nayaindia pralay ka muhaana टूक निष्कर्ष, पर गले नहीं उतरता!
बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया| pralay ka muhaana टूक निष्कर्ष, पर गले नहीं उतरता!

टूक निष्कर्ष, पर गले नहीं उतरता!

सभ्यताभस्मासुरी अंहकारों की वह पहली और अंतिम रचना है जो अंततः होमो सेपियन के निर्माण और मृत्यु का टाईम कैप्सूल साबित होगी। कैसा त्रासद सत्य है जो राम-रावण, महाभारत और सुमेर की पहली सभ्यता से लेकर आज तक सभ्यताओं के उत्थान-पतन की तमाम सच्चाईयों, कथा-कहानियों का निष्कर्ष है कि मनुष्य प्रवृति सभी समस्याओं की ज़ड़ है बावजूद इसके मनुष्यों में यह बोध नहीं बना कि वह सुधरे। अपने ढर्रे को बदले। भूख, भय और अंहकार से निर्मित सभ्यता के मकड़जाल को छोड़े। नए ढ़ग से जीवन जीने पर विचार करें। नया तरीका बनाएं।

प्रलय का मुहाना-34: पृथ्वी की समस्या मनुष्य है। मनुष्य की समस्या खुद मनुष्य है! मतलब हर तरह की समस्याओं का जड़ कारण मानव स्वभाव है। खोपड़ी की जैविक रचना में डीएनए भिन्नताओं, प्रवृत्तियों और खुराफातों के कारण मनुष्य की पशुता बेलगाम है तो वह असभ्य है। बिना विजडम और तार्किकता के है। इलाज क्या है? या तो मानव समाज बायो भिन्नता के वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार करे। उस अनुसार अपनी समाज रचना को बदले या विज्ञान-तकनीक से खोपड़ी के डीएनए बदले। दिमाग को वैज्ञानिक तरीकों से सभ्य बनाने पर काम हो। फिलहाल इस तरह सोचना मनुष्यों के कुलीन वर्ग के लिए संभव नहीं है।

तब इस सिनेरियो की कल्पना करें। यदि पृथ्वी सूखे, डूबे, ऑक्सीजन खत्म होने लगे और जान के लाले पड़े तो मनुष्य क्या करेगा? सौ साल बाद पृथ्वी की होने वाली 11 अरब आबादी तब क्या करेगी? लोग 195 देशों की राष्ट्रीय सीमाओं में, धर्म-संस्कृति के अपने सभ्यतागत बाड़ों में मरेंगे या वे गलतियों के बोध में राष्ट्रीय सीमाओं-सभ्यताओं का पिंजरा तोड़ कर एक वैश्विक सरोकारों की वैश्विक मानव सभ्यता बनाएंगे? लोग अपने को बदलने, अपनी नई जीवन पद्धति बनाने का संकल्प लेंगे या नहीं? संभव है वक्त मनुष्य को शायद समझदार बनाए। उसे अपनी गलतियों का बोध हो। प्रलय के मुहाने पर खड़ा मानव शायद नई वैश्विक सभ्यता बना कर पृथ्वी और मानवता दोनों को बचाने का जतन करे!

सचमुच मानव भविष्य का यक्ष प्रश्न है कि प्रलय तक मनुष्य क्या सभ्यताओं के उत्थान-पतन, धर्म-राजनीति के मकड़जाल में फंसा रहेगा या इनके कारण हुई बरबादियों के बोध में वह भविष्य में अपनी भस्मासुरी प्रवृत्तियों सें पिंड छुड़ाएगा?

‘सभ्यता’ से कुंद दिमाग!

