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पिंजरे तोड़े बिना बचाव नहीं!

कल्पना करें सदी के आखिर में पिघलती धरती के कारण यदि पृथ्वी के द्विपीय देश डूबे तो वहां के नागरिक क्या सोचते हुए होंगे? यदि मालदीव, सेसेल्स, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम जैसे देश डूबे तो सभ्यता के बनाए इन देशों के धर्म, भगवान, समाज, राजनीति और नेता क्या मनुष्यों को बचा लेंगे? लोग जब डूबने लगेंगे तब वे कहां जाएंगे? कथित मानव प्रगति क्या लोगों को बचा पाएगी? तब पच्चीस-पचास देशों के मनुष्यों को अहसास होगा कि यदि राष्ट्र की सीमाएं नहीं होतीं, सभ्यताओं का झूठा घमंड पाला नहीं होता तो नाव उठा कर बगल के महाद्वीप में वैसे ही पहुंच जाते जैसे पांच हजार साल पहले होमो सेपियन आया-जाया करते थे।

प्रलय का मुहाना-36: एक-दो पीढ़ी में लोगों को अहसास होगा कि उनके पूर्वज मनुष्य को अपना और पृथ्वी का कैसा भस्मासुर बना गए! सभ्यताओं में कैसे मनुष्यों को जकड़ गए। पृथ्वी के टुकड़े करके समाज, धर्म, राजनीति, सभ्यताओं और राष्ट्रों का कैसा फरेब बनाया। मनुष्य को मतिमंद किया। श्रेष्ठ सृष्टि रचना ‘मानव’ के दिमाग को विकृत किया। मनुष्य के पर काटे, उसे परतंत्र बनाया। मानव के सार्वभौम स्वतंत्र अस्तित्व और सोच को भ्रष्ट किया। आत्मघाती धोखा बनाया। कल्पना करें सदी के आखिर में पिघलती धरती के कारण यदि पृथ्वी के द्विपीय देश डूबे तो वहां के नागरिक क्या सोचते हुए होंगे? यदि मालदीव, सेसेल्स, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम जैसे देश डूबे तो सभ्यता के बनाए इन देशों के धर्म, भगवान, समाज, राजनीति और नेता क्या मनुष्यों को बचा लेंगे? लोग जब डूबने लगेंगे तब वे कहा जाएंगे? कथित मानव प्रगति क्या लोगों को बचा पाएगी?

तब पच्चीस-पचास देशों के मनुष्यों को अहसास होगा कि यदि राष्ट्र की सीमाएं नहीं होतीं, धर्म और समाज की बेड़ियां नहीं होती, सभ्यताओं का झूठा घमंड पाला नहीं होता तो नाव उठा कर वे बगल के महाद्वीप में वैसे ही पहुंच जाते जैसे पांच हजार साल पहले होमो सेपियन आया-जाया करते थे। वास्तविकता है पांच हजार वर्ष पहले पूरी पृथ्वी मनुष्य का घर थी। ऐसी कोई बाधा, दिमागी ग्रंथि नहीं थी कि उधर तो मुसलमान रहते हैं या हिंदू या ईसाई। वहां काले हैं या गोरे। बिना पासपोर्ट और बिना वीजा के था। बिना समाज, बिना धर्म और बिना राजनीति के था। वह स्वतंत्र, वैयक्तिक सार्वभौमता में जीवन जीते हुए था। अपने कबीले और समूह के छोटे दायरे में तमाम समस्याओं के समाधान खोजते हुए आत्मनिर्भर जीवन जीता था।

सोचें, यदि मनुष्य वैसे ही जीवन जी रहा होता तो क्या पृथ्वी का आकाश फटा हुआ होता? जलवायु परिवर्तन में पृथ्वी और मनुष्य दोनों अस्तित्व के संकट में प्रलय की और बढ़ते हुए होते?

सभ्य नहीं भस्मासुर

गलत धारणा है कि तब मनुष्य जंगली था, जबकि अब सभ्य है। यदि मानें कि सभ्यता निर्माण के बाद मनुष्य पांच हजार वर्षों में सभ्य बना है तो ऐसी नौबत कैसे जो उसके कारण आकाश में सूराख है? पिछले तीन हजार सालों में क्यों पांच हजार युद्ध हुए हैं। पृथ्वी को टुकड़ों में बांट क्यों 195 राष्ट्रों में बंटी हुई है?

