटी बनाने वाला, इहलोक को स्वर्गलोक बनाने का चिंतन नहीं था। जो था वह परलोक का चिंतन था या पलायन और वैराग्य का। रामायण-महाभारत से लेकर राजे-रजवाड़ों की लड़ाइयों व ईश्वर अवतार के भरोसे मनुष्य की कलियुगी जिंदगी थी। डेढ़ हजार साल पहले विदेशी हमलों का सिलसिला जब शुरू हुआ तो उसके बाद भारत में वह हुआ जो पूरे मानव इतिहास में और कहीं नहीं हुआ। लोग तलवार, गुलामी, पिंजरों और सरकार की बेड़ियों से सैकड़ों साल सतत भूख, भय, भक्ति, चाकरी, माई-बाप सरकार की कृपा में जिंदगी जीते चले आ रहे है। शोषण, लूट, जख्म और उनके निशान के इतिहास में ही भारत का वर्तमान है। डीएनए व मनोवृत्ति के वंशानुगत, इतिहासजन्य अनुभव में मनुष्य कैसे सतत एक सी जिंदगी जीता आया है इसकी पृथ्वी पर नंबर एक मिसाल भारत के 140 करोड़ लोग हैं।

ऐसे ही इस्लामी देश और 1.90 अरब मुस्लिम इतिहास में जीते हुए है। वहीं डेढ़ अरब चाइनीज भी वैभव पा कर उस वक्त से चिपके हैं जब चीन के पृथ्वी के मिडिल किंगडम होने की कहानी बनी थी। ध्यान रहे कहानी का अर्थ है युद्ध और मनुष्य बनाम मनुष्य की लड़ाई। स्वामित्व या गुलामी। शोषक और शोषित। दूसरे शब्दों में वह इतिहास जिस पर होमो सेपियन सभ्यता जैसी जुमलेबाजियों में इतराता है।

आश्चर्य नहीं जो मनुष्य अब पृथ्वी को अपने इतिहास का हिस्सा बना रहा है। मनुष्य अपने व्यवहार से वह विध्वंस किए हुए है, जिससे पृथ्वी की घड़ी का अंतकाल आता हुआ है। वैज्ञानिक, विचारक और भविष्यदृष्टा लोग वे टाइम कैप्सूल, वे कालजयी घड़ियां बनाने लगे हैं ताकि पृथ्वी व मानव सभ्यता का अंत हो तब भी इस इहलोक की याद में चलती रहे। यह ख्याल मजेदार है कि कुछ यांत्रिक वस्तुओं से मनुष्य और पृथ्वी की स्मृति प्रलय के बाद भी बनी रहनी चाहिए। मतलब यांत्रिकता से इतिहास को जिंदा रखना।

ऐसा ही मनुष्य का पांच हजार वर्षों से अपने साथ और पृथ्वी के साथ व्यवहार हुआ है। इतिहास की तारीखों को मनुष्यों ने हमेशा यांत्रिक भाव याद रखा। बिना इस बोध के, इस समझदारी के कि ये जो तमाम तारीखें हैं, घटनाएं हैं उनका मतलब दिमाग के स्वभाव के लिए हैं। अधिकतम मनुष्यों का इतिहास के साथ बिना समझदारी व बिना बोध के व्यवहार था। (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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