पिछले पांच हजार वर्षों का अनुभव क्या बताता हुआ है? मोटी बात मनुष्य दिमाग का अहम खत्म नहीं होगा। वह वैयक्तिक और सामूहिक तौर पर मानेगा ही नहीं कि वह भस्मासुर है। उसका सभ्यता निर्माण, स्वभाव और व्यवहार भस्मासुरी है। लोग देश-धर्म-राजनीति के पिंजरे को ही रक्षक, औजार, गुरूता व भाग्य तथा नियति समझे रहेंगे। इसी मनोभाव में पांच हजार वर्षों से मनुष्य जिंदगी और अपनी कथित सभ्यता को जीता आ रहा है। फिर भले अनुभव नारकीय रहे हों।

गौर करें पृथ्वी की मौजूदा आठ अरब लोगों की आबादी पर। हर व्यक्ति राष्ट्र-सभ्यता के अपने पिंजरे में अपने को परम भाग्यवान मानता है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद के पिंजरे में धर्म, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, पहचान, इतिहास, जीवन पद्धति की इतनी तरह की पट्टियां आंखों पर बंधी हैं कि मनुष्य की बुद्धि आपदा-विपदा में, महाभारतों में, महायुद्धों में भी धर्म, देश और सभ्यता के मान-अपमान के बोध में सांस लेती होती है।

इसलिए ‘सभ्यता’ भस्मासुरी अहंकारों की वह पहली और अंतिम रचना है जो अंततः होमो सेपियन के निर्माण और मृत्यु का टाइम कैप्सूल साबित होगी। कैसा त्रासद सत्य है कि राम-रावण, महाभारत और सुमेर की पहली सभ्यता से लेकर आज तक सभ्यताओं के उत्थान-पतन की तमाम सच्चाइयों, कथा-कहानियों में लगातार यह बोध है कि मनुष्य प्रवृत्ति की सोच सभी समस्याओं की जड़ है बावजूद इसके मनुष्यों में यह बोध नहीं बना कि वह सुधरे। अपने ढर्रे को बदले। भूख, भय और अहंकार से निर्मित सभ्यता के मकड़जाल को छोड़े। नए ढंग से जीवन जीने पर विचार करे। नया तरीका बनाए। वह भेद, वह असमानता और अहंकार खत्म करे, जिनसे मनुष्य बनाम मनुष्य का झगड़ा होता है। कोई कभी देवता होता है तो कभी असुर। वक्त विशेष में कोई बर्बर, जंगली होता है और कोई सभ्य।

सभ्य और जंगली साथ-साथ

उस नाते सभ्यता से मनुष्यों की उत्तरोत्तर मानसिक प्रगति की बात सच नहीं है। पहले मनुष्य जंगली, बर्बर था और अब सभ्य है, यह मान्यता फिजूल है। इस मान्यता को यदि बीसवीं-इक्कीसवीं सदी के हिटलर, स्तालिन, माओ और मौजूदा पुतिन के सभ्यतागत अहंकार पर कसें तो क्या वह गलत नहीं लगेगी? नरसंहार और बेमतलब लोगों पर गोले बरसाना, यातनाओं का दमन चक्र चलाना क्या बर्बर, जंगली आदि मानव के वक्त का अनुभव नहीं है? ज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) क्रांति और ज्ञानोदय (एन्लाइटेंमेन्ट) के बावजूद यदि जिन भी कारणों से महायुद्ध हुए तो बीसवीं सदी में जर्मन लोगों की बर्बर अवस्था का प्रमाण नहीं? उस नाते सभ्यता का सफर लगातार इस द्वंद्व को झेलता हुआ है कि वक्त विशेष में कौन सभ्य और कौन बर्बर या जंगली? मजेदार बात है कि जंगली  बर्बर अवस्था में जी रहे लोग भी सभ्य होने का मुगालता पाले होते हैं और यह बोझ उनके दिमाग में भी होता है कि सामने वाली असभ्य जमात को कैसे सभ्य बनाएं! तभी इस्लामी सभ्यता बाकी सभी को अपना जैसा बनाना चाहती है तो हिंदू इस गुमान में हैं कि हम तो विश्व गुरू हैं। ऐसे ही चाइनीज और पश्चिमी सभ्यता या पुतिन का स्लाविक अहंकार सभ्य-श्रेष्ठ होने के अहंकार में आर-पार की लड़ाई बनवाता हुआ है। सबके पीछे क्या इस बेसिक मान्यता (गलतफहमी या झूठे अहंकार) का रोल नहीं है कि हम अधिक सभ्य हैं और हमें उन्हें सभ्य बनाना है। उनकी मुक्ति तभी है जब वे हम जैसे बनें! असलियत यह है कि इस तरह का भेद बनाकर सोचना, व्यवहार बनाना ही असभ्य होने का, मनुष्य नहीं होने का और भस्मासुर प्रकृति का प्रमाण है।