दुनिया के छोटे द्विपीय और समुद्री किनारे के 39 देशों ने एक एलायंस बना रखा है। ये सभी देश यह रोना रोते हुए हैं कि उनके बस में जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझना नहीं है। हिसाब से देखा जाए तो बड़े देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, अमेरिका भी हीटवेव हो या बाढ़ जैसी आपदाओं की फ्रिक्वेंसी रोक नहीं सकते। लेकिन जिन छोटे द्विपीय देशों का जल्दी डूबना तय है वहां के लोगों के सामने तो यह यक्ष प्रश्न जल्द आने वाला है कि करें तो क्या करें? जाएं तो जाएं कहां? तब मानवता को हर देश एक पिंजरा लगेगा और उसके लिए लोग अपने आपको कोसते हुए होंगे। तब धर्म-भगवान-राजनीति-सभ्यता-व्यवस्थाओं के नाम पर पांच हजार वर्षों से हो रहे धोखे की रियलिटी मालूम होगी। समझ आएगा कि विकास का यह कैसा प्रपंच, जिसमें सब डूबता हुआ है।

प्रशांत क्षेत्र का एक बहुत छोटा द्विपीय देश तूवालू है जैसे भारत का पड़ोसी मलादीव है। दोनों देश मुश्किल से समुद्र के जलस्तर से आधा-पौन मीटर ऊपर हैं। इन देशों का पहले डूबना तय है तो यहां के लोग क्या करेंगे? क्या मालिक, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, सरकारें, व्यवस्थाएं और ईश्वर में कोई बचाने के लिए होगा?

तभी अस्तित्त्व संकट की और बढ़ते हुए पृथ्वी के लोगों को सोचना चाहिए कि जिन सभ्यतागत कर्मों से आकाश में सूराख हुए है, पृथ्वी पिघलती-सूखती हुई है वह क्या मानव की गलती नहीं है? सभ्यता से पहले मनुष्य का बिना बंधनों का शिकारी, पशुपालन, घूमंतू खेती का खानाबदोश आजाद जीवन पृथ्वी और मनुष्य दोनों के लिए हितकारी था या बाद में बनी कथित सभ्यताओं और राष्ट्रों से हितकारी हुआ?

मैं पिछले पांच हजार वर्षों के इतिहास परिप्रेक्ष्य में उन दार्शनिकों-विचारकों का मुरीद हूं, जिन्होंने मनुष्य के बंधे-सामूहिक जीवन को घातक बताया। मैं लेखन काल के आरंभ से मानव स्वतंत्रता, मनुष्य जीवन की गरिमा और अधिकारों की जरूरत के साथ मानता आया हूं कि व्यवस्था और तंत्र में मनुष्य की मानवयीता खत्म होती है। तंत्र ने मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियों की भूख, भय, अहंकार और मिल्कियत को हवा दी है। तंत्र ने तलवार, बेड़ियों और शोषण में मनुष्य को खाया है। उनसे पशुगत प्रवृत्तियों के सामूहिक और संस्थागत रूपांतरण में मनुष्य के एनिमल फार्म बने हैं।

वह सत्य अब आगे लगातार साबित होता हुआ होगा। पृथ्वी और मनुष्य दोनों पर अस्तित्व का संकट है तो कोई माने या न माने इस और अगली सदी में मनुष्य अपने कर्मों, अपनी व्यवस्थाओं, तंत्रों और सभ्यताओं के मकड़जाल में फंसा हुआ होगा। समझ ही नहीं आएगा कि करें तो क्या करें?

वैचारिक पुनर्विचार जरूरी

इसलिए वक्त का तकाजा है जो आठ अरब लोग नए सिरे से अपने जीवन और भविष्य पर विचार करें। उन आइडिया पर गंभीरता से पुनर्विचार हो, जिनकी पांच हजार वर्षों से अनदेखी है और जो मनुष्य के मूल ऑगेर्निक तथा स्वतंत्र मानव जीवन की महत्ता को बतलाते हुए है। मतलब मानवतावादी और उदारवादी विचार!