सभ्यता का बोझ

मनुष्यों के मुगालते, बोझ व अहंकार का एक जुमला ‘बर्डेन ऑफ सिविलाइजेशन’ है। इस जुमले के पीछे की दास्तां लंबी-चौड़ी है। कह सकते हैं सन् 1359 से ले कर आज तक वैश्विक राजधानियों में, मानवीय विचारों में अपने आपको सभ्य समझते हुए दूसरों को सभ्य बनाने का जो इतिहास अनुभव बना हुए है वह भी एक कारण है भस्मासुरी प्रवृत्तियों के भभके बनवाने का।

मानव इतिहास का यह सबसे बड़ा घपला है जो चंद देशों (पश्चिमी सभ्यता) ने सभ्यता के नाम पर मनुष्यों और प्रकृति का बेइंतहां शोषण किया। वे क्रांतियां हुई, वे व्यवस्थाएं बनीं, वह आजादी बनी और ऐसे-ऐसे वैचारिक प्रयोग हुए, जिनसे चुपचाप पृथ्वी और मानव दोनों की गुलामी बनी। दोनों का दोहन हुआ। कोई माने या न माने पर जिन समझदारों-विचारकों ने ‘सभ्यता के बोझ’ में लोगों को सभ्य और पृथ्वी को स्वर्ग बनाने के लिए दोहन व गुलामी के ढाई सौ साल बनवाए हैं वे पांच हजार सालों की मानव सभ्यता के कलंक हैं। इससे इतिहास का सर्वाधिक क्रूर, दमनकारी, बर्बर, हिंसक, और जंगली मनुष्यता का कालखंड बना है। सभ्यताओं के पांच हजार साल के इतिहास में 17वीं से 19वीं सदी के मध्य के ढाई सौ सालों की अवधि सचमुच ‘डार्क युग’ था। वह वक्त, जिसमें सभ्य तथा सभ्यता के नाम पर पृथ्वी की एक-तिहाई आबादी को गुलाम बनाया गया। सन् 1359 से 1635 के ऑटोमन साम्राज्य, सन् 1533 से 1914 में रूस की जारशाही के विस्तारवादी साम्राज्य, सन् 1580 से 1640 में स्पेनिश, पुर्तगीज और इनके बाद फिर इंग्लैंड, फ्रांस, डच सहित कुल 14 कथित सभ्य, पॉवरफुल देशों ने 1945 तक जैसे राज किया है वह पृथ्वी की एक-तिहाई आबादी की गुलामी की रियलिटी है। सन् 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र बना था तब 75 करोड़ लोग गुलाम थे। याद करें कि आधुनिक काल के ‘डिस्कवरी वक्त’ में साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, वैचारिक क्रांतियों के दौर में मनुष्यों का मनुष्यों के साथ कैसा व्यवहार हुआ?