वैज्ञानिक सत्य दोहरा रहा हूं कि ढाई लाख साल के होमो सेपियन जीवन में आठ हजार साल पहले तक मनुष्य पृथ्वी पर शिकार, पशुपालन और अनाज व झूम खेती से गुजर बसर करता खानाबदोश था। समाज-कबीले, मुखिया, ओझा पुजारी का उसका एक छोटा-सिमटा सामाजिक जीवन था। दार्शनिक रूसो ने सन् 1762 में उस जीवन शैली की प्राकृतिक अवस्था को होमो सेपियन का ‘आदर्श बर्बर’ होना बताया था। मनुष्य का वह ‘आदर्श बर्बर’ जीवन तब संतोषी जिंदगी थी। ना किसी साथी की जरूरत और ना किसी का अहित करने की इच्छा। वह एक भोले और अज्ञानी बालक की तरह सादगी और परम सुख की जिंदगी गुजारते हुए था। वह मनुष्य की पूर्ण स्वतंत्र, कपट-अहंकार रहित समानता वाली पवित्र जिंदगी थी। सभ्यता के सभी पालनों से पहले के वक्त में ऐसी ही मनुष्य जिंदगी रही होगी। गड़बड़ी तब हुई जब पांच हजार साल पहले सुमेर में नदी किनारे खेतिहरों की स्थी बस्ती बसी। तब कबीलों के पुजारियों ने मुखिया के साथ मिलकर मनुष्यों में परस्पर सहयोग की आवश्यकता में वह व्यवस्था बनाई, जिसमें मनुष्यों के लिए अनिवार्य हुआ कि जैसा कहें वैसे रहो। पुजारियों ने यह झूठ फैलाया कि भूख, भय और असुरक्षा की चिंता में अलौकिक शक्तियों याकि ईश्वर ने कहा है कि फलां व्यक्ति शक्तिमान है, वह राजा है, ईश्वर का अवतार है इसलिए उसके कहे, उसके डंडे अनुसार अपने व्यवहार और जिंदगी को ढाले। जैसा मैंने पहले लिखा है कबीलों के ओझाओं की अतिशयता और मुखियाओं से उसकी सांठगांठ, स्वार्थों और मिल्कियत की बेसिक चाह से सभ्यताओं का बर्बर निर्माण शुरू हुआ।

रूसो ने लिखा है कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है किंतु वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है”। “मनुष्य मौलिक रूप से अच्छा है और मानवीय अच्छाई में सामाजिक बुराइयां ही बाधक बनती हैं”। यहीं पिछले पांच हजार वर्षों के नारकीय मानव जीवन अनुभव की वजह का लब्बोलुआब है। समाज-धर्म-राजनीति और व्यवस्था के कुलीन वर्गों, राजाओं और दरबारी दार्शनिकों ने अपने स्वार्थों में, उसकी अतिशयता में ये गलत मान्यताएं बनवाई है कि राजा ईश्वर का अवतार है और प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य जंगली, अराजक, स्वार्थी, अहंकारी और भूखे भेड़िये की तरह एक-दूसरे को नोचने की प्रवृत्ति के थे। मतलब मनुष्य के पशुगत डीएनए के घृणित-हिंसक स्वभाव को उकेर कर राजा के डंडे याकि शक्ति की ताकत से मनुष्य को नियंत्रित और बांधने का औचित्य बनवाया गया। जबकि पुजारी, राजा, कारिंदे भी वैसे ही पशुगत डीएनए लिए हुए थे जैसे हर मनुष्य को जन्मजात मिलते हैं। लेकिन झूठ और ईश्वर व धर्म के हवाले राजा-पुजारी ने अपने आपको महामानव बनाया और अपने डंडों व जादू-टोनों से मनुष्य के लिए पिंजरे बनाते गए। पृथ्वी टुकड़ों में बंटती गई। इसका कुल नतीजा मनुष्य सृष्टि का सर्वाधिक खतरनाक प्राणी। पृथ्वी को भी खा जाने वाला!

पूरे मामले में खलनायक और टर्निंग प्वाइंट कृषि का आविष्कार था। इसके कारण स्थायी बस्ती, परस्पर सहयोग, व्यवस्था और भूमि पर कब्जे व अधिकार तथा मिल्कियत, संपत्ति व तेरे तेरे की भावना बनी। लड़ाई, संघर्ष और लेन-देन व धन-संपदा ने समाज और राजनीति का वह रूप बनाया, जिससें फिर सभ्यताओं, देशों के नाम से पृथ्वी के टुकड़े होने लगे। मनुष्य बंटे। वे जात-पांत में बदले। एक-दूसरे को गुलाम बनाने व बापी पट्टों को लेकर साम्राज्यों की लड़ाइयां हुईं। प्रतिस्पर्धा बनी, शोषण-दोहन बना और अंत नतीजे में पृथ्वी का भी वह शोषण हुआ, जिसके परिणाम में अब पृथ्वी भभकती हुई।

सोचें, ढाई लाख साल के होमो सेपियन जीवन का सिर्फ पांच हजार वर्षों के सभ्यतागत रूपांतरण से कैसा भस्मासुरी अस्तित्व बना।

दोषी कौन? जाहिर है मनुष्य! वह प्रकृति से सार्वभौम स्वतंत्र दिमाग से जीवन सृजन का, निज नैसर्गिक स्वांत सुखाय जिंदगी का वरदान लिए हुए था लेकिन उसने अपने हाथों अपने को पिंजरे का पालतू, पराधीन और पराश्रित पशु बना डाला!