क्या वह सभ्यों द्वारा असभ्यों को सभ्य बनाना था? इस काल खंड में पूरी पृथ्वी में बीमारियों से मरने वाले लोगों का जहां रिकार्ड था वहीं लड़ाइयों और महायुद्धों की मौतों का आंक़ड़ा भी विशाल और भयावह। एक सदी में दुनिया की दस प्रतिशत आबादी बीमारियों (कोलंबिया के 90 प्रतिशत मूल निवासी) से मरे। मानो यमराज का (Great Dying) काल। सन् 1500 से 1700 के बीच समुद्री और जमीनी यात्राओं में लोगों की आवाजाही से दुनिया में व्यापार, संपदा, पॉवर और संसाधनों के दोहन का जो ताना-बाना बना उससे प्रगति होने का सत्य अपनी जगह है लेकिन पृथ्वी के मनुष्य का क्या हुआ? वह क्या समझदार था? नहीं। उस वक्त में मनुष्यता की पशुता निर्विवाद साबित होती हुई है।

लेकिन ‘बर्डेन ऑफ सिविलाइजेशन’ के जुमले से उस सबको न्यायोचित बताया गया। इसी जुमले से जंगली लोगों को सभ्य बनाने के नाम पर उपनिवेशवाद फला-फूला। ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, डच, जर्मन सभी की कथित पश्चिमी सभ्यता पृथ्वी के सभी कोनों में ढाई सौ साल लोगों को गुलाम बना कर यह कहती रही कि पराधीन लोग पिछड़े, जंगली और बर्बर हैं इसलिए उनको सभ्य बनाना उनका दायित्व है। कभी रहे होंगे मिस्र-सुमेर या चाइनीज, इंडियन लोग सभ्यतावान लेकिन अब वे जंगली-बर्बर हैं। उन्हें शिक्षित, सभ्य बनाना पश्चिमी सभ्यता और मानवता का दायित्व है। इस तरह की बातें पश्चिमी देशों की संसदीय बहस और नेताओं के बयानों में बाकायदा रिकार्डेड है।

सभ्य बनाने की ठेकेदारी और परिणाम

सोचें, यदि चंद देश अपने आधिपत्य से सभी मनुष्यों को सभ्य बनाने का मिशन बनाते तो इतिहास और वर्तमान क्या वह होता जो आज है? मनुष्यों की एक वैश्विक सभ्यता याकि पृथ्वी की प्रतिनिधि एक मानव सभ्यता के बीज क्या विकसित नहीं होते? क्या उलटा नहीं हुआ है? पृथ्वी पर सभ्यताओं के गला काट संघर्ष नहीं बने? एन्लाइटेंमेन्ट के वक्त पश्चिम के कुछ विचारक राजनीतिक-सामाजिक जीवन की क्रांतियों से मनुष्य जीवन से पशुगत प्रवृत्तियों को निकलवाने के उपाय सोचते हुए थे। बराबरी, भाईचारे और आजादी की फ्रांसिसी क्रांति से वैश्विक मानव उसूलों का एक आइडिया खिला था। लेकिन वह भी सभी को ग्राह्य नहीं।

उस नाते पिछले चार सौ सालों में पश्चिमी सभ्यता के असफलताएं मानव इतिहास की बड़ी त्रासदी है। पश्चिमी सभ्यता ने कोई चार सदी ‘सभ्यता के बोझ’ में पृथ्वी को सभ्य बनाने की ठेकेदारी बनाई। उपनिवेश बनाए, लोगों को गुलाम बनाया, पृथ्वी के शोषण की वैश्विक भूख पैदा की। सबके परिणाम में मनुष्यों में विभाजन बढ़ा। दिमाग में विकृतियां बनी। नस्ल, धर्म, पहचान, शासन प्रकृति की नई विभाजकताएं पैदा हुईं। लोगों का नए-नए राष्ट्रों में विभाजन हुआ। वैचारिक आधार पर लोगों पर वे प्रयोग हुए जो जानवरों पर हुआ करते थे। मगर इस सबका बोध सभ्य समाज में भी नहीं है। एक सर्वे के अनुसार आज भी 43 प्रतिशत ब्रितानी मानते है कि उपनिवेशवाद अच्छी बात थी! या यह बात की हमारा इरादा अच्छा था और जो हुआ वह दुनिया को संभालने के बोझ की सदिच्छा में था।

यक्ष प्रश्न है महासभ्य, महाविकसित देशों में ‘सभ्यता के बोझ’ के बीच मनुष्यों की नई वैश्विक मानव सभ्यता बनाने का आइडिया क्यों नहीं खिला? क्यों ब्रितानी समाज में यह समझ नहीं बनी कि लोगों को आजाद करते हुए भी उन्हें सभ्य बनाने के लक्ष्य में सभ्य लोगों का वह कॉमनवेल्थ बने, जिसके भीतर देशों की सीमाएं नहीं हों और समानता, भईचारे, लोकतंत्र की कॉमन पूंजी में सभी मनुष्यों का जीना सुनिश्चित करवाए रखें। उलटे ऐसा कैसे हुआ कि उसके कॉमनवेल्थ में कई तरह की तानाशाहियों, जंगलीपने और बर्बरताओं का इतिहास बना है। मनुष्यों को ईदी अमीन जैसे नरभक्षियों का अनुभव हुआ तो सैनिक तानाशाहियों, इस्लामी शरिया राज के आधुनिक अनुभव हैं।

‘सभ्यता के बोझ’ में मनुष्यों में नई भिन्नता पैदा हुई। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी भिन्नताओं में ढल गई। तभी आज भूमंडलीकृत गांव में भी गली-मोहल्लों के दादाओं की लड़ाई है। पॉवर का घमंड है। धर्म का वैश्विक संघर्ष है। और आखिर में भावी ‘सभ्यता के संघर्ष’ का सिनेरियो है। पृथ्वी के सभी 195 देश सैमुअल पी हटिंगटन की ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की थीसिस के वे पात्र हैं, जिसमें खतरा ‘वैश्विक सभ्यता’ के उत्थान से पहले ही पतन का है। भूमंडलीकृत गांव होगा मानव नरसंहार का रणक्षेत्र। और मानव और पृथ्वी दोनों के अस्तित्व के अंत के सिनेरियो एक रास्ता  मनुष्य द्वारा अपने हाथों अपने भस्मासुरी विनाश का भी!

सोचें, आज के अर्थ में सभ्यता क्या है? इस्लामी सभ्यता, हिंदू सभ्यता, चाइनीज सभ्यता, पश्चिमी सभ्यता, स्लाविक सभ्यता आदि, आदि। पृथ्वी के आठ अरब लोगों की धर्म, राजनीति, नस्ल, देश के रूप में सभ्यता की अलग-अलग लेबलिंग और स्टैम्पिंग।

लगता है मनुष्य दिमाग के चेतन-अचेतन में यह बात गहरे पैठी है कि मनुष्य अलग-अलग हैं। इसलिए मानवीय गुणों के साझा मूल्यों, मानवाधिकारों में गरिमापूर्ण मानव जीवन पद्धति की साझा, कॉमन मानव सभ्यता बनना संभव ही नहीं मानता। कल्पना करें यदि यहीं बात विज्ञान के बायो भिन्नता के प्रमाणों से सत्यापित हुई तो कैसा बवाल होगा?

लब्बोलुआब ‘प्रगति’ और ‘सभ्यता’ दोनों से पृथ्वी और मनुष्य का अहित है। इसका सत्व-तत्व होमो सेपियन की खोपड़ी में इसलिए नहीं उतरता है क्योंकि वह बिना विजडम के है। मनुष्य कैसे सभ्य-सम्यक-तार्किक बने याकि मनुष्य विजडमयुक्त हो, इसका जवाब एक ही है। मनुष्य की जिंदगी नई एप्रोच में ढले। ऐसी एक नई मानव व्यवस्था बने, जिसमें मनुष्य सिर्फ मनुष्य के रूप में सोचे। यह बारीक तथा अव्यावहारिक आइडिया है। कोशिश करूंगा इसे पर आगे लिखने की।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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