सत्य और विकल्प

सोचें, सृष्टि की श्रेष्ठ रचना ‘मनुष्य’ और उसकी कैसी अंत परिणति! इसे बूझते हुए देशी-विदेशी कई विचारकों ने मनुष्य को ‘यांत्रिक’ जीवन से बाहर निकलने व स्थापित परंपराओं को किनारे कर ‘स्वतंत्र’ होने का दर्शन दिया है। अपना मानना है कि वैदिक युग में सनातनता की खोज के जो बीज पैदा हुए थे वे इसी चिंतन धारा के थे। पश्चिमी सभ्यताओं में इस पर अधिक विचार हुआ है। आधुनिक भारत में मानवतावाद के पुरजोर हिमायती एमएन राय थे जो कम्युनिस्ट अनुभव के बाद यह निष्कर्ष बताते हुए थे कि- मार्क्सवाद, गांधीवाद और लोकतंत्र में से कोई भी प्रणाली व्यक्ति को अपनी अनंत स्वतंत्रता की तलाश नहीं करने देती क्योंकि ऐसी प्रत्येक विचारधारा अपनी-अपनी प्रयोजनवादी दृष्टि से बंधी है।… स्वतंत्रता की पहली शर्त वर्तमान बंधनों को तोड़ना है’। उनके मुताबिक पिंजरा तोड़ देने पर पंछी खुले आकाश में किधर उड़ेगा – यह तय करने का प्रयत्न निरर्थक है।

आधुनिक भारत में इस चिंतन के असली महामना जिद्दू कृष्णमूर्ति (ओशो भी) थे। समाज-धर्म-राजनीति-राष्ट्र के चौखटे से ‘मनुष्य’ की मुक्तता को लेकर वैश्विक तौर पर जिद्दू कृष्णमूर्ति ने चिंतन-मनन में मनुष्य को ‘आत्म साक्षात्कार’ की जो जरूरत बताई वह अतुलनीय है। उनका कहना था, ‘किसी भी धर्म, दर्शन-विचार या सम्प्रदाय के मार्ग पर चलकर सत्य को हासिल नहीं किया सकता।’ सत्य को ‘मार्ग रहित भूमि’ मानते हुए उन्होंने कहा, ‘सत्य की खोज में मनुष्य का सभी बंधनों से मुक्त होना ज़रूरी है।’…‘राष्ट्रीयता के जाने पर क्या आता है’? “राष्ट्रीयता के जाने पर बुद्धिमत्ता आती है। लोग एक धर्म त्यागकर दूसरा अपना लेते हैं, एक राजनीतिक पार्टी छोड़कर दूसरी पकड़ लेते हैं, यह सतत बदलाव उस अवस्था को दर्शाता है, जिसमें बुद्धिमता नहीं है”’…“ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया, बल्कि ईश्वर का जन्मदाता तो खुद मनुष्य है। मनुष्य ने ईश्वर का आविष्कार अपने फ़ायदे के लिए किया है।..अगर ईश्वर है भी तो उसके होने से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता।…जब तक लोग संगठित धर्म और राष्ट्रीयता-राष्ट्रवाद जैसी विभाजनकारी ताकतों को समझकर इनके प्रभाव से मुक्त नहीं होंगे, तब तक वे अपनी चेतना में बदलाव नहीं ला पाएंगे और तब तक समाज भी नहीं बदलेगा”।

इस संदर्भ में मौजूदा संकटों पर सोचें। क्या ईश्वर व राष्ट्र और राष्ट्रीयताओं से पृथ्वी की बरबादी रूक जाएगी? आपदाओं-विपदाओं का रेला रूक जाएगा? परमाणु हथियार खत्म हो जाएंगे? अस्तित्व पर आया संकट खत्म होगा? कतई नहीं? तमाम समस्याओं का हल सिर्फ तब है जब सभ्यताओं से बनी मनुष्य की आदतें बदलें। मनुष्य अपने को जाने और अपने आपको बदले। अपनी व्यवस्थाओं को छोड़े।

बुनियादी इकाई के रूप में ‘व्यक्ति’ के साथ पांच हजार वर्षों में, सभ्यताओं ने जो किया है उसका परिणाम नारकीय इतिहास तथा प्रलयकारी भविष्य है। तभी सोचने का तरीका बदलना होगा। डूबने की जब कगार है तो महासागर में बचने के लिए हाथ-पांव मनुष्य को अकेले ही मारने हैं! (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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